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Thursday, 19 November 2020

सौभाग्य पंचमी के कुछ उपाय

सौभाग्य पंचमी के कुछ उपाय  
मैं पंडित अंजनी कुमार दाधीच आज सौभाग्य पंचमी महापर्व पर यहाँ कुछ उपायों की जानकारी दे रहा हूँ। 
सौभाग्य पंचमी या लाभ पंचमी के दिन विधिपूर्वक पूजा करने से घर में सौभाग्य आता है तथा कारोबार में फायदा होता है। व्यापार में फायदा प्राप्त करने के लिए सौभाग्य पंचमी के कुछ उपाय निम्नलिखित है-
(1) गणेश पूजा के समय दो सुपारी लें और उन्हें इकट्ठा करके एक मौली लेकर उस पर लपेटकर चावल से बने अष्टदल पर रख दें। पूजा के बाद मौली लिपटी हुई सुपारी को मन्दिर में रख दें और चावलों को उठाकर पक्षियों को डाल दें।
(2) सौभाग्य पंचमी के दिन एक सूखा नारियल लेकर उसे ऊपर से काट दें। अब इस कटे हुए नारियल में बुरा तथा घी मिलाकर भर दें और फिर कटा हुआ हिस्सा वापस उस पर रख दें। इस नारियल को चींटियों के बिल के पास मिट्टी में दबा दें। इस उपाय से धन लक्ष्मी की प्राप्ति होती है और समृद्धि मिलती है।बरगद का एक बड़ा-सा पत्ता लें और उसे घर पर लाकर, साफ पानी से धोकर उस पर स्वास्तिक का चिन्ह बनाकर अपने घर के मन्दिर में रख लें।
(3)अगर आज आप किसी शुभ कार्य के लिए जा रहे हैं, किसी नौकरी की तलाश में जा रहे हैं या लड़की के लिये रिश्ता देखने जा रहे हैं तो घर की किसी महिला से कहें कि वह आपके ऊपर से मुट्ठी में काली उड़द की दाल लेकर, वारकर नीचे जमीन पर छोड़ दें। ऐसा करने से आपको अपने कार्य में सफलता जरूर मिलेगी।
(4) सौभाग्य पंचमी के दिन किसी देवी मंदिर में जाकर इत्र चढ़ाना भी विशेष शुभदायक है। इससे महिला को सदा सुहागन के आशीर्वाद के साथ पति का प्यार भी मिलता है। 
Pandit Anjani Kumar Dadhich
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Friday, 30 October 2020

शरद पूर्णिमा

शरद पूर्णिमा 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार शरद पूर्णिमा आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनायी जाती है। इसे शरद पूर्णिमा के अलावा कोजागरी पूर्णिमा भी कहा जाता है। इस दिन शाम को मां लक्ष्मी का विधि-विधान से पूजन किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि सच्चे मन ने पूजा- अराधना करने वाले भक्तों पर मां लक्ष्मी कृपा बरसाती हैं। माना जाता है कि इस दिन चंद्रमा 16 कलाओं में होता है और धरती पर अमृत वर्षा करता है। साथ ही यह भी कहा जाता है कि जो व्यक्ति 16 कलाओं से युक्त होता है वो सर्वोत्तम माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार श्रीकृष्‍ण ने 16 कलाओं के साथ जन्‍म लिया था। मान्यता है कि इसी दिन मां लक्ष्मी का अवतरण हुआ था।इसीलिए शरद पूर्णिमा के दिन मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार शरद पूर्णिमा के दिन खीर के भोग का भी बहुत महत्व होता है। कुछ लोग चूड़ा और दूध भी भिगोकर रखते हैं।रातभर चांदनी में रखी खीर शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ाती है।वहीं श्वांस के रोगियों को इससे फायदा होता है और साथ ही आंखों की रोशनी भी बेहतर होती है।माना जाता है कि इस दिन मां लक्ष्मी घर-घर विचरण करती हैं। इसलिए इस दिन माता लक्ष्मी की पूजा करने से उनका विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है और जीवन में कभी भी धन की कमीं नहीं रहती।पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार इस रात में माता लक्ष्मी के आठ में से किसी भी स्वरूप का ध्यान करने से उनकी कृपा मिलती है। देवी के आठ स्वरूप धनलक्ष्मी, धन्य लक्ष्मी, राजलक्ष्मी, वैभवलक्ष्मी, ऐश्वर्य लक्ष्मी, संतान लक्ष्मी, कमला लक्ष्मी और विजय लक्ष्मी हैं। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार चांद की रोशनी में कई रोगों का इलाज करने की खासियत होती है। चंद्रमा की रोशनी इंसान के पित्त दोष को कम करती है। एग्जिमा, गुस्सा, हाई बीपी, सूजन और शरीर से दुर्गंध जैसी समस्या होने पर चांद की रोशनी का सकारात्मक असर होता है।पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार सुबह की सूरज की किरणें और चांद की रोशनी शरीर पर सकरात्मक असर छोड़ती हैं।शरद पूर्णिमा को खीर रात भर चांद की रोशनी में रखने के बाद ही खाना चाहिए। इसे चलनी से ढक भी सकते हैं। खीर में कुछ चीजों का होना जरूरी है। जैसे दालचीनी, काली मिर्च, घिसा नारियल, किशमिश, छुहारा। रातभर इसे चांदनी में रखने से रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ाती है।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार शरद पूर्णिमा को माता लक्ष्मी की पुजा की विधि निम्नलिखित है-
शरद पूर्णिमा के दिन शामको स्नान करें। इसके बाद एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर उस पर माता लक्ष्मी की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें और उन्हें लाल पुष्प, नैवैद्य, इत्र, सुगंधित चीजें चढ़ाएं। आराध्य देव को सुंदर वस्त्र, आभूषण पहनाएं। आवाहन, आसन, आचमन, वस्त्र, गंध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, तांबूल, सुपारी और दक्षिणा आदि अर्पित कर पूजन करें।इसके बाद माता लक्ष्मी को खीर का भोग लगाएं। यह सभी चीजें अर्पित करने के बाद लक्ष्मी चालीसा या श्रीसुक्त पाठ अवश्य करें और उनकी धूप व दीप से आरती उतारें।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार रात्रि के समय गाय के दूध से बनी खीर में घी और चीनी मिलाकर आधी रात के समय भगवान भोग लगाएं।रात्रि में चंद्रमा के आकाश के मध्य स्थित होने पर चंद्र देव का पूजन करें तथा खीर का नेवैद्य अर्पण करें। रात को खीर से भरा बर्तन चांदनी में रखकर दूसरे दिन उसका भोजन करें और सबको प्रसाद के रूप में वितरित करें। शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की रोशनी में खीर अवश्य रखें और अगले दिन उसे पूरे परिवार के साथ मिल बांटकर खाएं।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार पूर्णिमा का व्रत करके कथा सुननी चाहिए। कथा से पूर्व एक लोटे में जल और गिलास में गेहूं, पत्ते के दोने में रोली व चावल रखकर कलश की वंदना करें और दक्षिणा चढ़ाएं।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार इस दिन भगवान शिव-पार्वती और भगवान कार्तिकेय की भी पूजा होती है।अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। इस दिन चंद्रमा अपनी समस्त कलाओं में पूर्ण होता है। माना जाता है कि इस दिन चंद्रमा कि किरणों से अमृत बरसता है। इस दिन की चांदनी सबसे तेज प्रकाश वाली होती है। ब्रह्म कमल भी शरद पूर्णिमा की रात खिलता है। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार शास्त्रों के अनुसार इस दिन किए गए धार्मिक अनुष्ठान कई गुना फल देते हैं।इसी कारण से इस दिन कई धार्मिक अनुष्ठान भी किए जाते हैं। शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा धरती के बेहद पास होता है। जिसकी वजह से चंद्रमा से जो रासायनिक तत्व धरती पर गिरते हैं वह काफी सकारात्मक होते हैं और जो भी इसे ग्रहण करता है उसके अंदर सकारात्मकता बढ़ जाती है। शरद पूर्णिमा को कामुदी महोत्सव के नाम से भी जाना जाता है।
Pandit Anjani Kumar Dadhich
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Saturday, 24 October 2020

माँ अपराजिता का पुजन

विजयदशमी और माँ अपराजिता का पुजन 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार नवरात्रि के पश्चात अश्विन मास शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को विजय का पर्व विजयादशमी मनाया जाता है। यह पर्व श्रीराम की रावण पर एवं माता दुर्गा की शुंभ-निशुंभ आदि असुरों पर विजय के उपलक्ष्य में मनाया जाने वाला पर्व है।इस दिन भगवान श्रीराम,शस्त्रों व शमी के वृक्ष की पूजा करने का विधान है। 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार विजय दशमी के दिन "माता अपराजिता" का पूजन करना अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है।माँ अपराजिता ही माता दुर्गा का ही अवतार हैं। रामायण की कथा के अनुसार भगवान श्री राम ने लंकापति रावण से युद्ध करने के लिए माता अपराजिता का पूजन करके ही प्रस्थान किया था। 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार माँ अपराजिता को "यात्रा की देवी" माना गया है। समस्त यात्राओं पर अपराजिता देवी का ही अधिकार ही माना गया है। 
शास्त्रो के अनुसार माँ अपराजिता का पूजन का दोपहर के तत्काल बाद करना चाहिए।इसलिए संध्या काल के समय माता अपराजिता की पूजा करना श्रेष्ठ माना जाता है। अपराजिता पूजा करने के लिए घर के पूर्वोत्तर दिशा में कोई स्थान चुन लें। पूजा का स्थान किसी बगीचे या मंदिर के आसपास भी हो सकती है। पूजा के स्थान को साफ करें  और चंदन के लेप के साथ अष्टदल चक्र बनाएं। पुष्प तथा अक्षत के साथ अपराजिता की पूजा का संकल्प लें।इसके बाद अपराजिता की दाहिनी ओर जया और बायीं ओर विजया शक्ति का आह्वाहन करना चाहिए। इसके बाद तीनों को प्रणाम करते हुए 'अपराजितायै नमः,जयायै नमः,विजयायै नमः’इस मंत्र का उच्चारण करते हुए उनकी षोडशोपचार के साथ पूजा करनी चाहिए और प्रार्थना करनी चाहिए- "हे देवी अपराजिता मैंने अपनी यथाशक्ति से आपकी पूजा की है जो मैंने अपनी रक्षा के लिये की है उसे स्वीकार कीजिए। हे माँ अपराजिता जिसने कण्ठहार पहन रखा है, जिसने चमकदार सोने की करधनी पहन रखी है जो अच्छा करने की इच्छा रखती है, मुझे विजय दे।" इसके पश्चात अपरिजिता स्त्रोत्र का पाठ करना चाहिए और इसके बाद देवी का विसर्जन करना चाहिए। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार विजयदशमी के दिन माँ अपराजिता के पूजन करने से वर्ष भर कार्य आसानी से निर्विघ्न संपन्न होते है और शत्रु परास्त होते है। 
Pandit Anjani Kumar Dadhich
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