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Monday, 23 September 2024

नवरात्रि

नवरात्रि पर्व 
मैं पंडित अंजनी कुमार दाधीच आज इस लेख में "नवरात्रि पर्व" के बारे में जानकारी दे रहा हूं।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार शारदीय नवरात्र आदि शक्ति मां दुर्गा के नौ रूपों को समर्पित है। इस नौ दिनों में देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है। श्राद्ध के आखिरी दिन शाम से नवरात्र की तैयारियां शुरू होने लगती हैं। इस बार अंतिम श्राद्ध या सर्वपितृ अमावस्या 2 अक्टूबर 2024 को है। इसके बाद प्रतिपदा 3 अक्टूबर 2024 से नवरात्रि का पर्व शुरू हो जाएगा। नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना की जाती है। इसके बाद अष्टमी और नवमी को कन्या पूजन कर अगले दिन दशहरा पर्व मनाया जाएगा। नवरात्र में मां के आगमन पर और प्रस्थान पर विचार किया जाता है। मां का आगमन और प्रस्थान उनके आने के दिन पर निर्भर करता है। इस बार नवरात्रि का पर्व 3 अक्टूबर को शुरू हो रहा है। 3 अक्टूबर 2024 को गुरुवार है और माता का आगमन पालकी में हो रहा है। देवी पुराण के अनुसार पालकी की सवारी को शुभ माना गया गया है। हालांकि पालकी की सवारी को आंशिक महामारी का कारण भी माना गया है। इस वर्ष मां भगवती चरणायुध यानी बड़े पंजे वाले मुर्गे पर सवार होकर जा रही हैं जिसका राष्ट्र पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। 
Pandit Anjani Kumar Dadhich
पंडित अंजनी कुमार दाधीच [पुरोहित कर्म (यज्ञ-हवन - पुजा-अनुष्ठान) विशेषज्ञ, वैदिक ज्योतिषी, अंक ज्योतिषी एवं वास्तुविद ]
Nakshatra Jyotish Sansthaan
नक्षत्र ज्योतिष संस्थान
panditanjanikumardadhich@gmail.com
सम्पर्क सूत्र - 06377054504

Sunday, 15 September 2024

वामन जन्मोत्सव (जयंती)

वामन जन्मोत्सव (जयंती)
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार हिंदू धर्म में वामन जन्मोत्सव या वामन जयंती का बहुत महत्व है। वामन जन्मोत्सव प्रत्येक वर्ष भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णुजी के वामन अवतार की पूजा की जाती है।
श्रीमद् भागवत गीता के अनुसार भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को अभिजीत मुहूर्त में श्रवण नक्षत्र में माता अदिति व कश्यप ऋषि के यहां वामन भगवान का जन्म हुआ था। वैदिक पंचांग के अनुसार इस साल 15 सितंबर 2024, रविवार यानी आज के दिन वामन जन्मोत्सव या वामन जयंती मनाई जाएगी।आज के दिन सुकर्मा योग और श्रवण नक्षत्र भी है। इसीलिए आज के दिन का महत्व और भी अधिक हो जाता हैं। भगवान विष्णु ने असुरराज बलि का घमंड तोड़ने और भक्ति की जीत के लिए वामन रूप धारण किया था और उन्होंने तीन पग भूमि मांगकर पूरे ब्रह्मांड को माप दिया था जिससे राजा बलि का अहंकार नष्ट हुआ था।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार भगवान विष्णुजी के वामन अवतार की पूजा-आराधना बेहद शुभ फलदायी है। इस दिन व्रत और भगवान के वामन अवतार का पूजन के कार्यों से व्यक्ति के सभी दुख-पाप नष्ट होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि और खुशहाली आती है। यह पावन पर्व वामन भगवान की पूजा-आराधना के साथ आध्यात्मिक उन्नति और धर्म की रक्षा का प्रतीक माना जाता है। इस दिन भगवान वामन की पूजा करने से भक्त मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं और अपने पिछले जन्म के सभी पापों और कष्टों से छुटकारा पा सकते हैं। इसके अलावा भगवान विष्णु उन्हें सभी सांसारिक सुखों और खुशियों का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
भगवान वामन देव की पूजा के लिए शुभ मुहूर्त अभिजित मुहूर्त रहेगा।
वामन जन्मोत्सव पर भगवान वामन की पुजा करने की विधि निम्नलिखित है -
वामन जन्मोत्सव या जयंती के दिन सुबह जल्दी उठकर शुद्ध स्नान के बाद भगवान विष्णु के अवतार भगवान वामनदेव की पूजा का संकल्प लेना चाहिए।
घर के मंदिर में भगवान विष्णुजी के वामन स्वरूप की प्रतिमा या भगवान विष्णु की प्रतिमा को एक चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर उस पर स्थापित करें।
भगवान वामन को पंचामृत से स्नान कराने के बाद उन्हें रोली, मौली, तुलसी, पीले फूल, नैवेद्य के साथ मख्खन और मिश्री का भोग अर्पित करें। 
पूजा के बाद विष्णु सहस्त्रनाम, वामन स्त्रोत और ओम् भगवते वासुदेवाय नमः मंत्र का 108 बार जाप करें।
भगवान विष्णु के अवतार वामन देव की कथा श्रवण करना चाहिए। कथा श्रवण के बाद वामनदेव की आरती करने के साथ पूजा को समाप्त करें।
इस दिन व्रत करने वालों को दान-पुण्य भी करना चाहिए।
Pandit Anjani Kumar Dadhich
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Wednesday, 11 September 2024

परिवर्तनी एकादशी

परिवर्तनी एकादशी व्रत 

पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार सनातन धर्म संस्कृति में एकादशी व्रत भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है। हर महीने दो एकादशी (एक कृष्ण पक्ष में दूसरी शुक्ल पक्ष में) व्रत आते है। 03 सितंबर 2025 बुधवार अर्थात आज परिवर्तिनी एकादशी व्रत रखा जाएगा। परिवर्तिनी एकादशी को जलझूलनी एकादशी डोल ग्यारस या पार्श्व एकादशी भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु योग निद्रा से करवट लेते हैं। सभी एकादशीयों का अपना अलग ही महत्व है जिसमें से परिवर्तनी एकादशी का महत्व अधिक है।

परिवर्तनी एकादशी व्रत का फल-  

परिवर्तिनी एकादशी व्रत करने से भगवान विष्णु की कृपा से आर्थिक कष्ट दूर होते हैं। धन-धान्य में वृद्धि होती है और जीवन में खुशहाली आती है। इस दिन शाम को तुलसी के पौधे का पुजन करते समय ओम् नमो भगवते वासुदेवाय नमः मंत्र का 108 बार जाप करें।भगवान विष्णु का दक्षिणावर्ती शंख से दुग्धाभिषेक करे उसके बाद षोडशोपचार पूजन विधि से पूजन कर विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र या गीता के निम्नलिखित श्लोको का पाठ करना चाहिए।

गीताजीके नित्य-पठनीय पाँच श्लोक 

वसुदेव सुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् ।

देवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ।।

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतनामीश्वरोऽपि सन् ।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया।।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।।

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन।।

वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः।।

वसुदेव सुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् ।
देवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ।।

कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ।।

लेखक परिचय- Pandit Anjani Kumar Dadhich

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Tuesday, 10 September 2024

ज्येष्ठा गौरी पुजा महापर्व

ज्येष्ठा गौरी (महालक्ष्मी) पुजा महापर्व
प्रिय मित्रों 
मैं पंडित अंजनी कुमार दाधीच आज इस लेख में ज्येष्ठा गौरी पुजा महापर्व के बारे में जानकारी दे रहा हूं।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार हिन्दू धर्म के त्यौहारों में से एक ज्येष्ठा गौरी (महालक्ष्मी) पुजा महापर्व है जो महाराष्ट्र के मुख्य पर्वों में से एक है। जो हिन्दू पंचांग के अनुसार भाद्रपद में महालक्ष्मी का तीन-दिवसीय पुजन किया जाता है उसे ज्येष्ठा गौरी व्रत भी कहते हैं। मराठी महिलाएं यह व्रत अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए करती है। विशेषतया यह त्यौहार गणेश चतुर्थी के दौरान मनाया जाता है और ज्येष्ठा गौरी आवाहन से शुरू होकर तीन दिनों तक मनाया जाता है । मार्गशीर्ष माह के सभी गुरुवारों को भी महालक्ष्मी का व्रत रखा जाता है। दोनों ही व्रतों को रखने की तिथि और परंपरा अलग-अलग है। तीन दिनों तक मनाई जाने वाली इस ज्येष्ठा गौरी पूजा में भाद्रपद शुक्ल पक्ष में अनुराधा नक्षत्र में माता महालक्ष्मी का आगमन होता है ज्येष्ठा नक्षत्र में पूजा और भोग होता है एवं मूल नक्षत्र में उनका विसर्जन होता है। इस बार अनुराधा नक्षत्र 10 सितंबर 2024 को रहेगा। इस दिन ज्येष्ठा गौरी का आगमन, आवाहन और स्थापना की जाती है।
भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष के अनुराधा नक्षत्र में भारतीय पुजन पद्धति के अनुसार ज्येष्ठा गौरी( महालक्ष्मी देवी) की प्रतिमा या प्रतीक को स्थापित किया जाता हैं। ज्येष्ठा नक्षत्र में महालक्ष्मी का पूजन कर महानैवेद्य का भोग लगाया जाता है। तीसरे दिन मूल नक्षत्र में महालक्ष्मी का विसर्जन किया जाता है। ज्येष्ठा गौरी को महालक्ष्मी माना जाता है और चूँकि उनकी पूजा ज्येष्ठा नक्षत्र में की जाती है इसलिए उन्हें ज्येष्ठा गौरी कहा जाता है।
यह व्रत धन और समृद्धि की देवी महालक्ष्मी को प्रसन्न करने तथा उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए किया जाता है। इससे घर में सुख, शांति के साथ ही समृद्धि बनी रहती है। महाराष्ट्रीयन परिवारों में भाद्रपद माह में महिलाएं अखंड सौभाग्य के लिए ज्येष्‍ठा गौरी की पूजा करती हैं।
 1. पहला दिन आगम : पहले दिन मां महालक्ष्मी का आह्वान करते हैं जब उनका आगमन होता है और उन्हें विराजमान करके उनकी पूजा करते हैं। इस बार 10 सितंबर 2024 मंगलवार को आगमन रहेगा। इस दिन व्रत रखते हैं।
 2. दूसरा दिन भोग : इस दिन मां महा लक्ष्मी को सभी तरह के भोग लगाएं जाते हैं और उत्सव मनाया जाता है। इस बार मुख्य पूजा और महानैवद्य 11 सितंबर 2024 बुधवार को रहेगा। 
3. तीसरा दिन विसर्जन : इस दिन माता लक्ष्मी की विदाई होती हैं यानी विसर्जन‍ किया जाता है। 12 सितंबर 2024 गुरुवार को विसर्जन होगा।
 4. 16 दिनी व्रत : कुछ परिवारों में महालक्ष्मी व्रत निरन्तर सोलह दिनों तक मनाया जाता है। इस बार 10 सितंबर से 24 सितंबर मंगलवार तक यह व्रत चलेगा। 
 ज्येष्ठा गौरी स्थापना के शुभ मुहूर्त
ज्येष्ठ गौरी आगमन:10 सितम्बर मंगलवार 2024 को
ज्येष्ठ गौरी आवाहन एवं स्थापना: सुबह 06:25 से शाम 06:45 के बीच।
अभिजीत मुहूर्त में आवाहन एवं स्थापना: दोपहर 12:10 से 01:00 के बीच।
अनुराधा नक्षत्र प्रारम्भ - 09 सितम्बर 2024 को शाम 06:04 बजे से।
अनुराधा नक्षत्र समाप्त - 10 सितम्बर 2024 को रात्रि 08:04 बजे तक रहेगा।
उपरोक्त समय में ज्येष्ठा गौरी(महालक्ष्मी) को विराजमान कर सकते हैं।
 ज्येष्ठा गौरी पूजा और भोग 11 सितंबर बुधवार 2024 को होगा।
11 सितंबर 2024 की पूजा का शुभ मुहूर्त:-
ब्रह्म मुहूर्त- प्रात: 04:32 से 05:18 तक।
प्रातः सन्ध्या- प्रात: 04:55 से 06:04 तक।
अमृत काल- दोपहर 12:05 से 01:46 तक। 
विजय मुहूर्त- दोपहर 02:22 से 03:12 तक।
गोधूलि मुहूर्त- शाम 06:31 से 06:54 तक।
सायाह्न सन्ध्या- शाम 06:31 से 07:40 तक।
ज्येष्ठा गौरी विसर्जन 12 सितंबर बृहस्पतिवार को होगा।
लेखक परिचय- Pandit Anjani Kumar Dadhich
पंडित अंजनी कुमार दाधीच [पुरोहित कर्म (यज्ञ-हवन - पुजा-अनुष्ठान) विशेषज्ञ, वैदिक ज्योतिषी, अंक ज्योतिषी एवं वास्तुविद ]
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Sunday, 8 September 2024

ऋषि पंचमी

ऋषि पंचमी 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार हिन्दू धर्म शास्त्रों में ऋषि मुनियों को समर्पित ऋषिपंचमी का त्यौहार भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाया जाता है। यह त्यौहार गणेश चतुर्थी के अगले दिन होता है। इस त्यौहार में सप्त ऋषियों के प्रति श्रद्धा भाव व्यक्त किया जाता है। पंचांग के अनुसार इस वर्ष ऋषि पंचमी का पर्व 08 सितंबर 2024 रविवार को सप्त ऋषियों की पूजा के साथ मनाया जाएगा। इस दिन सप्त ऋषियों - कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, वशिष्ठ, गौतम, जमदग्नि, और विश्वामित्र की पूजा की जाती है। इनके अलावा देवी अरुंधती की पुजा की जाती है। वैदिक शास्त्रों में इन सभी सात ऋषि ब्रह्मा, विष्णु और महेश के अंश माना जाता हैं और साथ ही इनको ही वेदों और धर्मशास्त्रों के रचयिता माने जाते हैं। ऋषिपंचमी का व्रत को करने से सभी प्रकार के पापों से मुक्ति मिलती है और जीवन में सुख-शांति आती है। ऋषि पंचमी के व्रत को विशेषकर महिलाओं के द्वारा अपने पति के प्रति विश्वास, प्रेम तथा दीर्घायु होने की कामना पूर्ति हेतु और मासिक धर्म के दौरान अनजाने में हुए पापों से मुक्ति के लिए किया जाता है। विशेषकर महिलाये मासिक धर्म के बंद होने पर यह व्रत करने की परंपरा है। इस व्रत को करने वाली महिलाओं को कुशा से सप्त ऋषि बनाकर उनका षोडशोपचार पूजन विधि से पूजन करना चाहिए और सप्तऋषि पूजन में चढ़ाए सभी वस्तुओं को किसी जनेऊधारी ब्राह्मण को दान कर देना चाहिए।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार इस व्रत को करने के लिए कुछ कठिन नियम है जिनका पालन करना आवश्यक है जो कि निम्नलिखित है - 
✿ कोई भी महिला यह व्रत करना आरम्भ करे तो लगातार पुरे सात वर्ष तक करना चाहिए। यदि कोई भी शारीरिक अस्वस्थता या तकलीफ हो तब यह व्रत बीच में छोड़ सकते है।
✿ इस व्रत को करने वाली महिलाओं को पवित्र मन से और ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए व्रत करना चाहिए। इस व्रत कोअ करने वाली महिलाओं को शारीरिक संबंध स्थापित नहीं करना चाहिए।
✿ इस व्रत को करने वाली महिलाओं को बिना नमक का फलाहार रुपी भोजन करना होता है। 
✿ इस व्रत को करने वाली महिलाओं को प्रचलित धार्मिक रीति रिवाजों के अनुसार भोजन में दूध, दही, आलू की सेवई, फल, और भाप या उबाली हुई गाजर,आलू जैसी सब्जियां आदि भोजन रुप में लेने का नियम है।
✿ इस व्रत को करने वाली महिलाओं को हल से जोते हुए खेत का अन्य धान्य भोजन रुप में खाना वर्जित है।
✿ इस व्रत करने वाली महिलाओं को दिन में निराहार रहकर या परिस्थिति वस केवल एक बार भोजन करना होता है।
जो महिलाएं ऋषि पंचमी का व्रत रखती है उन्हें अगले दिन ✿ सूर्योदय के बाद ही पारण करके व्रत को समाप्त करना चाहिए क्योंकि बिना पारण के ऋषि पंचमी का व्रत अधूरा माना जाता है।
✿ इस व्रत को करने वाली महिलाओं को झुठ नहीं बोलना चाहिए।
✿ इस व्रत को करने वाली महिलाओं को क्रोध नहीं करना चाहिए।
✿ इस व्रत को करने वाली महिलाओं को किसी को कष्ट नहीं पहुंचाना चाहिए।
✿ इस व्रत को करने वाली महिलाओं को किसी का अपमान या किसी पर नकारात्मक कटाक्ष नहीं करना चाहिए।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार ऋषि पंचमी को सप्त ऋषियों की पुजा विधि निम्नलिखित है -
🔅ऋषि पंचमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत हो जाएं।
🔅घर व मंदिर की अच्छे से साफ-सफाई करें और पूजा स्थान पर एक चौकी रखें।
🔅सभी पूजा सामग्री जैसे धूप, दीप, फल, फूल, घी, पंचामृत आदि एकत्रित कर लें।
🔅चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाने के बाद सप्तऋषि की तस्वीर या कुशा से सप्त ऋषि बनाकर स्थापित करें और कलश में गंगाजल भरकर रख लें। यदि आप चाहें तो अपने गुरु की तस्वीर भी स्थापित कर सकते हैं।
🔅कलश से जल लेकर सप्तऋषियों को अर्ध्य दें और धूप-दीप दिखाएं।
🔅 अब उनका ( सप्तऋषियों का) रोली, मोली, अक्षत, पुष्पमाला, जनेऊ, फल-फूल और नैवेद्य आदि अर्पित करते हुए षोडशोपचार विधि से पूजन करें।
🔅सप्तऋषियों के मंत्र 
कश्यपोत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोथ गौतमः।
जमदग्निर्वसिष्ठश्च सप्तैते ऋषयः स्मृताः॥
दहंतु पापं सर्व गृह्नन्त्वर्ध्यं नमो नमः॥
या "ओम् सप्तऋषये नमः” मंत्र का कम से कम 11, 21, 51,108 बार जाप करें और अंत में अपनी गलतियों के लिए क्षमा याचना करते हुए सप्तऋषियों से आशीर्वाद लें।
🔅पूजा के अंत में सभी लोगों में प्रसाद वितरित कर बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद अवश्य लें।
लेखक परिचय- पंडित अंजनी कुमार दाधीच 
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Sunday, 18 August 2024

रक्षाबंधन पर्व का शुभ मुहूर्त एवं नियम

रक्षाबंधन पर्व का शुभ मुहूर्त एवं नियम 
प्रिय पाठकों 
मैं पंडित अंजनी कुमार दाधीच आज इस लेख में रक्षाबंधन पर्व का शुभ मुहूर्त एवं नियम के बारे में जानकारी दे रहा हूं।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार भारत में श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन रक्षाबंधन पर्व मनाया जाता है। इस पर्व को राखी, श्रावणी, सावनी, और सलूनों के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन राखी के धागे को कवच सा शक्तिशाली माना गया है, जो कच्चे सूत, रंगीन कलावे और रेशमी धागे से निर्मित है। राखी का यह धागा रक्षा के संकल्प का पवित्र प्रतीक है। यह आंतरिक और बाह्य भय के उन्मूलन का पर्व है। इस पर्व भाई-बहन, गुरु-शिष्य, प्रकृति और मनुष्य के मध्य तारतम्य स्थापित करने के लिए भी राखी बांधी जाती है।प्रत्येक धार्मिक कर्म यानी पूजा-पाठ, उदघाटन, यज्ञ, हवन, संस्कार आदि के पूर्व पुरोहितों द्वारा यजमान के दाएं हाथ में राखी (रक्षासूत्र) बांधी जाती है।
इस साल राखी का त्योहार 19 अगस्त 2024 को मनाया जाएगा। इस त्यौहार में सभी  बहने अपने भाईयों को राखी बांधकर और मिठाइयां खिलाकर अपनी खुशी व्यक्त करती हैं। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार राखी बांधने का शुभ मुहूर्त निम्नलिखित है-
इस साल राखी का त्योहार सभी के लिए लाभ योग से भरा हुआ है। हिन्दू पंचांग के मुताबिक मकर राशि में चंद्रमा होने के कारण 19 अगस्त 2024 को पाताल लोक की भद्रा रहेगी जो सुबह में 5:53 मिनट पर प्रारंभ होगी और दोपहर 01: 32 मिनट पर समाप्त होगी। धर्म शास्त्रों के अनुसार भद्रा काल में रक्षासूत्र बांधा जाना अनुचित या अशुभ माना जाता है। अत: भद्रा समाप्ति के पश्चात् ही राखी बांधी जाए।
दिनांक 19 अगस्त 2024 को राखी बांधने का शुभ मुहूर्त दोपहर 1:33 से रात्रि 9:07 तक रहेगा।
दोपहर 1:33 PM से 4:19 PM तक।
प्रदोष काल का मुहूर्त – शाम 6:56 PM से रात्रि 9:07 PM तक।
रक्षाबंधन पर कई शुभ योग बन रहे हैं जिसमे रवि योग और सर्वार्थ सिद्ध, शश राजयोग, बुधादित्य और शुक्रादित्य राजयोग आदि योगों का भी नाम शामिल है।इस दिन सूर्य देव भी अपनी स्वराशि में संचरण कर रहे हैं और साथ ही शनि देव भी शश राजयोग बनाकर विराजमान हैं। इसके साथ ही बुध और शुक्र भी इस राशि में होंगे जिससे बुधादित्य और शुक्रादित्य राजयोग का बन रहा है।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार सनातन धर्म में कलावा (रक्षासूत्र) या राखी बांधने की परंपरा सदियों से चली आ रही हैं। यह लाल और पीले रंग का धागा शुभता और ईश्वर की कृपा का माध्यम माना जाता है। वैदिक शास्त्रों में भी रक्षा सूत्र को महत्वपूर्ण स्थान दिया है। रक्षा सूत्र को लेकर आज भी तमाम लोगों को पूरी जानकारी नहीं है अतः उनके बारे में कुछ ध्यान रखने योग्य जानकारी है जिनका रक्षाबंधन पर्व मनाते समय विशेष ध्यान रखना चाहिए जो है-
✿ शास्त्रों अनुसार पुरुषों और अविवाहित कन्याओं को दाएं हाथ में रक्षासूत्र बांधना चाहिए वहीं विवाहित स्त्रियों के लिए बाएं हाथ में राखी बांधने का विधान है।✿ रक्षाबंधन पर्व पर राखी बाधंते समय आसन के रूप में चौकी या कुर्सी पर बैठाकर ही भाई के हाथ में राखी बांधनी चाहिए।
✿ रक्षाबंधन पर्व पर राखी बाधंते समय थाली में दीपक जरूर जलाना चाहिए क्योंकि दीपक को सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह माना जाता है। 
✿ रक्षाबंधन पर्व पर भाई- बहिन दोनों को कोई भी चमड़े का आयटम, चप्पल या जूते पहनकर रक्षासूत्र नहीं बांधना या बंधवाना चाहिए।
✿ रक्षाबंधन पर्व पर पीले, लाल और गुलाबी रंग के कपड़े सभी को धारण करने चाहिए। काले रंग के कपड़े नहीं पहनने चाहिए क्योंकि हमारे धर्म शास्त्रों में काले रंग को अशुभ माना गया है। 
✿ धर्म शास्त्रों के अनुसार कभी भी खाली हाथ राखी नहीं बांधनी चाहिए। जिस हाथ में रक्षा सूत्र बांध रहे हैं उसमें सबसे पहले रुपए लेकर मुट्ठी बंद कर लेना चाहिए। फिर इसके बाद अपने दूसरे हाथ को अपने सिर पर रख लें और फिर रक्षासूत्र बांधने के बाद हाथ में रखे रुपए अपनी बहिन को भेंट स्वरूप में देना चाहिए।
✿ रक्षा सूत्र या राखी बांधने से पहले बहिन से मौली तीन, पांच या सात बार में कलाई पर जरूर बंधवाएं।
इष्ट देव के साथ रक्षाबंधन पर्व मनाना -
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार रक्षाबंधन के इस शुभ अवसर पर अपने ईष्ट देव या भगवान लड्डू गोपाल को भी राखी बांधने का विधान है जो निम्नलिखित है-
सर्वप्रथम  स्नान आदि नित्यकर्म से निवृत्त होकर साफ वस्त्र पहनकर (केवल काले रंग से परहेज रखें) अपने ईष्ट देव के लिए रक्षासूत्र और मिठाई लेकर थाली सजाए और अपने ईष्टदेव को भक्ति के साथ रोली, चंदन या अष्टगंध का तिलक लगाएं।उनको अक्षत और पुष्प आदि अर्पित करें। फिर घर पर बनी मिठाई का भोग लगाएं और आरती उतारें। अंत में अपने ईष्टदेव की प्रतिमा को राखी बांधते हुए उनके मंत्रों का जाप करें। राखी बांधने के बाद अपने ईष्टदेव से आशीर्वाद लें और अच्छे जीवन की कामना करें। 
ध्यान रखने योग्य - रक्षाबंधन के त्योहार पर सभी को तामसिक चीजों से परहेज करना चाहिए।

Saturday, 15 June 2024

शनि स्तोत्रम्

शनि स्तोत्रम्
मैं पंडित अंजनी कुमार दाधीच आज इस लेख में दशरथ कृत शनि स्तोत्र पाठ के  बारे में जानकारी दे रहा हूं।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार हिंदू धर्म शास्त्रों में शनिदेव का न्याय का देवता के रूप में बतलाया गया है। शनिदेव किसी भी जातक को उसके कर्म के अनुसार शुभ-अशुभ फल देते हैं। अच्छे कर्म करने पर शनि की विशेष कृपा प्राप्त होती है और वहीं बुरे कर्म करने पर शनि के प्रकोप का सामना करना पड़ता है। यदि किसी व्यक्ति पर शनि की कृपा हो जाए तो उसका भाग्य पलभर में बदल जाता है। लेकिन किसी पर शनिदेव का प्रकोप हो तो उसे बर्बाद होते भी समय नहीं लगता है।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार शनिवार भगवान शनि को समर्पित दिन है और जो कोई भी जातक शनिदेव के दोष या साढ़े साती और ढैय्या दशा से पिड़ित है वह जातक किसी भी शनिवार के दिन भगवान शनिदेव के मंदिर में जाकर तिल्ली या सरसों का तेल, काले तिल,काले उड़द और निलांजन पुष्प आदि चढ़ाकर पूजा करते हुए भगवान शनिदेव के चरणों का ध्यान करते हुए भगवान राम के पिता राजा दशरथ द्वारा रचित शनि स्तोत्र का पाठ करना चाहिए।
दशरथ कृत शनि स्तोत्र का पाठ करने से शनि भगवान अति प्रसन्न होते है।
दशरथ कृत शनि स्तोत्र का पाठ करने से दरिद्रता दूर होती है।
दशरथ कृत शनि स्तोत्र का पाठ करने से शनि की कुदृष्टि से भी बचाव होता है।
दशरथ कृत शनि स्तोत्र पाठ 
।। अथ श्री शनि स्तोत्रम्।।
नमः कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठ निभाय च
नमः कालाग्निरुपाय कृतान्ताय च वै नमः
नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च
नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते
नमः पुष्कलगात्राय स्थुलरोम्णेऽथ वै नमः
नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोऽस्तु ते
नमस्ते कोटराक्षाय दुर्नरीक्ष्याय वै नमः
नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने
नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तु ते
सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽभयदाय च
अधोदृष्टेः नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तु ते
नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोऽस्तु ते
तपसा दग्ध.देहाय नित्यं योगरताय च
नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नमः
ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज.सूनवे
तुष्टो ददासि वै राज्यं रूष्टो हरसि तत्क्षणात्
देवासुरमनुष्याश्र्च सिद्ध.विद्याधरोरगाः
त्वया विलोकिताः सर्वे नाशं यान्ति समूलतः
प्रसाद कुरु मे सौरे! वारदो भव भास्करे
एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबलः।।
।। इति श्री दशरथ कृत शनि स्तोत्र संपूर्णम।।

**दशरथ स्तुति शनि देव हिन्दी अनुवाद**

हे श्यामवर्णवाले, हे नील कण्ठ वाले।
कालाग्नि रूप वाले, हल्के शरीर वाले॥
स्वीकारो नमन मेरे, शनिदेव हम तुम्हारे।
सच्चे सुकर्म वाले हैं, मन से हो तुम हमारे॥
स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो भजन मेरे॥
हे दाढ़ी-मूछों वाले, लम्बी जटायें पाले।
हे दीर्घ नेत्र वाले, शुष्कोदरा निराले॥
भय आकृति तुम्हारी, सब पापियों को मारे।
स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो भजन मेरे॥
हे पुष्ट देहधारी, स्थूल-रोम वाले।
कोटर सुनेत्र वाले, हे बज्र देह वाले॥
तुम ही सुयश दिलाते, सौभाग्य के सितारे।
स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो भजन मेरे॥
हे घोर रौद्र रूपा, भीषण कपालि भूपा।
हे नमन सर्वभक्षी बलिमुख शनी अनूपा ॥
हे भक्तों के सहारे, शनि! सब हवाले तेरे।
हैं पूज्य चरण तेरे। स्वीकारो नमन मेरे॥
हे सूर्य-सुत तपस्वी, भास्कर के भय मनस्वी।
हे अधो दृष्टि वाले, हे विश्वमय यशस्वी॥
विश्वास श्रद्धा अर्पित सब कुछ तू ही निभाले।
स्वीकारो नमन मेरे। हे पूज्य देव मेरे॥
अतितेज खड्गधारी, हे मन्दगति सुप्यारी।
तप-दग्ध-देहधारी, नित योगरत अपारी॥
संकट विकट हटा दे, हे महातेज वाले।
स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो नमन मेरे॥
नितप्रियसुधा में रत हो, अतृप्ति में निरत हो।
हो पूज्यतम जगत में, अत्यंत करुणा नत हो॥
हे ज्ञान नेत्र वाले, पावन प्रकाश वाले।
स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो नमन मेरे॥
जिस पर प्रसन्न दृष्टि, वैभव सुयश की वृष्टि।
वह जग का राज्य पाये, सम्राट तक कहाये॥
उत्तम स्वभाव वाले, तुमसे तिमिर उजाले।
स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो नमन मेरे॥
हो वक्र दृष्टि जिसपै, तत्क्षण विनष्ट होता।
मिट जाती राज्यसत्ता, हो के भिखारी रोता॥
डूबे न भक्त-नैय्या पतवार दे बचा ले।
स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो नमन मेरे॥
हो मूलनाश उनका, दुर्बुद्धि होती जिन पर।
हो देव असुर मानव, हो सिद्ध या विद्याधर॥
देकर प्रसन्नता प्रभु अपने चरण लगा ले।
स्वीकारो नमन मेरे। स्वीकारो नमन मेरे॥
होकर प्रसन्न हे प्रभु! वरदान यही दीजै।
बजरंग भक्त गण को दुनिया में अभय कीजै॥
सारे ग्रहों के स्वामी अपना विरद बचाले।
स्वीकारो नमन मेरे। हैं पूज्य चरण तेरे॥
लेखक परिचय- Pandit Anjani Kumar Dadhich 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच 
 (कुंडली विश्लेषक वास्तुविद एवं अंक ज्योतिषी)
Nakshatra Jyotish Sansthaan, Nagaur 
नक्षत्र ज्योतिष संस्थान, नागौर 
panditanjanikumardadhich@gmail.com
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