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Friday, 16 October 2020

शारदीय नवरात्रि

शारदीय नवरात्रि 
पंडित अंजनी कुमार के अनुसार माँ देवी भगवती की व‍िशेष पूजा और अर्चना का पर्व शारदीय नवरात्रि 17 अक्‍टूबर 2020 अर्थात कल से शुरू हो रहा है। यह पर्व 25 अक्टूबर तक चलेगा। इन नौ दिनों में मां भगवती की भक्ति से पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाएगा।
पंडित अंजनी कुमार के अनुसार देश के विभिन्‍न हिस्‍सों में इस त्‍योहार को अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है। कुछ लोग पूरी रात गरबा और आरती कर नवरात्र का व्रत रखते हैं तो वहीं कुछ लोग व्रत और उपवास रख मां दुर्गा और उनके नौ रूपों की पूजा-आराधना करते हैं। दरअसल नवरात्र अंत: शुद्धि का महानतम् त्‍योहार है।
पंडित अंजनी कुमार के अनुसार इस बार की शारदीय नवरात्रि अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण है क्‍योंक‍ि इस बार पूरे 58 वर्षों के बाद शनि, मकर में और गुरु, धनु राशि में रहेंगे। इससे पहले यह योग वर्ष 1962 में बना था। 
देवी माँ दुर्गा का वाहन और उसका महत्व
पंडित अंजनी कुमार के अनुसार देवी दुर्गा का वाहन तो शेर होता है। लेक‍िन नवरात्र में मां पृथ्‍वी पर द‍िनों के अनुसार आती हैं। मान्‍यता है क‍ि देवी मां क‍िस वाहन से आ रही हैं इसका व‍िशेष महत्‍व होता है। देवीभागवत पुराण के अनुसार मां दुर्गा का आगमन आने वाले भविष्य की घटनाओं के बारे में संकेत देता है।ऐसा माना जाता है क‍ि नवरात्र की शुरुआत सोमवार या रविवार को होती है तो इस दौरान हाथी पर सवार होकर आती है। वहीं अगर शनिवार या फिर मंगलवार को नवरात्रि की शुरुआत होती है तो मां घोड़े पर सवार होकर आती हैं। गुरुवार या शुक्रवार को नवरात्र का आरंभ होता है तो माता डोली में सवार होकर आती हैं। वहीं बुधवार के दिन मां नाव को अपनी सवारी बनाती हैं। तो इस बार नवरात्र की स्थापना 17 अक्‍टूबर 2020 के दिन शन‍िवार से हो रही हैं तो देवी मां इस बार घोड़े से आ रही हैं।कई धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार घोड़े को युद्ध का प्रतीक माना जाता है। घोड़े पर माता का आगमन शासन और सत्ता के लिए अशुभ माना गया है। इससे सरकार को विरोध का सामना करना पड़ता है।
पंडित अंजनी कुमार के अनुसार विजयदशमी 25 अक्टूबर 2020 रविवार के दिन है।रविवार के दिन विजयादशमी होने पर माता हाथी पर सवार होकर वापस कैलाश की ओर प्रस्थान करेगी । माता की विदाई हाथी पर होने से आने वाले वर्ष में खूब वर्षा होगी और इससे अन्न का उत्‍पादन अच्‍छा होता है।
पंडित अंजनी कुमार के अनुसार नवरात्रि की शुरुआत घट स्थापना के साथ ही होती है। हम घट स्थापना कर शक्ति की देवी तथा समस्त देवी शक्तियो का आह्वान करते है। 
नवरात्रि के पहले दिन यानी कि प्रतिपदा को सुबह स्नान कर लें। उसके बाद मंदिर की साफ-सफाई करने के बाद एक चौकी (पाटा) पर लाल वस्त्र बिछा कर मां दुर्गा और गणेश जी की मुर्ति या तस्वीर रखे। सबसे पहले गणेश जी और फिर मां दुर्गा का नाम लें।पंडित अंजनी कुमार के अनुसार कलश स्थापना के लिए एक तांबे के लोटे पर रोली से स्वास्तिक बनाएं। लोटे के ऊपरी हिस्सेे में मौली बांधें।
अब इस लोटे में पानी भरकर उसमें कुछ बूंदें गंगाजल की मिलाएं। फिर उसमें सवा रुपया, दूब, सुपारी, इत्र और अक्षत डालें। इसके बाद कलश में अशोक या आम के पांच पत्ते लगाएं।अब एक नारियल को मौली से बांध दें। फिर नारियल को कलश के ऊपर रख दें।अब इस कलश को धान की ढेरी बनाकर उस पर रख दे। 
अब मिट्टी के पात्र में मिट्टी डालकर उसमें जौ के बीज बोएं। 
कलश स्थापना के साथ ही नवरात्रि के नौ व्रतों को रखने का संकल्प लिया जाता है।
आप चाहें तो कलश स्थापना के साथ ही माता के नाम की अखंड ज्योति भी जला सकते हैं। अपने कष्ट निवारण या मनोवांछित वर पाने के लिए दुर्गा सप्तशती,अर्गला स्त्रोत्र, किलक स्त्रोत्र, दुर्गा चालीसा, दुर्गा कवच आदि का पाठ कर सकते हैं या दुर्गा माता के नाम की माला का जाप कर सकते हैं। 
 पंडित अंजनी कुमार के अनुसार कलश स्थापना महुर्त निम्नलिखित है-
प्रातःकाल 8:12 से 9:37 तक
दोपहर 12:00से 12:46 तक अभिजित महुर्त। 
Pandit Anjani Kumar Dadhich
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पुर्व पोस्ट
http://astroanjanikumardadhich.blogspot.com/2020/10/blog-post.html

Saturday, 10 October 2020

श्री दुर्गा सप्तशती और नवरात्र

श्री दुर्गा सप्तशती और नवरात्र
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार नवरात्रि के पावन पर्व के दौरान श्रीदुर्गा सप्तशती का पाठ करना लाभदायक माना जाता है। महर्षि मारकंडेय द्वारा रचित श्री दुर्गा सप्तशती के पाठ करने से घर की नकारात्मक ऊर्जा एवं उसका प्रभाव खत्म हो जाता है साथ ही मां के आशीर्वाद स्वरुप धन धान्य की वर्षों होती है और आरोग्यता के साथ रिद्धि सिद्धि की भी प्राप्ति होती है।            पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार नवरात्रि में मां की मूर्ति या तस्वीर को प्रतिष्ठित कर नौ दिनों तक पुजन करना चाहिए। इसके पश्चात नौ कुवांरी कन्याओं को भोजन करवाने से हमें नवरात्रि का शुभ फल मिलता है। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार नवरात्रि में माँ की पुजा करने की विधि निम्नलिखित है-
नवरात्र पूजा विधि
सर्वप्रथम देवी भगवती की मूर्ति या तस्वीर को एक चौखट पर लाल वस्त्र बिछाकर उस पर प्रतिष्ठापित करें। और कलश स्थापना करें। दीप प्रज्ज्जवलन करें(अखंड ज्योति जलाएं यदि आप जलाते हों या जलाना चाहते हों। ) माँ को नैवेद्य, पुष्प, पुष्पमाला अर्पित करते हुए षोडशोपचार विधि से पुजा करे। माँ भगवती और गणपति, शंकर जी, भगवान विष्णु, हनुमान जी और नवग्रह आदि का ध्यान करे और माता की आरती करे। इसके पश्चात उसके बाद माँ भगवती गणपति, शंकर जी, भगवान विष्णु, हनुमान जी नवग्रह और अपने गुरू का ध्यान करते हुए श्री दुर्गा सप्तशती के पाठ करने के लिए संकल्प लेकर पाठ आरंभ करे। 
पाठ विधि
संकल्प- श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ करने से पहले भगवान गणपति, शंकर जी का ध्यान करिए। उसके बाद हाथ में जौ, चावल और दक्षिणा रखकर देवी भगवती का ध्यान करिए और संकल्प लीजिए...हे भगवती मैं.....( अमुक नाम)....सपरिवार...( अपने परिवार के नाम ले लीजिए...)...गोत्र.( अमुक गोत्र)....स्थान ( जहां रह रहे हैं)... पूरी निष्ठा, समर्पण और भक्ति के साथ आपका ध्यान कर रहा हूं। हे भगवती आप हमारे घर में आगमन करिए और हमारी इस मनोकामना... ( मनोकामना बोलें लेकिन मन ही मन) को पूरा करिए। श्रीदुर्गा सप्तशती के पाठ, जप ( माला का उतना ही संकल्प करें जितनी नौ दिन कर सकें) और यज्ञादि को मेरे स्वीकार करिए। इसके बाद धूप, दीप, नैवेज्ञ के साथ भगवती की पूजा प्रारम्भ करें।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार श्रीदुर्गा सप्तशती के पाठ करने का अलग विधान है। कुछ अध्यायों में उच्च स्वर, कुछ में मंद और कुछ में शांत मुद्रा में बैठकर पाठ करना श्रेष्ठ माना गया है। जैसे कीलक मंत्र को शांत मुद्रा में बैठकर मानसिक पाठ करना श्रेष्ठ है। देवी कवच उच्च स्वर में और श्रीअर्गला स्तोत्र का प्रारम्भ उच्च स्वर और समापन शांत मुद्रा से करना चाहिए। देवी भगवती के कुछ मंत्र यंत्र, मंत्र और तंत्र क्रिया के हैं। संपूर्ण दुर्गा सप्तशती स्वर विज्ञान का एक हिस्सा है।
वाकार विधि: - प्रथम दिन एक पाठ प्रथम अध्याय, दूसरे दिन दो पाठ द्वितीय, तृतीय अध्याय, तीसरे दिन एक पाठ चतुर्थ अध्याय, चौथे दिन चार पाठ पंचम, षष्ठ, सप्तम व अष्टम अध्याय, पांचवें दिन दो अध्यायों का पाठ नवम, दशम अध्याय, छठे दिन ग्यारहवां अध्याय, सातवें दिन दो पाठ द्वादश एवं त्रयोदश अध्याय करके एक आवृति सप्तशती की होती है। 
संपुट पाठ विधि: - किसी विशेष प्रयोजन हेतु विशेष मंत्र से एक बार ऊपर तथा एक नीचे बांधना उदाहरण हेतु संपुट मंत्र मूलमंत्र-1, संपुट मंत्र फिर मूलमंत्र अंत में पुनः संपुट मंत्र आदि इस विधि में समय अधिक लगता है। लेकिन यह अतिफलदायी है। अच्छा यह होगा कि आप संपुट के रूप में अर्गला स्तोत्र का कोई मंत्र ले लीजिए। 
अथवा
कोई बीज मंत्र जैसे ऊं श्रीं ह्रीं क्लीं दुर्गायै नम: ले लें या ऊं दुर्गायै नम: से भी पाठ कर सकते हैं। 
 Pandit Anjani Kumar Dadhich
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Thursday, 20 August 2020

पितृपक्ष के बारे में

🌻पितृपक्ष के बारे में🌻
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार हिंदू धर्म में वैदिक परंपरा के अनुसार अनेक प्रकार के रीति-रिवाज और संस्कार जो कि व्यक्ति के गर्भधारण से लेकर मृत्योपरांत तक किये जाते हैं। अंत्येष्टि को भी अंतिम संस्कार माना जाता है। लेकिन अंतिम संस्कार के पश्चात भी कुछ ऐसे कर्म होते हैं जिन्हें मृतक की संतान को करना होता है श्राद्ध कर्म उन्हीं में से एक है।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनके तर्पण के निमित्त श्रद्धा पूर्वक किया जाने वाले कर्म को श्राद्ध के नाम से जाना जाता है। श्राद्ध का अर्थ है श्रद्धा पूर्वक अपने पितरों के प्रति सम्मान प्रगट करने से है। वैसे तो प्रत्येक मास की अमावस्या तिथि को श्राद्ध कर्म किया जा सकता है परन्तु श्राद्ध पक्ष अपने पूर्वजों को जो इस धरती पर नहीं है उन्हें एक विशेष समय में 15 दिनों की अवधि तक सम्मान दिया जाता है। इस अवधि को पितृ पक्ष या श्राद्ध पक्ष कहते हैं जो भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास की अमावस्या तक एक पूरा पखवाड़ा पितरो हेतु किया जाने वाला कर्म विधान है। इस वर्ष पितृ पक्ष का प्रारंभ 17 सितंबर 2024 से होगा और पितृपक्ष का समापन 02 अक्टूबर 2024 को होगा। मान्यता है कि इस दौरान पितरों के निमित तर्पण करते हुए ब्राह्मणों को भोजन, गायों को चारा खिलाने और दान-पुण्य करने से साधक को सभी परेशानियों से मुक्ति मिलती है। गरुड़ पुराण में वर्णित है कि इस पितृ पखवाड़े में घर के पुर्वज या पितृ धरती पर पंछी (कौए) के रूप मे रहने के लिए आते हैं। 
 श्राद्ध पक्ष का महत्व
पितरों की आत्मा की शांति के लिए पितृ पक्ष में तर्पण और पिंडदान को सर्वोत्तम माना गया है और शास्त्रों के अनुसार जिन लोगों को पितृ उनसे प्रसन्न नहीं होते उन्हें पितृ दोष का श्राप मिलता है और जिस भी घर में पितृ दोष का श्राप लगता है उस घर के सदस्य कभी भी सुखी नहीं रहते और न हीं वह जीवन में सफलता को प्राप्त करते। इसी कारण से पितृ पक्ष में पितरों का तर्पण किया जाता है और उनसे श्रमा याचना की जाती है।पितृ पक्ष में व्यक्ति मृत्यु तिथि के आधार पर श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। जिस तिथि पर व्यक्ति की मृत्यु होती है उसी तिथि पर उसके लिए श्राद्ध करना चाहिए। अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु तिथि मालूम नहीं है तो उसके लिए सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या पर श्राद्ध किया जा सकता है।
श्राद्ध कर्म करने का तरीका
✾ श्राद्ध कर्म के दिन साधक को सुबह जल्दी उठना चाहिए और बिना सिले वस्त्र धारण करने चाहिए। 
✾ श्राद्ध के दिन अपने पूर्वजों को तर्पण देने के लिए काले तिल, कुशा,चावल और जौ को सम्मिलित कर तर्पण उन्हें अर्पित करें।
✾ तर्पण अर्पित करने के बाद पितरों की शांति हेतु एक छोटा सा यज्ञ या हवन करना चाहिए। 
✾ पितरों का पसंदीदा भोजन बनवाएं और भोजन की पिंडी बनाकर उन्हें अर्पित करें।
✾सबसे पहले गाय कुता और कौओं को भोजन करवाए। क्योंकि पितृ पक्ष में कौए को पितरों का रूप माना जाता है।
✾इसके बाद जनेऊ धारी ब्राह्मण को भोजन कराकर उन्हें वस्त्र और दक्षिणा दें। 
✴️पितृ पक्ष की तिथियां ✴️ 
✿17 सितंबर 2024 (मंगलवार) - पूर्णिमा श्राद्ध
✿ 18 सितंबर 2024 (बुधवार)- प्रतिपदा श्राद्ध
✿ 19 सितंबर 2024 (गुरुवार)- द्वितीया श्राद्ध
✿ 20 सितंबर 2024 (शुक्रवार) - तृतीया श्राद्ध
✿ 21 सितंबर 2024 ( शनिवार)- चतुर्थी श्राद्ध
✿ 22 सितंबर, 2024 (रविवार) - पंचमी श्राद्ध
✿ 23 सितंबर, 2024 (सोमवार) - षष्ठी श्राद्ध + सप्तमी श्राद्ध,y999v
✿ 24 सितंबर, 2024 (मंगलवार) - अष्टमी श्राद्ध
Q✿25 सितंबर, 2024 (बुधवार) - नवमी श्राद्ध
✿26 सितंबर, 2024 (गुरुवार) - दशमी श्राद्ध
✿27 सितंबर, 2024 (शुक्रवार) - एकादशी श्राद्ध
✿ 28 सितंबर, 2024 (शनिवार) - कोई श्राद्ध नहीं 
✿29 सितंबर, 2024 (रविवार) - द्वादशी श्राद्ध
✿29 सितंबर, 2024 (रविवार) - माघ श्राद्धrr
✿30 सितंबर, 2024 (सोमवार) - त्रयोदशी श्राद्ध
✿ 1cvgdd ji अक्टूबर, 2024 (मंगलवार) - चतुर्दशी श्राद्ध
✿ 2 अक्टूबर, 2024 (बुधवार) - सर्व पितृ अमावस्या
 Pandit Anjani Kumar Dadhich
पंडित अंजनी कुमार दाधीच [पुरोहित कर्म (यज्ञ-हवन - पुजा-अनुष्ठान) विशेषज्ञ, वैदिक ज्योतिषी, अंक ज्योतिषी एवं वास्तुविद ]
Nakshatra Jyotish Sansthaan
नक्षत्र ज्योतिष संस्थान
panditanjanikumardadhich@gmail.com
सम्पर्क सूत्र - 06377054504

Wednesday, 5 August 2020

श्री कृष्ण जन्माष्टमी

🌻श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पुजा और उपवास 🌻पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार श्रीकृष्ण जन्माष्टमी भगवान श्री कृष्ण का जनमोत्सव का दिन है।भगवान श्री नारायण ने श्रीकृष्ण रुप में स्वयं पृथ्वी पर भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी और रोहिणी नक्षत्र में मध्यरात्रि को अत्याचारी कंस का विनाश करने के लिए मथुरा में जन्म लिया।इसलिए इस दिन को हम कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं। योगेश्वर कृष्ण के भगवद्गीता के उपदेश अनादि काल से जनमानस के लिए जीवन दर्शन प्रस्तुत करते रहे हैं। जन्माष्टमी को भारत में हीं नहीं बल्कि विदेशों में बसे भारतीय भी पूरी आस्था व उल्लास से मनाते हैं। 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार इस दिन भगवान श्री कृष्ण की पुजा अर्चना और उपवास करने का एक अलग ही महत्व है।श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का व्रत सभी आयु वर्ग के लोग कर सकते हैं परन्तु जिनको स्वास्थ्य समस्याएं हैं वे न करें तो अच्छा है।वे व्रत न रखकर  केवल भगवान की आराधना करें। स्कन्द पुराण के मतानुसार जो भी व्यक्ति जानकर भी कृष्ण जन्माष्टमी व्रत को नहीं करता है वह मनुष्य जंगल में सर्प और व्याघ्र होता है तथा भविष्य पुराण मे कहा है कि भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष में कृष्ण जन्माष्टमी व्रत को जो मनुष्य नहीं करता है वह क्रूर राक्षस होता है।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर भगवान की पुजन और व्रत करने का महत्व- पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार जब कृष्णाष्टमी हो तो उसमें कृष्ण का अर्चन और पूजन करने से तीन जन्मों के पापों का नाश होता है। उनके पास सदैव स्थिर लक्ष्मी होती है। इस व्रत के करने के प्रभाव से उनके समस्त कार्य सिद्ध होते हैं। 
जन्माष्टमी पर उपवास करने के नियम-
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार जन्माष्टमी व्रत में अष्टमी के उपवास से पूजन और नवमी के पारणा से व्रत की पूर्ति होती है। इस व्रत के करने वाले को  जन्माष्टमी व्रत से एक दिन पूर्व अर्थात सप्तमी को हल्का तथा सात्विक भोजन करना चाहिए तथा अपनी सभी इंद्रियों और अपने मन को काबू में रखना चाहिए। भगवान श्री कृष्ण का पुजन करना चाहिए और पुजन में देवकी, वासुदेव, बलदेव, नन्द, यशोदा और लक्ष्मी जी इन सबका नाम क्रमशः लेते हुए विधिवत पूजन करना चाहिए।जन्माष्टमी का व्रत रात्रि बारह बजे के बाद ही खोला जाता है। इस व्रत में अनाज का उपयोग नहीं किया जाता है किन्तु फलहार के रूप में कुट्टू के आटे की पकौड़ी, मावे की बर्फ़ी और सिंघाड़े के आटे का हलवे का उपयोग किया जाता है।
पुजा करने की विधि -
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार भगवान श्री कृष्ण का पुजन करने के लिए सर्वप्रथम एक चोकी स्थापित करना चाहिए तथा चौकी पर लाल कपड़ा बिछाना चाहिए।भगवान कृष्ण की मूर्ति उस चौकी पर एक पात्र में रखे और अब दीपक जलाएं और धूपबत्ती भी जला ले। फिर हाथ जोड़कर भगवान कृष्ण का आह्वान करें कि 'हे भगवान श्रीकृष्ण ! मुझ दास पर कृपा कर आप पधारिए और मेरी पूजा ग्रहण कीजिए। इसके बाद भगवान श्री कृष्ण का दक्षिणमुखी शंख से पंचामृत और गंगाजल से अभिषेक कर षोडशोपचार विधी से पुजा करे।अब श्री कृष्ण को वस्त्र पहनाएं और श्रृंगार करे। इस के बाद भगवान कृष्ण को दीप और धूप दिखाएं। अष्टगंध चन्दन या रोली का तिलक लगाएं और साथ ही अक्षत (चावल) भी तिलक पर लगाएं। माखन, मिश्री, नैवेद्य और अन्य भोग सामग्री का भोग लगाए और तुलसी का पत्ता विशेष रूप से अर्पण करे और साथ ही पीने के लिए गंगाजल रखें। अब श्री कृष्ण का ध्यान करे और प्रार्थना करे कि मैं आप श्री कृष्ण को प्रणाम करता हुं या करती हूं और आप मुझे अपने चरणों में अनन्य भक्ति प्रदान करें। इसके बाद विसर्जन के लिए हाथ में फूल और चावल लेकर चौकी पर छोड़ें और कहें कि हे भगवान् कृष्ण! मेरी पूजा में पधारने के लिए आपका कोटि कोटि धन्यवाद। कृपया मेरी पूजा और जप ग्रहण कीजिए और पुनः आप अपने दिव्य धाम को पधारिए।
Pandit Anjani kumar Dadhich
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Monday, 27 July 2020

राखी

🏵रक्षाबंधन पर्व🏵


पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार भारत में श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन रक्षाबंधन पर्व मनाया जाता है। इस पर्व को राखी, श्रावणी, सावनी, और सलूनों के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन राखी के धागे को कवच सा शक्तिशाली माना गया है, जो कच्चे सूत, रंगीन कलावे और रेशमी धागे से निर्मित है। राखी का यह धागा रक्षा के संकल्प का पवित्र प्रतीक है। यह आंतरिक और बाह्य भय के उन्मूलन का पर्व है। इस पर्व भाई-बहन, गुरु-शिष्य, प्रकृति और मनुष्य के मध्य तारतम्य स्थापित कर सक्षम और समर्थ से अबला और कमजोर की सुरक्षा के संकल्प का त्योहार है। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार 3 अगस्त 2020 को यानि सावन के समापन के साथ पूर्णिमा के दिन रक्षाबंधन का पर्व  सर्वार्थ सिद्धी योग एवं आयुषमान योग की संधि में मनाया जाएगा। इसी दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधेंगी
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार रक्षाााबंधन के दिन भद्रा प्रातः 9:28 बजे तक रहेेेेेेेेेगी। 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार राखी बांधने के महुर्त निम्नलिखित है-
शुभ का चोघड़िया प्रातः 9:30 से 11:00 बजे तक रहेगा। 
अभिजित मुर्ख दोपहर 12:18 से1:10 बजे तक रहेगा। 
लाभ -अमृत का चोघड़िया दोपहर 4:02 से 7:20 बजे तक रहेगा। 
Pandit Anjani kumar Dadhich
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