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Saturday, 24 October 2020

शमी पुजन

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विजयदशमी और शमी वृक्षपंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार विजयदशमी के दिन माँ अपराजिता का पूजन करने के बाद शमी अर्थात खेजड़ी वृक्ष का पूजन करना चाहिए।   
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार शमी के कांटों का प्रयोग तंत्र, मंत्र बाधा और नकारात्‍मक शक्तियों के नाश के लिए होता है। शमी के फूल, पत्‍ते, जड़ें, टहनी और रस का प्रयोग शनि संबंधी दोषों को दूर करने के लिए भी किया जाता है। आयुर्वेद में शमी के वृक्ष का प्रयोग गुणकारी औषधि के रूप में भी किया जाता है। माँ लक्ष्मी और भगवान विष्णु का वास शमी वृक्ष को ही माना जाता है। शमी वृक्ष की पूजा दशहरा वाले दिन प्रदोष काल में की जाती है। शमी को दृढ़ता तथा तेजस्विता का प्रतीक माना जाता है। उसमें अन्य वृक्षों की तुलना में अग्नि तत्व ज्यादा होता है। हम भी शमी की तरह ही तेजस्वी तथा दृढ़ हों, इसलिए इसकी पूजा की जाती है।शमी के वृक्ष की पूजन परंपरा हमारे यहां प्राचीन समय से चली आ रही है। पौराणिक मान्यता है कि मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्रीराम ने लंका पर आक्रमण करने के पूर्व शमी वृक्ष के सामने शीश नवाकर अपनी विजय हेतु प्रार्थना की थी। महाभारत के समय में पांडवों ने देश निकाला के अंतिम वर्ष में अपने हथियार शमी के वृक्ष में ही छिपाए थे और इसी कारण उन्हें विजय प्राप्त हुई।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार सर्वप्रथम शमी वृक्ष के पास जाकर नमन करते हुए शमी वृक्ष का रोली से तिलक कर चावल चढाये। उसके बाद गुड़ का भोग लगाए। मौली चढाते हुए शमी वृक्ष के चारों ओर मौली से बांधे और फिर धुप दीप के साथ शमी वृक्ष की पुजा आरती करे उसके बाद सारी पूजा सामग्री को शमी वृक्ष की जड़ों में मिट्टी को अर्पित करें। फिर शमी वृक्ष के पत्ते और जड़ के पास की थोड़ी सी मिट्टी लेकर उसे नए लाल कपड़े मे बांध कर घर के पवित्र स्थान अर्थात भगवान के मंदिर अथवा तिजोरी में रखकर माँ महालक्ष्मी का ध्यान करते हुए अपने घर में अक्षुण्ण धनलक्ष्मी के वास की प्रार्थना करे। 
इस दिन शमी के कटे हुए पत्ते और डालियों की पूजा नहीं करनी चाहिए।रात्रि में देवी मां के मंदिर में जाकर दीपक जलाएं साथ ही पूरे घर में रोशनी रखें।नवरात्र में विजयादशमी के दिन शमी की पूजा करने से घर में सुख समृद्धि का स्थाई वास होता है। शमी का पौधा जीवन से टोने-टोटके के दुष्प्रभाव व नकारात्मक प्रभाव को दूर करता है।इस दिन संध्या के समय शमी के वृक्ष के नीचे दीपक जलाने से युद्ध और मुक़दमो में विजय मिलती है शत्रुओं का भय समाप्त होता है। आरोग्य व धन की प्राप्ति होती है। शमी वृक्ष तेजस्विता एवं दृढता का प्रतीक भी माना गया है, जिसमें अग्नि तत्व की प्रचुरता होती है। घर में ईशान कोण (पूर्वोत्तर) में स्थित शमी का वृक्ष विशेष लाभकारी माना गया है। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार रात्रि में देवी मां के मंदिर में जाकर दीपक जलाएं साथ ही पूरे घर में रोशनी रखें।नवरात्र में विजयादशमी के दिन शमी की पूजा करने से घर में सुख समृद्धि का स्थाई वास होता है। शमी का पौधा जीवन से टोने-टोटके के दुष्प्रभाव व नकारात्मक प्रभाव को दूर करता है।इस दिन संध्या के समय शमी के वृक्ष के नीचे दीपक जलाने से युद्ध और मुक़दमो में विजय मिलती है शत्रुओं का भय समाप्त होता है। आरोग्य व धन की प्राप्ति होती है। शमी वृक्ष तेजस्विता एवं दृढता का प्रतीक भी माना गया है, जिसमें अग्नि तत्व की प्रचुरता होती है। इसी कारण यज्ञ में अगि्न प्रकट करने हेतु शमी की लकड़ी के उपकरण बनाए जाते हैं।घर में ईशान कोण (पूर्वोत्तर) में स्थित शमी का वृक्ष विशेष लाभकारी माना गया है। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार ध्यान रखने योग्य बात यह है कि इस दिन शमी के कटे हुए पत्ते और डालियों की पूजा नहीं करनी चाहिए।
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माँ अपराजिता का पुजन

विजयदशमी और माँ अपराजिता का पुजन 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार नवरात्रि के पश्चात अश्विन मास शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को विजय का पर्व विजयादशमी मनाया जाता है। यह पर्व श्रीराम की रावण पर एवं माता दुर्गा की शुंभ-निशुंभ आदि असुरों पर विजय के उपलक्ष्य में मनाया जाने वाला पर्व है।इस दिन भगवान श्रीराम,शस्त्रों व शमी के वृक्ष की पूजा करने का विधान है। 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार विजय दशमी के दिन "माता अपराजिता" का पूजन करना अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है।माँ अपराजिता ही माता दुर्गा का ही अवतार हैं। रामायण की कथा के अनुसार भगवान श्री राम ने लंकापति रावण से युद्ध करने के लिए माता अपराजिता का पूजन करके ही प्रस्थान किया था। 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार माँ अपराजिता को "यात्रा की देवी" माना गया है। समस्त यात्राओं पर अपराजिता देवी का ही अधिकार ही माना गया है। 
शास्त्रो के अनुसार माँ अपराजिता का पूजन का दोपहर के तत्काल बाद करना चाहिए।इसलिए संध्या काल के समय माता अपराजिता की पूजा करना श्रेष्ठ माना जाता है। अपराजिता पूजा करने के लिए घर के पूर्वोत्तर दिशा में कोई स्थान चुन लें। पूजा का स्थान किसी बगीचे या मंदिर के आसपास भी हो सकती है। पूजा के स्थान को साफ करें  और चंदन के लेप के साथ अष्टदल चक्र बनाएं। पुष्प तथा अक्षत के साथ अपराजिता की पूजा का संकल्प लें।इसके बाद अपराजिता की दाहिनी ओर जया और बायीं ओर विजया शक्ति का आह्वाहन करना चाहिए। इसके बाद तीनों को प्रणाम करते हुए 'अपराजितायै नमः,जयायै नमः,विजयायै नमः’इस मंत्र का उच्चारण करते हुए उनकी षोडशोपचार के साथ पूजा करनी चाहिए और प्रार्थना करनी चाहिए- "हे देवी अपराजिता मैंने अपनी यथाशक्ति से आपकी पूजा की है जो मैंने अपनी रक्षा के लिये की है उसे स्वीकार कीजिए। हे माँ अपराजिता जिसने कण्ठहार पहन रखा है, जिसने चमकदार सोने की करधनी पहन रखी है जो अच्छा करने की इच्छा रखती है, मुझे विजय दे।" इसके पश्चात अपरिजिता स्त्रोत्र का पाठ करना चाहिए और इसके बाद देवी का विसर्जन करना चाहिए। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार विजयदशमी के दिन माँ अपराजिता के पूजन करने से वर्ष भर कार्य आसानी से निर्विघ्न संपन्न होते है और शत्रु परास्त होते है। 
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Friday, 16 October 2020

शारदीय नवरात्रि

शारदीय नवरात्रि 
पंडित अंजनी कुमार के अनुसार माँ देवी भगवती की व‍िशेष पूजा और अर्चना का पर्व शारदीय नवरात्रि 17 अक्‍टूबर 2020 अर्थात कल से शुरू हो रहा है। यह पर्व 25 अक्टूबर तक चलेगा। इन नौ दिनों में मां भगवती की भक्ति से पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाएगा।
पंडित अंजनी कुमार के अनुसार देश के विभिन्‍न हिस्‍सों में इस त्‍योहार को अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है। कुछ लोग पूरी रात गरबा और आरती कर नवरात्र का व्रत रखते हैं तो वहीं कुछ लोग व्रत और उपवास रख मां दुर्गा और उनके नौ रूपों की पूजा-आराधना करते हैं। दरअसल नवरात्र अंत: शुद्धि का महानतम् त्‍योहार है।
पंडित अंजनी कुमार के अनुसार इस बार की शारदीय नवरात्रि अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण है क्‍योंक‍ि इस बार पूरे 58 वर्षों के बाद शनि, मकर में और गुरु, धनु राशि में रहेंगे। इससे पहले यह योग वर्ष 1962 में बना था। 
देवी माँ दुर्गा का वाहन और उसका महत्व
पंडित अंजनी कुमार के अनुसार देवी दुर्गा का वाहन तो शेर होता है। लेक‍िन नवरात्र में मां पृथ्‍वी पर द‍िनों के अनुसार आती हैं। मान्‍यता है क‍ि देवी मां क‍िस वाहन से आ रही हैं इसका व‍िशेष महत्‍व होता है। देवीभागवत पुराण के अनुसार मां दुर्गा का आगमन आने वाले भविष्य की घटनाओं के बारे में संकेत देता है।ऐसा माना जाता है क‍ि नवरात्र की शुरुआत सोमवार या रविवार को होती है तो इस दौरान हाथी पर सवार होकर आती है। वहीं अगर शनिवार या फिर मंगलवार को नवरात्रि की शुरुआत होती है तो मां घोड़े पर सवार होकर आती हैं। गुरुवार या शुक्रवार को नवरात्र का आरंभ होता है तो माता डोली में सवार होकर आती हैं। वहीं बुधवार के दिन मां नाव को अपनी सवारी बनाती हैं। तो इस बार नवरात्र की स्थापना 17 अक्‍टूबर 2020 के दिन शन‍िवार से हो रही हैं तो देवी मां इस बार घोड़े से आ रही हैं।कई धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार घोड़े को युद्ध का प्रतीक माना जाता है। घोड़े पर माता का आगमन शासन और सत्ता के लिए अशुभ माना गया है। इससे सरकार को विरोध का सामना करना पड़ता है।
पंडित अंजनी कुमार के अनुसार विजयदशमी 25 अक्टूबर 2020 रविवार के दिन है।रविवार के दिन विजयादशमी होने पर माता हाथी पर सवार होकर वापस कैलाश की ओर प्रस्थान करेगी । माता की विदाई हाथी पर होने से आने वाले वर्ष में खूब वर्षा होगी और इससे अन्न का उत्‍पादन अच्‍छा होता है।
पंडित अंजनी कुमार के अनुसार नवरात्रि की शुरुआत घट स्थापना के साथ ही होती है। हम घट स्थापना कर शक्ति की देवी तथा समस्त देवी शक्तियो का आह्वान करते है। 
नवरात्रि के पहले दिन यानी कि प्रतिपदा को सुबह स्नान कर लें। उसके बाद मंदिर की साफ-सफाई करने के बाद एक चौकी (पाटा) पर लाल वस्त्र बिछा कर मां दुर्गा और गणेश जी की मुर्ति या तस्वीर रखे। सबसे पहले गणेश जी और फिर मां दुर्गा का नाम लें।पंडित अंजनी कुमार के अनुसार कलश स्थापना के लिए एक तांबे के लोटे पर रोली से स्वास्तिक बनाएं। लोटे के ऊपरी हिस्सेे में मौली बांधें।
अब इस लोटे में पानी भरकर उसमें कुछ बूंदें गंगाजल की मिलाएं। फिर उसमें सवा रुपया, दूब, सुपारी, इत्र और अक्षत डालें। इसके बाद कलश में अशोक या आम के पांच पत्ते लगाएं।अब एक नारियल को मौली से बांध दें। फिर नारियल को कलश के ऊपर रख दें।अब इस कलश को धान की ढेरी बनाकर उस पर रख दे। 
अब मिट्टी के पात्र में मिट्टी डालकर उसमें जौ के बीज बोएं। 
कलश स्थापना के साथ ही नवरात्रि के नौ व्रतों को रखने का संकल्प लिया जाता है।
आप चाहें तो कलश स्थापना के साथ ही माता के नाम की अखंड ज्योति भी जला सकते हैं। अपने कष्ट निवारण या मनोवांछित वर पाने के लिए दुर्गा सप्तशती,अर्गला स्त्रोत्र, किलक स्त्रोत्र, दुर्गा चालीसा, दुर्गा कवच आदि का पाठ कर सकते हैं या दुर्गा माता के नाम की माला का जाप कर सकते हैं। 
 पंडित अंजनी कुमार के अनुसार कलश स्थापना महुर्त निम्नलिखित है-
प्रातःकाल 8:12 से 9:37 तक
दोपहर 12:00से 12:46 तक अभिजित महुर्त। 
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Saturday, 10 October 2020

श्री दुर्गा सप्तशती और नवरात्र

श्री दुर्गा सप्तशती और नवरात्र
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार नवरात्रि के पावन पर्व के दौरान श्रीदुर्गा सप्तशती का पाठ करना लाभदायक माना जाता है। महर्षि मारकंडेय द्वारा रचित श्री दुर्गा सप्तशती के पाठ करने से घर की नकारात्मक ऊर्जा एवं उसका प्रभाव खत्म हो जाता है साथ ही मां के आशीर्वाद स्वरुप धन धान्य की वर्षों होती है और आरोग्यता के साथ रिद्धि सिद्धि की भी प्राप्ति होती है।            पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार नवरात्रि में मां की मूर्ति या तस्वीर को प्रतिष्ठित कर नौ दिनों तक पुजन करना चाहिए। इसके पश्चात नौ कुवांरी कन्याओं को भोजन करवाने से हमें नवरात्रि का शुभ फल मिलता है। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार नवरात्रि में माँ की पुजा करने की विधि निम्नलिखित है-
नवरात्र पूजा विधि
सर्वप्रथम देवी भगवती की मूर्ति या तस्वीर को एक चौखट पर लाल वस्त्र बिछाकर उस पर प्रतिष्ठापित करें। और कलश स्थापना करें। दीप प्रज्ज्जवलन करें(अखंड ज्योति जलाएं यदि आप जलाते हों या जलाना चाहते हों। ) माँ को नैवेद्य, पुष्प, पुष्पमाला अर्पित करते हुए षोडशोपचार विधि से पुजा करे। माँ भगवती और गणपति, शंकर जी, भगवान विष्णु, हनुमान जी और नवग्रह आदि का ध्यान करे और माता की आरती करे। इसके पश्चात उसके बाद माँ भगवती गणपति, शंकर जी, भगवान विष्णु, हनुमान जी नवग्रह और अपने गुरू का ध्यान करते हुए श्री दुर्गा सप्तशती के पाठ करने के लिए संकल्प लेकर पाठ आरंभ करे। 
पाठ विधि
संकल्प- श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ करने से पहले भगवान गणपति, शंकर जी का ध्यान करिए। उसके बाद हाथ में जौ, चावल और दक्षिणा रखकर देवी भगवती का ध्यान करिए और संकल्प लीजिए...हे भगवती मैं.....( अमुक नाम)....सपरिवार...( अपने परिवार के नाम ले लीजिए...)...गोत्र.( अमुक गोत्र)....स्थान ( जहां रह रहे हैं)... पूरी निष्ठा, समर्पण और भक्ति के साथ आपका ध्यान कर रहा हूं। हे भगवती आप हमारे घर में आगमन करिए और हमारी इस मनोकामना... ( मनोकामना बोलें लेकिन मन ही मन) को पूरा करिए। श्रीदुर्गा सप्तशती के पाठ, जप ( माला का उतना ही संकल्प करें जितनी नौ दिन कर सकें) और यज्ञादि को मेरे स्वीकार करिए। इसके बाद धूप, दीप, नैवेज्ञ के साथ भगवती की पूजा प्रारम्भ करें।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार श्रीदुर्गा सप्तशती के पाठ करने का अलग विधान है। कुछ अध्यायों में उच्च स्वर, कुछ में मंद और कुछ में शांत मुद्रा में बैठकर पाठ करना श्रेष्ठ माना गया है। जैसे कीलक मंत्र को शांत मुद्रा में बैठकर मानसिक पाठ करना श्रेष्ठ है। देवी कवच उच्च स्वर में और श्रीअर्गला स्तोत्र का प्रारम्भ उच्च स्वर और समापन शांत मुद्रा से करना चाहिए। देवी भगवती के कुछ मंत्र यंत्र, मंत्र और तंत्र क्रिया के हैं। संपूर्ण दुर्गा सप्तशती स्वर विज्ञान का एक हिस्सा है।
वाकार विधि: - प्रथम दिन एक पाठ प्रथम अध्याय, दूसरे दिन दो पाठ द्वितीय, तृतीय अध्याय, तीसरे दिन एक पाठ चतुर्थ अध्याय, चौथे दिन चार पाठ पंचम, षष्ठ, सप्तम व अष्टम अध्याय, पांचवें दिन दो अध्यायों का पाठ नवम, दशम अध्याय, छठे दिन ग्यारहवां अध्याय, सातवें दिन दो पाठ द्वादश एवं त्रयोदश अध्याय करके एक आवृति सप्तशती की होती है। 
संपुट पाठ विधि: - किसी विशेष प्रयोजन हेतु विशेष मंत्र से एक बार ऊपर तथा एक नीचे बांधना उदाहरण हेतु संपुट मंत्र मूलमंत्र-1, संपुट मंत्र फिर मूलमंत्र अंत में पुनः संपुट मंत्र आदि इस विधि में समय अधिक लगता है। लेकिन यह अतिफलदायी है। अच्छा यह होगा कि आप संपुट के रूप में अर्गला स्तोत्र का कोई मंत्र ले लीजिए। 
अथवा
कोई बीज मंत्र जैसे ऊं श्रीं ह्रीं क्लीं दुर्गायै नम: ले लें या ऊं दुर्गायै नम: से भी पाठ कर सकते हैं। 
 Pandit Anjani Kumar Dadhich
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Wednesday, 16 September 2020

अधिकमास

🌻अधिक मास या पुरुषोंतम मास🌻
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार श्राद्ध खत्म होने के बाद 18 सितंबरसे अधिकमास शुरू होंगा जो 16 अक्टूबर तक रहेगा। नवरात्रि 17 अक्टूबर को मनाई जाएगी। अधिक मास को पुरुषोंतम मास भी कहा जाता है। यह मास पुजा पाठ यज्ञ-अनुष्ठान एवं दान पुण्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार अधिकमास के दौरान सर्वार्थसिद्धि योग 9 दिन, द्विपुष्कर योग 2 दिन, अमृतसिद्धि योग एक दिन और दो दिन पुष्य नक्षत्र का योग बन रहा है। 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार ईसा कलैण्डर वर्ष की गणना सूर्य राशि के अनुसार की जाती है। इसके एक वर्ष में 365 दिन और करीब 6 घंटे का होते है। जबकि विक्रमी संवत जिसके आधार पर पंचाग का निर्माण होता है। उसकी गणना चंद्र राशि की गणना आधारित है। इस के एक वर्ष में 354 दिन होता है। दोनों सालों के बीच करीब 11 दिनों का अंतर होता है। ये अंतर हर तीन साल में करीब एक माह के बराबर हो जाता है। इसी अंतर को दूर करने के लिए तीन साल में एक चंद्र मास अतिरिक्त आता है।अतिरिक्त संख्या में दिन होने के कारण से अधिकमास का नाम दिया गया।
🌼पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार अधिक मास में जो कार्य करने चाहिए वो निम्नलिखित है- 
❁अध‍िक मास में इस पूरे माह में व्रत, तीर्थ स्नान, श्रीमद भगवत गीता,रामायण, रामचरितमानस शिव पुराण तथा दुर्गा सप्तशती आदि ग्रंथों का अध्ययन नियमित रूप से करना चाहिए। 
❁शांतियज्ञ, एवं गायत्री यज्ञ आदि किए जा सकते हैं।
जो कार्य पहले शुरु किये जा चुके हैं उन्हें जारी रखा जा सकता है। 
❁मंत्रो की साधना तथा सिद्धी करना भी  लाभदायक होता है। 
❁पशु पक्षियों के लिए अन्न का दान करे। गरीब और बेसहारा लोगों को सहायता और दान देना चाहिए। 
❁"ओम् भगवते वासुदेवाय नम:" मंत्र का प्रतिदिन जाप करना भी हितकारी होता है। 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार हिंदू धर्म में अध‍िक मास के दौरान सभी पवित्र कर्म वर्जित माने गए हैं। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार अतिरिक्त दिनो की संख्या होने के कारण यह मास मलिन होता है। इसलिए इस मास के दौरान हिंदू धर्म के विशिष्ट व्यक्तिगत संस्कार जैसे नामकरण, यज्ञोपवीत, विवाह और सामान्य धार्मिक संस्कार जैसे गृहप्रवेश, नई बहुमूल्य वस्तुओं की खरीदी आदि आमतौर पर नहीं किए जाते हैं। 
Pandit Anjani Kumar Dadhich
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Tuesday, 8 September 2020

मंगल ग्रह का वक्री होना

🌻मंगल ग्रह का वक्री होना🌻
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार ऊर्जा और पराक्रम के कारक माने जाने वाले मंगल ग्रह 10 सितम्बर 2020 से वक्री होने जा रहे है जो 14 नंवबर 2020 तक रहेंगे। मंगल के वक्री होने से नकारात्मक प्रभाव और विचारों को देता है। वक्री अवस्था में मंगल यदि अशुभ अवस्था में स्थित हो तो देश में सांप्रदायिक दंगे, हिंसात्मक गतिविधियाँ और आतंकवादी घटनाएँ भी दे सकता है। इसके विपरीत यदि ये शुभ प्रभाव में हो तो खेल के क्षेत्र में सफलता, युद्ध में विजय तथा देश को अन्य देशों से आगे ले जाने में अपना प्रभाव देता है। 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार इस समय मेष, कर्क, तुला और वृश्चिक राशि वाले लोगों को सावधान रहना होगा। इन 4 राशि वालों के कामकाज में रुकावटें आ सकती है। कामकाज में विवाद और तनाव बढ़ सकता है। चोट या दुर्घटना की भी आशंका है। गुस्से के कारण बने बनाए काम भी बिगड़ सकते हैं। वहीं, वृष, मिथुन, सिंह, कन्या, धनु, मकर, कुंभ और मीन राशि वाले लोग इस ग्रह के अशुभ प्रभाव से बचे रहेंगे।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार मंगल ग्रह अश्विन नक्षत्र के गोचर में प्रवेश करेंगे जिसके स्वामी केतु ग्रह है जो अंगारक योग का निर्माण होगा जो खराब हालात की ओर इशारा कर रहे हैं। 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार मंगल के अशुभ असर से बचने के लिए उपाय निम्नलिखित है-
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार हनुमानजी की पूजा करनी चाहिए तथा हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए। 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार लाल चंदन या पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार सिंदूर का तिलक लगाना चाहिए। 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार तांबे के बर्तन में गेहूं रखकर दान करने चाहिए।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार लाल कपड़ों का तथा मसूर की दाल का दान करें। 
Pandit Anjani Kumar Dadhich
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Tuesday, 1 September 2020

भाग्यांक एवं उसका महत्व

🌻भाग्यांक एवं उसका महत्व🌻
 पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार अंक ज्योतिष में जितना महत्व मूलांक को दिया जाता है उतना ही महत्व भाग्यांक का है जिसे जीवन पथ संख्या भी कहते हैं। भाग्यांक वयक्ति के जीवन पथ को सही और गलत दिशा में मोड़ने में सक्षम है। भाग्यांक के द्वारा जीवन में अवसरों, चुनोतियों और सबक की एक विस्तृत रुपरेखा का अनुमान लगाया जा सकता हैं। 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार अंक ज्योतिष द्वारा भविष्यफल जानने के लिए भाग्यांक को एक महत्वपूर्ण अंक माना जाता है। भाग्यांक जातक की जन्म तिथि, जन्म माह तथा जन्म वर्ष का योग(जोड़) होता है।
📖कैसे जानें अपना भाग्यांक 📖
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार भाग्यांक जानने के लिए अपनी जन्मतिथि को अंको में लिखकर सभी अंको को जोड़ने पर एक इकाई अंक प्राप्त किया जा सकता है- जैसे यदि किसी व्यक्ति की जन्मतिथि 8 जनवरी 1999 (08-01-1999) है तो भाग्यांक निम्न पद्धति द्वारा निकाला जाएगा 8+1+1+9+9+9= 46=4+6=10=1+0=1 तो इसका मतलब हैैै कि उस व्यक्ति का भाग्यांक 1 है।
 🌹भाग्यांक 1 वाले की विशेषताएं🌹
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार जिस व्यक्ति या जातक का भाग्यांक 1 होता है उसका स्वामी ग्रह सूर्य है। सूर्य को ज्योतिष में आत्मा का कारक माना गया है। सूर्य जीवन शक्ति है। भाग्यांक 1 होने पर आपके जीवन पर सूर्य में पाये जाने वाले गुणो का संचार एवं प्रभाव पाया जाता है। ऐसा व्यक्ति परिश्रमी,आत्मनिर्भर, अहंकारी, जिद्दी, घंमडी महत्वाकांक्षी, उत्साही, कला-प्रेमी, अति आकर्षक व सुन्दर, कार्य कुशल तथा अग्रसोची होता है।शीघ्र निर्णय लेने में समर्थ होता हैं। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार आप-अपने परिवार के कर्ता-धर्ता होंगे तथा सभी जिम्मेदारियां आपको ही निभानी पड़ेगी। आपको जीवन में कभी-कभी बहुत लाभ भी हो सकता है तथा अचानक हानि होने की भी सम्भावना रहती है। धन की बचत करने में आप सफल रहेंगे। आपको अनेक प्रकार से धन कमाने के अवसर प्राप्त होंगे। भाग्यांक 1 वाले व्यक्तियों को एक बात अवश्य ध्यान रखनी चाहिए कि कोई भी कार्य प्रेम-पूर्वक करें। आदेशात्मक प्रवृत्ति से किया गया कार्य बिगड़ सकता है। यदि आप व्यवसाय करना चाहते है तो साझेदारी कदापि न करें अन्यथा बाद में पछताना पड़ सकता है। भाग्यांक 1 वाला व्यक्ति हर जगह मुखिया बनना पसंद करता है। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार भाग्यांक 1 के प्रभावित जातकों के लिए भाग्यांक के प्रभाव से भाग्योदय उन्नीस वर्ष की अवस्था से प्रारंभ होकर अट्ठाइसवें वर्ष की अवस्था पर उच्चता मिलती है तथा सैंतीस वर्ष की अवस्था पर पूर्ण भाग्योदय होता है। 
🌼मूलांक और भाग्यांक 1 वाले व्यक्ति🌼
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार जिन लोगों का मूलांक और भाग्यांक 1 हो तो व्यक्ति का मूलांक और भाग्यांक का मालिक सूर्य होगा जो राजा माना जाता है। इस सामंजस्य के कारण व्यक्ति सफल, स्वाभिमानी, अहंकारी,एवं जिद्दी बनाता है। पैसे कमाने के लिए आतुर  बनाता है जिसके कारण परिवार एवं समाज से दूरी बना लेते हैं। 
✍उपाय✍ 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार इसको ठीक करने के लिए अपने नामांक को 5 अंक पर ले आए जिससे आपके मूलांक और भाग्यांक में संतुलन बन पाएगा क्योंकि बुध ग्रह संतुलन का कार्य करता है। 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार अगर आपका मुलांक या भाग्यांक 1 आता है तो आपको गाड़ी नम्बर का कुल योग 1, 2, 4 या 7 रखना चाहिये। 
6 या 8 नम्बर वाला वाहन ना रखें तो बेहतर होगा। 
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