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Thursday, 28 March 2024

अमावस्या योग

अमावस्या योग

प्रिय पाठकों,
मैं पंडित अंजनी कुमार दाधीच इस लेख में अमावस्या योग के बारे में जानकारी दे रहा हूं।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार जन्मकुंडली के एक ही भाव में दो या अधिक ग्रहों के एक साथ बैठने को 'युति' कहा जाता है। ग्रहों की युति का असर या प्रभाव सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रकार का हो सकता है जो विभिन्न परिस्थितियों पर निर्भर करता है जैसे - ग्रहों के बीच बनने वाली युति ग्रहों की प्रकृति, एक-दूसरे के साथ उनके संबंध और जिस घर में स्थित हैं, उसके आधार पर ग्रहों की युति हानिकारक या लाभकारी हो सकती है। ग्रह की शक्ति को यह जानने के लिए भी माना जाता है कि ग्रह वक्री है,अस्त है या सीधे है।

 अमावस्या योग  

पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार किसी भी जन्मकुंडली में सूर्य और चंद्रमा दोनों ग्रह युति होती हैं तो इससे बनने वाले योग को अमावस्या योग कहा जाता है और साथ में यह भी माना जाता है कि अमावस्या जैसी तिथि में जन्मे जातक की कुंडली में अमावस्या दोष होता है जिसे अशुभ माना जाता है। क्योंकि अमावस्या की तिथि पर राहु शासन करता है। यह योग मनुष्य के लिए अच्छा नहीं होता है। किसी भी व्यक्ति की जन्म कुंडली में सूर्य और चंद्रमा ग्रह एक-दूसरे से जितना दूर होंगे यह जातक को उतना ही शुभ परिणाम देंगे। चंद्रमा सूर्य से जितना दूर होगा उतना ही शक्तिशाली होगा क्योंकि चंद्रमा सूर्य से दूर रहने पर ही शुभ परिणाम देते हैं। मगर यह सूर्य के जैसे-जैसे नजदीक आने लगते हैं तो अपनी शीतलता खोने लगते हैं और जातक के लिए अशुभ स्थितियां निर्मित करते हैं। 

सूर्य- चंद्रमा युति (अमावस्या योग) का प्रभाव 

जन्मकुंडली में इन (सूर्य और चंद्रमा) दोनों ग्रहों की युति होने पर मनुष्य का जीवन परेशानियों से घिरने लगता है। सूर्य और चंद्र की युति से जातक पराक्रमी, अहंकारी, कार्यकुशल, विषयासक्त, चतुर, दुष्ट होता है। मानसिक चिंताएं जातक को परेशान करती हैं। ऐसे लोग काल्पनिक दुनिया में खोकर अपने वर्तमान को खराब कर सकते हैं। इसके साथ ही इन दोनों ग्रहों के साथ होने से बुरी आदतें व्यक्ति को लग सकती हैं। पारिवारिक जीवन में भी ऐसे लोगों को दिक्कतों को सामना करना पड़ सकता है।
अमावस्या योग कुण्डली में होने से कई  मनुष्य को शारीरिक और मानसिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
अमावस्या योग में सूर्य के प्रभाव के चंद्रमा की शक्तियां क्षीण हो जाती है इसी कारण अमावस्या योग के होने से चंद्रमा के शुभ फल व्यक्ति को प्राप्त नहीं होते है। वहीं जब कुंडली में यह दोनों ग्रह दृष्टि संबंध यानी प्रतियुति बनाते हैं तो शुभ फलों की प्राप्ति जातक को होती है। इस स्थिति में दोनों ग्रह एक-दूसरे से दूर रहते हैं।
पंडित अंजनी कुमार के अनुसार अमावस्या दोष के अधोलिखित प्रभाव के अलावा कुछ कुप्रभाव निम्नलिखित है-
माता के साथ संबंध अच्छे नहीं खराब हो सकते हैं।
जातक माता के आशीर्वाद से वंचित रह सकता है।
जातक और परिवार पर कई विपत्तियां आ सकती हैं।
मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
वित्तीय संकट का सामना करना पड़ सकता है।
करियर में बाधाएं आ सकती हैं।

अमावस्या योग के उपाय  

पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार अमावस्या योग के उपाय निम्नलिखित है -

✷ सूर्य-चंद्र युति के बुरे प्रभाव को कम करने के लिए सोमवार के दिन भगवान शिव की पूजा कर शिवलिंग पर जल अर्पित करते हुए ओम नमः शिवाय मंत्र का 108 बार जाप करें क्योंकि शिव चंद्रमा पर शासन करते हैं।
✷ चंद्रमा से जुड़ी वस्तुओं का दान करना चाहिए। 
✷ ऐसे लोगों को सुबह जल्दी जागना चाहिए और रात को जल्दी सोना चाहिए। 
✷ अमावस्या के दिन ऐसे व्यक्ति को व्रत रखना चाहिए और शाकाहारी भोजन ग्रहण करें और मांस मदिरा आदि का सेवन नहीं करना चाहिए।
✷ प्रत्येक अमावस्या के दिन पूर्वजों के लिए तर्पण करें।
अपने बड़ों का अर्थात विशेषकर माता-पिता का अनादर न करें।
✷ देवी काली की पूजा करें क्योंकि वह अमावस्या दोष के लिए पूजा की जाने वाली मुख्य देव हैं।
✷ अमावस्या के दिन गरीबों और जरूरतमंदों को चांदी, सफेद तिल, नमक, रूई, गाय आदि का दान करना चाहिए। इस दिन सफेद रंग की सभी वस्तुएं दान देना शुभ माना जाता है।
लेखक - Pandit Anjani Kumar Dadhich
पंडित अंजनी कुमार दाधीच
Nakshatra jyotish Hub
नक्षत्र ज्योतिष हब
📧panditanjanikumardadhich@gmail.com
फोन नंबर - 9414863294, 6377054504

Wednesday, 27 March 2024

सूर्य ग्रहण

सूर्य ग्रहण 
प्रिय पाठकों,
मैं पंडित अंजनी कुमार दाधीच आज इस लेख में 8 अप्रैल 2024 के सूर्य ग्रहण के बारे में जानकारी दे रहा हूं।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार साल 2024 का पहला सूर्य ग्रहण 8 अप्रैल 2024 सोमवार को होगा। यह एक पूर्ण सूर्य ग्रहण है जिसकी अवधि अब तक के 50 सालों में सबसे लम्बी होगी। यह सूर्य ग्रहण कुल 4 घंटे 25 मिनट का होगा। इस सूर्य ग्रहण के मध्य काल के साढ़े सात मिनट के दौरान पृथ्वी पर पूर्णतया अंधेरा छा जाएगा।
वैज्ञानिकों के अनुसार सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण एक खगोलीय घटना है लेकिन वैदिक ज्योतिष शास्त्र में सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण का विशेष महत्व माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार सूर्य को ग्रहों का राजा और आत्मा का कारक माना जाता है। ऐसे में सूर्य संबंधित कोई भी घटना होती है तो उसका प्रभाव ब्रह्माण्ड और हर राशि के जातकों के जीवन पर अवश्य पड़ता है।
सूर्य ग्रहण कब -  भारतीय समयानुसार यह सूर्य ग्रहण 8 अप्रैल की रात 9:12 मिनट से ग्रहण शुरू होगा और 9 अप्रैल को मध्य रात्रि में 2:22 मिनट पर यह ग्रहण पूर्णतया समाप्त हो जाएगा।
सूर्य ग्रहण कहां कहां दृश्यमान -   यह सूर्य ग्रहण कनाडा, मेक्सिको, यूनाइटेड स्टेट्स, अरूबा, बर्मुडा, करेबियन नीदरलैंड, कोलंबिया, कोस्टा रिका, क्यूबा, डोमिनिका, ग्रीनलैंड, आयरलैंड, आइसलैंड, जमाइका, नॉर्वे, पनामा, निकारगुआ, रूस, पोर्तो रिको, सैंट मार्टिन, स्पेन, द बहामास, यूनाइटेड किंग्डम और वेनेजुएला समेत दुनिया के कुछ हिस्सों से दिखाई देगा।
सूतक काल निर्धारण -  सूर्य ग्रहण लगने से 12 घंटे पहले इसका सूतक काल शुरू हो जाता है और ग्रहण लगने के बाद तक रहता है। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार 25 मार्च 2024 के चंद्र ग्रहण की तरह ही साल का पहला सूर्य ग्रहण भारत में नहीं दिखाई देगा इसलिए भारत मे इस सूर्यग्रहण का सूतक भी मान्य नहीं होगा। 
राशियों पर प्रभाव -  पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार चैत्र नवरात्रि के पहले पड़ने वाले इस सूर्य ग्रहण का असर कुछ राशि के जातकों के लिए सकारात्मक तो कुछ के लिए नकारात्मक है। इस सूर्य ग्रहण के समय में सूर्य रेवती नक्षत्र और मीन राशि में होंगे। मीन गुरु की राशि है। ऐसे में सूर्य के साथ गुरु का मित्रता का भाव है। इसके साथ ही सूर्य के साथ चंद्रमा, शुक्र और राहु भी मौजूद होंगे। चंद्रमा से द्वादश भाव में शनि और मंगल स्थित होंगे। ऐसे में यह सूर्य ग्रहण वृषभ राशि, मिथुन राशि और कर्क राशि के जातकों को विशेष लाभदायक साबित हो सकता है।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार इस सूर्य ग्रहण का भारत पर सकारात्मक प्रभाव देखने को मिलेगा। भारत की आर्थिक उन्नति होगी और लोगों के बीच धर्म-कर्म की तरफ रुझान बढ़ेगा। इसके साथ ही भारत में 9 अप्रैल से चैत्र नवरात्रि का आरम्भ होने जा रहा है। हिंदू धर्म में चैत्र नवरात्रि का बहुत महत्व है। 9 दिनों तक चलने वाले इस महापर्व में माता दुर्गा की आराधना की जाती है जो ग्रहण को प्रतिकूल प्रभाव से रक्षा करेंगी।
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ध्यान रखने योग्य बात -  पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार हिन्दू धर्म में ग्रहण काल में पूजा-यज्ञ, हवन, खाना-पीना, शुभ कार्य वर्जित होते हैं और साथ ही गर्भवती महिलाओं को सूर्य ग्रहण देखने की मनाही है। 
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पंडित अंजनी कुमार दाधीच 
लेखक - Pandit Anjani Kumar Dadhich
पंडित अंजनी कुमार दाधीच
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Tuesday, 26 March 2024

ज्योतिष

🌻🌻ज्योतिषी बनने के योग 🌻🌻
ज्योतिष शास्त्र अध्यात्म,दर्शन,धर्म व विज्ञान का सम्मिलित रूप हैं। आकाश मे भ्रमण  करते हुये ग्रह अपने अपने मार्गो मे जब विभिन्न राशियो व नक्षत्रो से गुजरते हैं तो धरती पर प्रत्येक प्राणी व वस्तु पर इनका कुछ न कुछ प्रभाव पड़ता हैं जिसका पता हमारे प्राचीन विद्वानो ने अपने ज्ञान व शोध द्वारा हमे ज्योतिषीय ज्ञान के रूप मे दिया चूंकि भारत वर्ष हमेशा से ही ज्ञान, ध्यान,अध्यात्म,धर्म व दर्शन की भूमि रहा हैं यहाँ यह ज्योतिष शास्त्र ना सिर्फ पवित्र कार्य के रूप मे देखा जाता हैं बल्कि भविष्य हेतु मार्गदर्शक भी माना जाता हैं। इस विधा की लोकप्रियता को देखते हुये बहुत से लोग इसका विधि विधान से अध्ययन कर सफल ज्योतिष बनना पसंद कर रहे हैं हमने इसी विषय को केन्द्रित कर यह जानने का प्रयास किया की किसी की जन्म कुंडली मे ऐसे कौन से योग होते हैं जो व्यक्ति विशेष को इस गूढ विदया का अध्ययन करने को प्रेरित व मजबूर करते हैं।
एक सफल ज्योतिषी बनने के लिए गणितज्ञ,दार्शनिक व मनोवैज्ञानिक होना आवशयक हैं इसके अतिरिक्त जातक विशेष मे वाक सिद्धि का होना व भविष्य देखने की कला (दूरदर्शिता) का होना अत्याधिक ज़रूरी हैं चूंकि यह सभी विषय गुरु व बुध ग्रहो के अंतर्गत आते हैं अत; कुंडली मे इन दोनों का बलवान होना आवशयक हैं इसके अतिरिक्त हमें निम्न इन अवयवो का भी अध्ययन करना चाहिए।
भाव-लग्न,पंचम,अष्टम,नवम व दशम
राशीय-वृश्चिक व कुम्भ
ग्रह –गुरु,बुध व शनि
लग्न भाव- इस भाव से व्यक्तित्व,मस्तिष्क,स्वभाव,रुचि, शरीर, आजीविका व कार्य के प्रति समर्पण भावना का विचार किया जाता हैं | यह भाव शारीरिक रूप से कोई भी कार्य करने के लिए देखा जाता हैं यह भाव निजता अर्थात स्वयं का होता हैं।पंचम भाव-इस भाव से विधा, बुद्दि,निर्णय क्षमता,योजना अनुसार कार्य, विचार, गंभीरता, विवेक व पसंद नापसंद  देखी जाती हैं।जिससे शिक्षा,पढ़ाई,सिद्दी व अध्ययन का पता चलता हैं।
अष्टम  भाव-यह भाव गुप्तता व गुप्त विषय की जानकारी का होता हैं ज्योतिष का कार्य गुप्तता भरा होता हैं जिसमे भविष्य मे छुपी गुप्तता का पता लगाना होता हैं यह भाव सामान्य ज्ञान(कौमन सेंस),साधना व शोध का भी होता हैं।नवम भाव-यह भाव भाग्य सौभाग्य,प्रसिद्दि,धर्म व परंपरा का माना जाता हैं जो की हमे ज्योतिष जैसे धार्मिक व परंपरागत विषय का अध्ययन करने की प्रेरणा प्रदान करता हैं यही भाव पिता का भी माना जाता हैं और यह विधा आज भी बहुदा क्षेत्रो मे पैतृक विधा के रूप मे ही अध्ययन की जाती हैं।दशम भाव-इस भाव से हम कार्यक्षेत्र का पता लगाते हैं व्यक्ति विशेष के कर्मो मे सात्विकता या तामसिकता का होना इस भाव से जाना जा सकता हैं इस भाव से गुरु अथवा शनि का संबंध व्यक्ति को ज्योतिष जैसी पवित्र व आध्यात्मिक विद्या मे अवश्य लगाव रखवा सकता हैं। वृश्चिक राशि-यह राशि कालपुरुष की पत्रिका मे अष्टम भाव की राशि मानी जाती हैं जो गूढ़ता व गुप्तता की प्रतीक मानी गयी हैं चूंकि यह विधा गुप्त व अज्ञात की खोज से संबन्धित हैं इसलिए इस राशि का व इस राशि पर प्रभाव अवश्य ही देखा जाना चाहिए।
कुम्भ राशि –यह राशि दार्शनिकता,तत्वज्ञान व रहस्यता भरी राशि हैं जो व्यापकता को दर्शाती हैं जिसका स्वामी शनि गूढता व पराज्ञान को देनेवाला ग्रह हैं।
गुरु ग्रह –यह ग्रह विधा,विवेक,विस्तारता, परंपरागत व धार्मिक शिक्षा प्रदान करने वाला माना जाता हैं इसके शुभ या बली होने पर व्यक्ति धर्म कर्म व सबका भला चाहने वाला होता हैं इस ग्रह का केंद्र या त्रिकोण से संबंध व्यक्ति को ज्योतिष शास्त्र मे रुचि प्रदान करता हैं जिससे व्यक्ति धर्म प्रचारक,शिक्षक,व पुजारी बन सकता हैं ।
बुध ग्रह – इस ग्रह के बिना बुद्दि प्राप्त नहीं हो सकती जिसके बिना गणितज्ञ बन पाना नामुमकिन हैं बिना गणित के अच्छा ज्योतिषी नहीं बना जा सकता हैं | बलवान बुध ग्रह का केंद्र व त्रिकोण से संबंध जातक को ऊंच दर्जे की मानसिक शक्ति,तर्क शक्ति व कल्पना शक्ति प्रदान करता हैं जिससे जातक किसी भी निर्णय को ले पाने मे सफल हो पाता हैं।शनि ग्रह- यह ग्रह अष्टम भाव का कारक ग्रह होता हैं जो गुप्त वस्तुओ, प्रयोगो,व रहस्यो का भाव माना जाता हैं | इसके शुभ अवस्था मे होने से व्यक्ति विशेष का दृस्टि कोण व्यापकता लिए हुये होता हैं जिसकी ज्योतिष विधा मे बहुत आवशयकता होती हैं साथ ही साथ शोध इत्यादि करने के लिए भी शनि ग्रह का शुभ होना ज़रूरी होता हैं। ज्योतिषी बनने के लिए इस शनि ग्रह का प्रभाव लग्न,अष्टम व दशम भाव या लग्नेश,अष्टमेश या दशमेश पर अवश्य देखा जाना चाहिए। ज्योतिष के महान ग्रंथ बृहद पाराशर होरा शास्त्र के एक श्लोक मे ज्योतिषी की योग्यताओ के विषय मे कहा गया हैं की “एक ज्योतिषी को गणित मे निपुण होना चाहिए। उसे शब्द शास्त्र का पूर्ण ज्ञान होना चाहिए। उसे न्यायविद, बुद्धिमान,जितेंद्रिय, देश,काल,पात्र का ज्ञाता और विवेकवान होना चाहिए। उसमे परस्पर विरोधी फल दृष्टिगोचर होने पर उनका सही विश्लेषण करने की क्षमता और अपनी बात को अच्छी तरह समझाने की योग्यता होनी चाहिए। जिस व्यक्ति को होरा स्कन्द का पूर्ण ज्ञान हो उसकी बातों पर अन्य जनो को संशय नहीं करना चाहिए। यदि इन सभी बातों पर ध्यान से देखे तो यह सभी प्रभाव जातक विशेष पर उक्त तीन ग्रहो के द्वारा ही प्राप्त होते हैं ।
Astro Anjani Kumar Dadhich

Thursday, 21 March 2024

चुनाव में जीत के लिए ज्योतिषीय और वास्तु उपाय

चुनाव में जीत के लिए ज्योतिषीय और वास्तु उपाय 

प्रिय पाठकों, 
मैं पंडित अंजनी कुमार दाधीच आज इस लेख में चुनाव में जीत के लिए ज्योतिषीय और वास्तु उपाय के बारे में जानकारी दे रहा हूं।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार हमारे देश भारत में हमेशा कोई न कोई चुनाव की लहर चलती रहती है। एक पद के लिए एक हजार प्रत्याशी। सभी का अपना-अपना दावा कि अबकी बार चुनाव मैं ही जीत रहा हूं कृपया मेरा सपोर्ट करना। चुनाव में जीत का परिणाम तो निकलेगा ही मगर किसी एक का ही। लेकिन दावा सभी का होता है। 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार चुनाव के अन्दर प्रत्याशी बनने और चुनाव को जीतने मे बहुत जद्दोजहद करनी पड़ती है। प्रत्येक प्रत्याशी चुनाव जीतने के लिए हर प्रकार के तरीके अपनाता है लेकिन सब कुछ होने के बाद भी जब व्यक्ति चुनाव हार जाता है तो उसकी जनता ही नही अपनी खुद की आत्मा भी धिक्कारती है कि अमुक कारण का निवारण अगर हो जाता तो चुनाव जीता जा सकता था। चुनाव का जीतना और राज करना दोनो ही अलग- अलग बातें है एक साधारण और कम पढा लिखा आदमी भी चुनाव जीत सकता है और वही पर बहुत पढा व्यक्ति भी किसी नेता की चपरासी के अलावा कुछ नही कर सकता है। यह सब आदमी के बस की बात नहीं है यह सब होता है सितारों का खेल होता है। अगर सितारे उसके पक्ष में हों तो सभी कुछ हो सकता है और अगर सितारे उसके खिलाफ है तो बना बनाया काम भी बरबाद होते देर नहीं लगती है। 
 हर प्रकार के चुनाव में राहु ग्रह की महत्वपूर्ण भूमिका - पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार बिना राहु की सहायता के चुनाव नही जीता जा सकता है। सभी प्रकार के चुनाव में राहु महत्वपूर्ण भूमिका निभाता हुआ सभी को धारण भी करता है और बरबाद भी करता है इसलिये राहु को विराट रूप मे देखा जाता है। राजनीतिक क्षेत्र में प्रत्येक प्रत्याशी को जनता के मन मस्तिष्क में एक विशेष प्रकार का प्रभाव प्रदर्शित करना होता है। जिस प्रत्याशी का राहु बहुत ही प्रबल होता है उसी का प्रभाव जनता के मन मस्तिष्क में छप जाता है।
✿ किसी भी प्रत्याशी के जीतने में उसकी बोलने के तरीके या लहजा महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और राहु बुध के साथ मिलकर बोलने की क्षमता देता है। 
✿ राहु मंगल के साथ मिलकर अपनी विशेष शक्ति से जनता के अन्दर नाम कमाने की हैसियत देता है ।
✿ राहु सूर्य के साथ मिलकर राजकीय कानूनी और राजकीय क्षेत्र के बारे मे बड़ा ज्ञान देता है।
✿ वही राहु गुरु के साथ मिलकर उल्टी हवा को प्रवाहित करने के लिये भी देखा जाता है। राहु शनि के साथ मिलकर मजदूर संगठनो का मुखिया बना कर सामने लाता है।
✿ राहु शुक्र के साथ मिलकर लोगों के अन्दर चमक दमक से प्रसारित होने अपने को समाज मे दिखाने और अपने द्वारा मनोरंजक बातों के प्रति सामने रखने से माना जा सकता है।
चुनाव जीतने के लिए निम्नलिखित बातों पर अवश्य ध्यान रखना चाहिए - 
✿✿ राहुकाल में चुनावी सभा न करें - पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार राहुकाल में सभी प्रकार के शुभ कार्य वर्जित होते हैं। इस काल में चुनावी सभा नहीं करें। राहुकाल में की गई चुनावी आमसभा विफल होती है। मतदाता के मन में भ्रांतियां फैलेंगी और प्रत्याशी एवं पार्टी के प्रति नकारात्मक विचार बढ़ेंगे, आमसभा में भी बाधाएं आएंगी, विवादों की स्थितियां बनेंगी। राहुकाल में चुनावी फॉर्म भी नहीं भरना चाहिए। इस काल में फॉर्म भरने से प्रतिद्वंद्वी आप पर भारी पड़ेगा एवं पराजय का सामना करना पड़ता है। राहुकाल का समय प्रतिदिन अलग-अलग होता है।
 वार अनुसार राहुकाल का समय निम्नानुसार है-
वार समय
सोमवार : प्रात: 7.30 बजे से 9.00 बजे तक।

मंगलवार : दोपहर 3.00 बजे से 4.30 बजे तक।

बुधवार : दोपहर 12.00 बजे से 1.30 बजे तक।

गुरुवार : दोपहर 1.30 बजे से 3.00 बजे तक। 

शुक्रवार : प्रात: 10.30 बजे से 12.00 बजे तक। 

शनिवार : प्रात: 9.30 बजे से 10.30 बजे तक।

रविवार : दोपहर 4.30 बजे से 6.00 बजे तक। 

 नक्षत्रों का चयन - पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार अनादि काल से राजा, महाराजा युद्ध के लिए जाते समय सर्वप्रथम विजय नक्षत्रों का चयन करते थे जिससे शत्रु पर विजय प्राप्त होती थी। इन विजयी नक्षत्रों में ही राजा अपने शत्रु राजा पर आक्रमण पर राज्य अपने अधिकार में लेता था। इन नक्षत्रों में चुनाव का फॉर्म भरना प्रतिद्वंद्वी को स्तंभित करने वाला, मतदाता को आकर्षित करने वाला होकर पद प्राप्ति में सहायक होकर विजय दिलाता है।
अत: प्रत्याशी को अपना चुनावी फॉर्म निम्न वर्णित विजयी नक्षत्रों में ही भरना चाहिए-
रोहिणी, मृगशीर्ष, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, स्वाति, धनिष्‍ठा, शतभिषा, रेवती
 चुनाव परिणाम में शुभ पशु-पक्षी – पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार निम्नानुसार वर्णित पशु या पक्षियों को मुख्य निवास स्थान अथवा प्रमुख चुनाव कार्यालय में रखने से सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होकर चुनाव परिणाम पक्ष में होता है- सफेद घोड़ा, मुर्गा, सफेद बैल, कबूतर, लाल गाय, सफेद गाय, हिरण, मच्छर, पतंगा, नेवला, गोकुल गाय, हाथी, मछली, चिड़िया, मोर, मधुमक्खी, काली चींटी, चकोर और भौंरा।
 भाषण की दिशा -  पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार किसी भी उम्मीदवार को चाहिए कि चुनाव के दौरान होने वाली सभाओं में वह अपना मुंह उत्तर या पूर्व दिशा में रखकर सभा को सम्बोधित करें। जनता को संबोधित करते समय उम्मीदवार का मुंह उत्तर दिशा में जब ही रहेगा जब मंच सभा के स्थान की दक्षिण दिशा की ओर होगा इसी प्रकार पूर्व दिशा की ओर मुंह तब ही रहेगा जब मंच सभा के स्थान की पश्चिम दिशा की ओर बनेगा। इस प्रकार के वास्तुनुकूल मंच पर खड़े होकर चुनावी सभा को सम्बोधित करने से सभा सफल एवं प्रभावी होती है।
 प्रत्याशी की ध्वजा (झंडा)  - पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार ध्वजा या झंडे का एक विशिष्ट महत्व होता है। वर्तमान में एक पक्ष का प्रतीक ध्वजा का लहराना चुनाव में विजयकारक होता है। प्रत्याशी के निवास स्थान एवं चुनाव के मुख्‍य कार्यालय में लगाई गई ध्वजा का स्थान सुनिश्चित होता है। इस ध्वजा को वेध कर दिया जाए या ध्वजा विपरीत दिशा में लगा दी जाए तो उससे ध्वजा वेध होकर प्रतिद्वंद्वी की ध्वजा फहरा जाती है एवं प्रत्याशी को पराजय का सामना करना होता है। ध्वजा के सामने किसी भी प्रकार का पेड़ या खंभा नहीं होना चाहिए। ध्वजा लहराते समय किसी वस्तु आदि से बाधित होकर अटकना नहीं चाहिए। दिशा अनुसार ध्वजा लगाने का परिणाम —
पूर्व : कशमकश के साथ विजय।
आग्नेय : विवाद के साथ पराजय।
दक्षिण : अधिक परिश्रम, विजय में बाधादायक।
नैऋत्य : पद, प्रतिष्ठा, शत्रु, दमन एवं विजयश्री।
पश्‍चिम : अधिक परिश्रम के साथ मतदान कम।
वायव्य : विपरीत मतदान के साथ पराजय।
उत्तर : अर्थहानि।
ईशान्य : आकस्मिक विजय।
ध्वजा निवास स्थान या मुख्‍य कार्यालय के नैऋत्य दिशा में ही लगाना चाहिए। इस दिशा की ध्वजा विजय, पद, प्रतिष्ठा देने वाली एवं शत्रु का दमन करने वाली होती है इसलिए ध्वजा नैऋत्य दिशा में ही लगाना चाहिए।
 घर से क्या खाकर निकलें – पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार चुनाव फॉर्म भरने जाते समय एवं चुनाव प्रचार हेतु घर से निकलते समय क्या खाकर निकलें जिससे सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त हो एवं मतदाता व मतदान प्रत्याशी के पक्ष में हो। वार अनुसार वस्तुओं का निर्धारण कर रहे हैं कि कौन से वार में प्रत्याशी को क्या खाकर निकलना चाहिए।
रविवार : पान। सोमवार : दूध, चावल। मंगलवार : गुड़।
बुधवार : खड़ा धनिया। गुरुवार : जीरा।शुक्रवार : दही।
चुनाव में जीत हासिल करने के लिए निम्नलिखित उपाय करने चाहिए -
✷ पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार मां अपराजिता का पूजन-अर्चन करते हुए मां अपराजिता के स्तोत्र का पाठ और अनुष्ठान करवाना चाहिए।
✷ पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार हत्थाजोड़ी एक जंगली वनस्पति होता है जिसे काफी दुर्लभ माना जाता है। किन्तु असंभव नहीं है। तो इस हत्थाजोड़ी प्राप्त करें जो पूरे विधि-विधान से ग्रहणकाल में सिद्ध किया हुआ हो। यदि आपके नाम से सिद्ध करके मिल जाय तो और उत्तम होगा। इसे प्राप्त करके चाँदी की डब्बी या लाल वस्त्र में करके पीला सिंदूर, कपूर और बिना टूटे चावल के कुछ दाने के साथ रखें। तत्पश्चात नवार्ण मंत्र का 21 बार उच्चारण करते हुए सामान्य पूजन करके तिजोरी अथवा अपने पर्स में रखें। पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार जनसंपर्क से लेकर पर्चा दाखिला तक इसे अपने जेब में ही रखें, किन्तु शुद्धता का ध्यान रखें। हथाजोड़ी आपका वोट बैंक ऐसे बढ़ाता जाएगा जैसे दीप से दीप जलाया जाता है। कुछ समय में ही बेतहासा जनसंपर्क चकित करने योग्य होगा। 
✷ पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार चुनाव में विजय प्राप्ति हेतु बगलामुखी कवच और त्रिशक्ति कवच प्राप्त करके गले में धारण करें। इसके धारण से विरोधियों को नर्वस करने में सुविधा मिलेगी। माहौल भी मजबूत बनेगा। ग्रहों को कंट्रोल करना भी इनका काम है ताकि चुनाव आप का ही निकले। आप चाहें तो स्वयं व्यक्तिगत रूप से अथवा अपने किसी प्रतिनिधि को भेजकर नलखेड़ा (मध्यप्रदेश) स्थित विश्व के सर्वाधिक प्राचीनतम माँ बगलामुखी मंदिर में अपनी विजय हेतु अनुष्ठान करवा सकते हैं।
✷ पंडित के अनुसार यदि अपने मकान के पूरब उत्तर दिशा में सम्पूर्ण वास्तु दोष नाशक यन्त्र की स्थापना कर दें तो आपको वास्तु स्थिति का भी सपोर्ट मिले। छोटा-मोटा दोष भी चुनाव के समय में बाधक न बने बल्कि आपको सामाजिक सपोर्ट दिलवाते हुए निश्चित ही भारी विजय प्रदान करे।  
आमतोर कई भी राजनेता चुनाव लड़ते समय अपनी जन्म कुंडली या हस्तरेखा के आधार पर ही निर्णय लेते हें किन्तु वे वास्तु के महत्त्व या प्रभाव को अनदेखा कर देते है। वे अक्सर पूजा पाठ(कर्मकांड) तथा मन्त्र-यंत्र-तंत्र का प्रयोग करना भी नहीं भूलते है। मंदिरों, मस्जिदों और गुरुद्वारों में सर झुकाना भी नहीं भूलते विजय प्राप्ति हेतु बड़े बड़े हवन-यज्ञ या अनुष्ठान करवाते है।इन सभी उपायों का पूर्ण लाभ तभी संभव हैं जब चुनाव लड़ने वाले राजनेता का मकान और ऑफिस वास्तु सम्मत न बना होना और स्थानों की वास्तु अनुकूलता नहीं होना उसकी विजय की संभावना में बाधा देती है।
चुनाव में स्थायी रूप से विजय,यश एवं प्रतिष्ठा प्राप्त करने हेतु इन बातों का रखें ध्यान —
✷ पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार चुनाव लड़ने वाले के मकान की उत्तर दिशा तथा उत्तरी इशान कोण को वास्तु सम्मत होना चाहिए। यदि इन दिशाओं में कोई कोना बढ़ा होगा तो यश एवं प्रसिद्धि दिलाता है।
✷ चुनाव लड़ने वाले के मकान की उत्तर दिशा तथा उत्तरी इशान कोण में वाटर टेंक, किसी प्रकार का बड़ा गढ्ढा मददगार होता हें।
✷ चुनाव लड़ने वाले के मकान की उत्तर दिशा तथा उत्तरी ईशान कोण की दिशा किसी भी रूप में दबी हुई या कटी हुई नहीं होनी चाहिए। इस दोष के कारन उचित यश और प्रसिद्धि नहीं मिल पाती है।
✷ पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार चुनाव लड़ने वाले के मकान की उत्तर दिशा तथा उत्तरी इशान कोण यदि ऊँचा हें तो वह भी नुकसान,अपयश का कारण बन सकता है जिसके कारण चुनाव में विजय संभव नहीं होती है।
✷ चुनाव लड़ने वाले के मकान की उत्तर दिशा तथा पूर्व दिशा की तरफ यदि इशान कोण निचा हो एवं दक्षिण,आग्नेय ,पश्चिम और वायव्य कोण ऊँचे हो तो उनके परिवार में आनंद ,ऐश्वर्य की वृद्धि होगी और वहां निवास करने वालों को विजय,ख्याति और प्रशंसा मिलती रहेगी।
✷ पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार चुनाव लड़ने वाले के मकान की उत्तर दिशा तथा उत्तरी इशान में यदि उस मकान में रहने वालों को अपने ड्राइंग रुम के अन्दर की तरफ जाने वाले दरवाजे के सामने की दीवार पर,मध्य में अपना फोटो (चित्र) जरुर लगाना चाहिए।संभव हो तो उस फोटो के ऊपर एक लाल रंग का जीरो वाट का बल्ब अवश्य लगवाएं। वो बल्ब हमेशा 24 घंटे जलते रहना चाहिए।इसके प्रभाव से वहां निवास करने वालों के मान-सम्मान,यश,और प्रसिद्धि बढ़ाने में मदद मिलेगी।
 चुनाव लड़ने वाले को अपने आवास(मकान) के साथ साथ अपने कार्यालय या ऑफिस में निम्नलिखित वास्तु नियमों या वास्तु सूत्रों का प्रयोग अवश्य करना चाहिए।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार चुनाव लड़ने वाले के मकान तथा ऑफिस के साथ साथ उस पार्टी के मुख्य या केन्द्रीय कार्यालय का भी वास्तु सम्मत होना अत्यावश्यक है।
चाहे जो भी पार्टी हो यदि उनके मुख्य केन्द्रीय कार्यालय या ऑफिस वास्तु सूत्र अनुसार बने हुए हें तो उनकी सत्ता में भागीदारी या विजय होने की संभावना में वृद्धि होगी।
✷ पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार के घर या ऑफिस का पूर्वी, पूर्व ईशान या उत्तर ईशान कोना कटा हुआ या घटा हुआ नहीं होना चाहिए। इस दिशा में किसी भी तरह का दोष होना अथवा नेऋत्य से ऊँचा होना भी अनुचित परिणाम देता है। 
✷ कार्यालय वाले स्थान की पूर्व दिशा जितनी अधिक खुली हुई होगी परिणाम उतने ही उत्तम प्राप्त होने की सम्भावना रहती है। 
✷ जिस उम्मीदवार के घर का उत्तर, पूर्व दिशा और ईशान कोण घर की अन्य दिशाओं और कोणों से नीची होती होती है उनके सफल होने की संभावना अधिक रहती है। 
क्योंकि वास्तु विज्ञान के अनुसार ऐसा वास्तु हमेशा वृद्धि होगी, ऐश्वर्य आनंद की प्राप्ति, विजय, प्रशंसा और ख्याति में सहायक रहती है। इस प्रकार से वास्तु सम्मत उपरोक्त सुझाव उस उम्मीदवार या पार्टी की सरकार बनने की संभावना में वास्तु सहायक अथवा मददगार साबित हो सकता है।

पंडित अंजनी कुमार दाधीच 
लेखक - Pandit Anjani Kumar Dadhich
पंडित अंजनी कुमार दाधीच
Nakshatra jyotish Hub
नक्षत्र ज्योतिष हब
📧panditanjanikumardadhich@gmail.com
फोन नंबर - 9414863294, 6377054504

Sunday, 17 March 2024

सुनहला

पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार ज्योतिष शास्त्र मे रत्नों का बहुत महत्व माना गया है। लोग निजी जीवन, करियर व सुख-समृद्धि प्राप्त करने हेतु रत्न धारण करते हैं। हर रत्न का अपना एक अलग प्रभाव होता है।ज्योतिष शास्त्र में कुछ ऐसे रत्नों के बारे में बताया गया गया है, जिन्हें धारण करने से धन संबंधित समस्याओं से छुटकारा मिल सकता है और साथ ही मान्यता है कि धन-संपदा में वृद्धि भी होती है। इन्हीं रत्नों में से एक है सुनहला रत्न।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार सुनहला रत्न बृहस्पति से संबंधित होता है। इसको गुरुवार के दिन धारण करना शुभ माना जाता है। सुनहला को टोपाज के नाम से भी जाना जाता है। सुनहला पुखराज रत्न का ही उपरत्न माना जाता है। सुनहला रत्न को सिट्रीन स्‍टोन भी कहते है। 
सुनहला स्टोन को कैसे पहने?
सिट्रीन स्‍टोन(सुनहला)की अंगूठी को सीधे हाथ की तर्जनी उंगली में पहनना चाहिए और इसे सोने की धातु में या पंचधातु में पहना जा सकता है।
सुनहला स्टोन के लाभ निम्नलिखित है -
सुनहला धारण करने से गुरू ग्रह से संबंधित सभी लाभ प्राप्‍त होते हैं। यह धन और सम्‍मान वृद्ध‍ि में सहायक होता है। सुनहला पहनने से आर्थिक लाभ होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।
सिट्रीन स्‍टोन(सुनहला रत्न) मणिपुर चक्र पर कार्य करता है और एनर्जी को बढ़ाता है। यह व्‍यक्‍ति के आसपास फैली नकारात्‍मक ऊर्जा को खत्‍म करता है।
सुनहला रत्न मेडिटेशन, मानसिक जागरूकता और आध्‍यात्‍मिक विकास में लाभकारी होता है।

सूर्य अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र

 
सूर्य अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र पाठ महाभारत के वनपर्व के तीसरे अध्याय में वर्णित है जो ऋषि धौम्य द्वारा युधिष्ठिर को भगवान सूर्य की महिमा और उपासना के बारे में वर्णित है।
रविवार के दिन भगवान सूर्य की पुजा कर सूर्य अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति को मनोवांछित फल, सुख, संपत्ति, समृद्धि, वैभव आदि की प्राप्ति होती है और भगवान सूर्य नारायण की कृपा प्राप्त होती है।
श्री सूर्य अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र

|| अथ श्रीसूर्याष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् ||

॥ संकल्प॥

श्रीसूर्यनारायणदेवतामुद्दिश्य प्रीत्यर्थं,

श्रीसूर्याष्टोत्तरशतनामस्तोत्रमहामन्त्रपठनं करिष्ये ॥

अस्य श्रीसूर्याष्टोतरशतनामस्तोत्रमहामन्त्रस्य, ब्रह्मा ऋषिः,

अनुष्टुप्च्छन्दः, श्रीसूर्यनारायणो देवता ।

ह्रां बीजं, ह्रीं शक्तिः ह्रूं कीलकं,

श्रीसूर्यनारायणदेवताप्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ।

न्यासौ – करन्यासः हृदयन्यासः

ओं ह्रां अघोर श्रीसूर्यनारायणाय – अङ्गुष्ठाभ्यां नमः – हृदयायनमः

ॐ ह्रीं चतुर्वेदपारायणाय – तर्जनीभ्यां नमः – शिरसेस्वाहा

ॐ ह्रूं उग्रभयङ्कराय – मध्यमाभ्यां नमः – शिखायै वषट्

ॐ हैं श्रीसूर्यनारायणाय – अनामिकाभ्यां नमः – कवचाय हुं

ॐ हौं कौपीनमौञ्जीधराय – कनिष्ठिकाभ्यां नमः – नेत्रत्रयाय वौषट्

ओं ह्रं सहस्रकिरणाय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः – अस्त्राय फट्

भूर्भुवस्स्वरोमिति दिग्बन्धः ॥

ध्यानं

सुरगणपितृयक्षसेवितं ह्यसुरनिशाचरसिद्धवन्दितम् ।

वरकनकहुताशनप्रभं प्रणिपतितोऽस्मि हिताय भास्करम् ॥

लमिति पञ्चपूजां कृत्वा गुरुध्यानं कुर्यात् ।

सूर्योऽर्यमा भगस्त्वष्टा पूषार्कस्सविता रविः ।

गभस्तिमानजः कालो मृत्युर्धाता प्रजापतिः ॥

वैशम्पायन उवाच ।

श्रृणुष्वावहितो राजन् शुचिर्भूत्वा समाहितः ।

क्षणं च कुरु राजेन्द्र गुह्यं वक्ष्यामि ते हितम् ॥ १॥

धौम्येन तु यथा प्रोक्तं पार्थाय सुमहात्मने ।

नाम्नामष्टोत्तरं पुण्यं शतं तच्छृणु भूपते ॥ २॥

सूर्योऽर्यमा भगस्त्वष्टा पूषार्कः सविता रविः ।

गभस्तिमानजः कालो मृत्युर्धाता प्रभाकरः ॥ ३॥

पृथिव्यापश्च तेजश्च खं वायुश्च परायणम् ।

सोमो बृहस्पतिः शुक्रो बुधोऽङ्गारक एव च ॥ ४॥

इन्द्रो विवस्वान्दीप्तांशुः शुचिः शौरिः शनैश्चरः ।

ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च स्कन्दो वैश्रवणो यमः ॥ ५॥

वैद्युतो जाठरश्चाग्निरैन्धनस्तेजसां पतिः ।

धर्मध्वजो वेदकर्ता वेदाङ्गो वेदवाहनः ॥ ६॥

कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिः सर्वामराश्रयः ।

कला काष्ठा मुहुर्ताश्च पक्षा मासा ऋतुस्तथा ॥ ७॥

संवत्सरकरोऽश्वत्थः कालचक्रो विभावसुः ।

पुरुषः शाश्वतो योगी व्यक्ताव्यक्तः सनातनः ॥ ८॥

लोकाध्यक्षः प्रजाध्यक्षो विश्वकर्मा तमोनुदः ।

वरुणः सागरोंऽशुश्च जीमूतो जीवनोऽरिहा ॥ ९॥

भूताश्रयो भूतपतिः सर्वलोकनमस्कृतः ।

स्रष्टा संवर्तको वह्निः सर्वस्यादिरलोलुपः ॥ १०॥

अनन्तः कपिलो भानुः कामदः सर्वतोमुखः ।

जयो विशालो वरदः सर्वधातुनिषेचिता ॥ ११॥

मनः सुपर्णो भूतादिः शीघ्रगः प्राणधारणः ॥

धन्वन्तरिर्धूमकेतुरादिदेवोऽदितेः सुतः ॥ १२॥

द्वादशात्मारविन्दाक्षः पिता माता पितामहः ।

स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्षद्वारं त्रिविष्टपम् ॥ १३॥

देहकर्ता प्रशान्तात्मा विश्वात्मा विश्वतोमुखः ।

चराचरात्मा सूक्ष्मात्मा मैत्रेण वपुषान्वितः ॥ १४॥

एतद्वै कीर्तनीयस्य सूर्यस्यैव महात्मनः ।

नाम्नामष्टशतं पुण्यं शक्रेणोक्तं महात्मना ॥ १५॥

शक्राच्च नारदः प्राप्तो धौम्यश्च तदनन्तरम् ।

धौम्याद्युधिष्ठिरः प्राप्य सर्वान्कामानवाप्तवान् ॥ १६॥

सुरपितृगणयक्षसेवितं ह्यसुरनिशाचरसिद्धवन्दितम् ।

वरकनकहुताशनप्रभं त्वमपि मनस्यभिधेहि भास्करम् ॥ १७॥

सूर्योदये यस्तु समाहितः पठेत्स पुत्रलाभं धनरत्नसञ्चयान् ।

लभेत जातिस्मरतां सदा नरः स्मृतिं च मेधां च स विन्दते पराम् ॥ १८॥

इमं स्तवं देववरस्य यो नरः 
प्रकीर्तयेच्छुचिसुमनाः समाहितः ।

विमुच्यते शोकदवाग्निसागराल्लभेत 
कामान्मनसा यथेप्सितान् ॥ १९॥

श्रीसूर्यनारायणपरब्रह्मार्पणमस्तु ।

॥ इति श्रीमहाभारते युधिष्ठिरधौम्यसंवादे आरण्यकपर्वणि श्रीसूर्याष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

Saturday, 16 March 2024

होली

होली पर्व

मैं पंडित अंजनी कुमार दाधीच इस लेख में होली पर्व और उसके ज्योतिषीय उपायों की जानकारी दे रहा हूं।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार हिंदू धर्म का प्रमुख पर्व होली है। फाल्गुन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा की रात होलिका दहन किया जाता है और इसके अगले दिन होली मनाई जाती है। होली बुराई पर अच्छाई की जीत और रंगों के त्यौहार के रूप में मनाई जाने वाली होली को वसंत के आरम्भ और शीत ऋतु के समापन के रूप में मनाया जाता है। हर साल फाल्गुन के महीने में रंगों का सबसे बड़ा त्योहार होली बड़े ही उत्साह और उमंग के साथ मनाई जाती है। होली भाईचारे, आपसी प्रेम और सद्भावना का त्योहार है। इस दिन लोग एक दूसरे को रंगों में सराबोर करते हैं। घरों में गुझिया और पकवान बनते हैं। लोग एक दूसरे के घर जाकर रंग-गुलाल लगाते हैं और होली की शुभकामनाएं देते हैं।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार तांत्रिक क्रियाओं की दृष्टि से होली का दिन विशिष्ट माना गया है। होली पर्व को तंत्र के अभिचार कर्म का प्रयोग करने के लिए विशिष्ट माना जाता है। तंत्र के अभिचार कर्म का आशय वशीकरण, मोहन, मारण, उच्चाटन, स्तम्भन एवं विद्वेषण से है। होली का पर्व तांत्रिक प्रयोगों से रक्षा हेतु शुभ मुहूर्त है। तांत्रिक अभिचार कर्मों से मुक्ति के लिए होली के दिन की गई साधनाएं एवं प्रयोग सरलता से सफल होते है। तंत्र शास्त्र के अनुसार होली के दिन कुछ खास उपाय करने से मनचाहा काम हो जाता है। तंत्र क्रियाओं के लिए प्रमुख चार रात्रियों में से एक रात ये भी है।

होलिका दहन क्यों ?

पंडित अंजनी कुमार दाधीच के बताए मुताबिक वैदिक धर्मग्रंथों के अनुसार होलिका दहन को लेकर माना जाता है कि इस दिन भगवान हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रहलाद जो भगवान की भक्ति में लीन था। उसे अपनी बहन होलिका के जरिए जिंदा जला देना चाहा था। लेकिन, प्रहलाद की भक्ति की जीत हुई और होलिका आग में जलकर भस्म हो गई। तभी से होलिका दहन की परंपरा चली आ रही है। होलिका दहन के अगले दिन रंगों का उत्सव मनाया जाता है। रंग वाली होली को धुलहंडी के नाम से भी जाना जाता है।

होलिका दहन कब

पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार इस साल फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि 24 मार्च को सुबह 9 बजकर 54 मिनट से शुरू होकर 25 मार्च को दोपहर 12 बजकर 29 मिनट तक रहेगी। दिनांक 24 मार्च को ही होलिका दहन किया जाएगा। इस दिन होलिका दहन के लिए शुभ मुहूर्त देर रात 11:13 बजे से लेकर 12: 27 बजे तक है। ऐसे में होलिका दहन के लिए आपको कुल 1 घंटे 14 मिनट का समय मिलेगा।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी से होलिका दहन तक के आठ दिन भारतीय ज्योतिष में अशुभ माने जाते हैं इनको होलाष्टक नाम से जाना जाता है। इन दिनों में सभी शुभ कार्य वर्जित माने जाते हैं। होलाष्टक के पहले ही दिन (अष्टमी तिथि)पर एक पेड़ की शाखा काटकर उसमें रंग-बिरंगे कपड़ों के टुकड़े काटकर बांध देते हैं और उसे जमीन में गाड़ते हैं और होलिका दहन के लिए लकड़ियां और घरों में गोबर के थेपले बनाकर रखे जाती है। जिस जगह होलिका दहन होगा उस जगह होली की लकड़ियां रखना शुरू होता है। इन आठ दिनों में वातावरण में नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव बहुत अधिक रहता है। होलाष्टक अष्टमी तिथि से आरंभ होता है। अष्टमी से लेकर पूर्णिमा तक अलग-अलग ग्रहों का प्रभाव बहुत अधिक रहता है। जिस कारण इन दिनों में शुभ कार्य न करने की सलाह दी जाती है। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार इन 8 दिनों में ग्रह अपने स्थान में बदलाव करते हैं। इसी वजह से ग्रहों के चलते इस अशुभ समय के दौरान किसी भी तरह का शुभ कार्य नहीं किया जाता है। ज्योतिष शास्त्र में कहा गया है कि होलाष्टक के दौरान शुभ कार्य करने से व्यक्ति के जीवन में कष्ट, दर्द का प्रवेश होता है। अगर इस समय में कोई विवाह कर ले तो भविष्य में कलह का शिकार या संबंधों में टूट पड़ सकती है। इनमें अष्टमी तिथि को चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चुतर्दशी को मंगल तो पूर्णिमा को राहू की ऊर्जा काफी नकारात्मक रहती है। 
मुहूर्त चिन्तामणि पीयूषधारा संस्कृत टीका शुभाशुभप्रकरण श्लोक सं. 40 की टीका पृष्ठ 34 में लिखा है कि
 "शुक्लाष्टमीसमारभ्य फाल्गुनस्य दिनाष्टकम्। 
पूर्णिमावधिकं व्याज्यं होलाष्टकमिदं शुभे।।’’ (शीघ्रबोध श्लोक सं. 137)
‘‘शुतुद्रयां च विपाशायामैरावत्यां त्रिपुष्करे।
 होलाष्टकं विवाहावौत्याज्यमन्यत्र शोभनम्’’ (शीघ्रबोध श्लोक सं. 138)
उपरोक्त प्रमाण श्लोकों की विस्तृत व्याख्या मुहूर्त चिन्तामणि के सुप्रसिद्ध टीकाकार श्री कपिलेश्वर झा जी ने अपनी हिन्दी टीका में इस प्रकार लिखा है। सतलज (शुतुद्री), विपाशा (व्यास), इरावती (रावी) नदियों के तटवर्ती क्षेत्र और त्रिपुष्कर (पुष्कर) क्षेत्र में फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा से आठ दिन पहले होलाष्टक के कारण विवाहादि शुभ कार्य नहीं करना चाहिए। इनसे भिन्न स्थानों में ही विवाह आदि कार्य करना चाहिए।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार फाल्गुन मास की पुर्णिमा के दिन होलिका का दहन किया जाता है और भगवान नरसिंह एवं भक्त प्रह्लाद की पुजा की जातीं हैं। होलीका दहन के लिए पुजा विधी निम्नलिखित है -
⁠✿ होलिका दहन की पूजा करने के लिए सबसे पहले स्नान करना जरूरी है।
✿ स्नान के बाद होलिका की पूजा वाले स्थान पर उत्तर या पूरब दिशा की ओर मुंह करके बैठ जाएं।
✿ पूजा करने के लिए पूजा की सामग्री इकठ्ठा कर लें जिसमें रोली, अक्षत, फूल, फूलों की माला, कच्चा सूत, गुड़, साबुत हल्दी, मूंग, बताशे, गुलाल नारियल, 5 से 7 तरह के अनाज और एक लोटे में पानी रख लें।
✿ होलिका के प्रतीक रुपी रोपे गए वृक्ष की शाखा (होलिका डांडी)और प्रह्लाद रुपी नारियल की इन सभी पूजन सामग्री के साथ पूरे विधि-विधान से पूजा करते हुए मिठाइयां और फल चढ़ाएं।
✿ होलिका की पूजा के साथ ही भगवान नरसिंह की भी विधि-विधान से पूजा करें और फिर होलिका के चारों ओर सात बार परिक्रमा करनी चाहिए।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार होली पर किए जाने वाले कुछ अद्भुत उपाय निम्नलिखित हैं -
✷ घर के प्रत्येक सदस्य को होलिका दहन में देशी घी में भिगोई हुई दो लौंग, एक बताशा और एक पान का पत्ता अवश्य चढ़ाना चाहिए। होली की ग्यारह परिक्रमा करते हुए होली में सूखे नारियल की आहुति देनी चाहिए। इससे सुख-समृद्धि बढ़ती है और साथ ही कष्ट दूर होते हैं। 
✷ होली पर पूरे दिन अपनी जेब में काले कपड़े में बांधकर काले तिल रखें। रात को जलती होली में उन्हें डाल दें। यदि पहले से ही कोई टोटका होगा तो वह भी खत्म हो जाएगा। 
✷ होली दहन के समय सात गोमती चक्र लेकर भगवान से प्रार्थना करें कि आपके जीवन में कोई शत्रु बाधा न डालें। प्रार्थना के पश्चात पूर्ण श्रद्धा व विश्वास के साथ गोमती चक्र दहन में डाल दें। 
✷होली दहन के दूसरे दिन होली की राख को घर लाकर उसमें थोडी सी राई व नमक मिलाकर रख लें। इस प्रयोग से भूतप्रेत या नजर दोष से मुक्ति मिलती है। 
✷ होली के दिन से शुरु होकर बजरंग बाण का 40 दिन तक नियमित पाठ करनें से हर मनोकामना पूर्ण होगी। 
✷यदि व्यापार या नौकरी में उन्नति न हो रही हो तो 21 गोमती चक्र लेकर होली दहन के दिन रात्रि में शिवलिंग पर चढा दें। 
✷ नवग्रह बाधा के दोष को दूर करने के लिए-होली की राख से शिवलिंग की पूजा करें तथा राख मिश्रित जल से स्नान करें और होली वाले दिन किसी गरीब को भोजन अवश्य करायें। 
✷ होली की रात्रि को सरसों के तेल का चौमुखी दीपक जलाकर पूजा करें व भगवान से सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें। इस प्रयोग से बाधा निवारण होता है। 
✷ मनोकामना की पूर्ति हेतु- होली के दिन से शुरू करके प्रतिदिन हनुमान जी को पांच लाल पुष्प चढ़ाएं इससे आपकी सारी मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण होगी। 
✷ होली की प्रातः बेलपत्र पर सफेद चंदन की बिंदी लगाकर अपनी मनोकामना बोलते हुए शिवलिंग पर सच्चे मन से अर्पित करें। बाद में सोमवार को किसी मंदिर में भोलेनाथ को पंचमेवा की खीर अवश्य चढ़ाने से समस्त मनोकामनाएं पूरी होगी। 
✷ स्वास्थ्य लाभ हेतु- मृत्यु तुल्य कष्ट से ग्रस्त रोगी को छुटकारा दिलाने के लिए जौ के आटे में काले तिल एवं सरसों का तेल मिला कर मोटी रोटी बनाएं और उसे रोगी के ऊपर से सात बार उतारकर भैंस को खिला दें। यह क्रिया करते समय ईश्वर से रोगी को शीघ्र स्वस्थ करने की प्रार्थना करते रहें। 
✷ व्यापार लाभ के लिए- होली के दिन गुलाल के एक खुले पैकेट में एक मोती शंख और चांदी का एक सिक्का रखकर उसे नए लाल कपड़े में लाल मौली से बांधकर तिजोरी में रखने से व्यवसाय में लाभ होगा। 
✷ होली के अवसर पर एक एकाक्षी नारियल की पूजा करके लाल कपड़े में लपेट कर दूकान में या व्यापार स्थल पर स्थापित करें। साथ ही स्फटिक का शुद्ध श्रीयंत्र रखें। आपके लाभ में दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि होगी। 
✷ धनहानि से बचाव के लिए- होली के दिन मुख्य द्वार पर गुलाल छिड़कें और उस पर द्विमुखी दीपक जलाएं। दीपक जलाते समय धनहानि से बचाव की कामना करें। जब दीपक बुझ जाए तो उसे होली की अग्नि में डाल दें इससे धन हानि से बचाव होगा।  
✷दुर्घटना से बचाव के लिए- होलिका दहन से पूर्व पांच काली गुंजा लेकर होली की पांच परिक्रमा लगाकर अंत में होलिका की ओर पीठ करके पांचों गुन्जाओं को सिर के ऊपर से पांच बार उतारकर सिर के ऊपर से होली में फेंक दें। 
✷ होली के दिन प्रातः उठते ही किसी ऐसे व्यक्ति से कोई वस्तु न लें, जिससे आप द्वेष रखते हों। सिर ढक कर रखें। किसी को भी अपना पहना वस्त्र या रुमाल नहीं दें। इसके अतिरिक्त इस दिन शत्रु या विरोधी से पान, इलायची, लौंग आदि न लें। 
✷ अगर आपके घर में कोई शारीरिक कष्टों से पीड़ित और उसको रोग छोड़ नहीं रहे है तो 11 अभिमंत्रित गोमती चक्र बीमार व्यक्ति के शरीर से 21 बार उसार कर होली की अग्नि में डाल दे शारीरिक कष्टों से शीघ्र मुक्ति मिल जायेगी।
✷ अगर बुध ग्रह आपकी कुंडली में संतान प्राप्ति में बाधा दाल रहा है तो किसी भी बच्चे वाली गरीब महिला को होली वाले दिन से शुरु कर एक महीने तक हरी सब्जियाँ दें। माता वैष्णो-देवी से संतान की प्रार्थना करें। 
✷ शीघ्र विवाह हेतु- जो युवा विवाह योग्य हैं और सर्वगुण संपन्न हैं, फिर भी शादी नहीं हो पा रही है तो यह उपाय करें। होली के दिन किसी शिव मंदिर जाएं और अपने साथ 1 साबूत पान, 1 साबूत सुपारी एवं हल्दी की गांठ रख लें। पान के पत्ते पर सुपारी और हल्दी की गांठ रखकर शिवलिंग पर अर्पित करें। इसके बाद पीछे देखें बिना अपने घर लौट आएं। यही प्रयोग अगले दिन भी करें। इसके साथ ही समय-समय शुभ मुहूर्त में यह उपाय किया जा सकता है। जल्दी ही विवाह के योग बन जाएंगे।
✷ राहु का उपाय – होलीका दहन के दिन एक नारियल का गोला लेकर उसमे अलसी का तेल भरकर उसी में थोडा सा गुड डाले फिर उस नारियल के गोले को राहू से ग्रस्त व्यक्ति अपने शारीर के अंगो से स्पर्श करवाकर जलती हुई होलिका में डाल देवे। पुरे वर्ष भर राहू से परेशानी की संभावना नहीं रहेगी।
✷ हनुमान जी के लिए उपाय - होली के दिन तेल, बेसन और उड़द के आटे से बनाई हुई हनुमानजी की मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा करके तेल और घी का दीपक जलाएं तथा विधिवत पूजन कर पूआ, मिठाई आदि का भोग लगाएं। इसके बाद 27 पान के पत्ते तथा सुपारी आदि मुख शुद्धि की चीजें लेकर इनका बीड़ा बनाकर हनुमानजी को अर्पित करें। इसके बाद इस मंत्र का जप करें-
मंत्र- नमो भगवते आंजनेयाय महाबलाय स्वाहा।
फिर आरती, स्तुति करके अपने इच्छा बताएं और प्रार्थना करके इस मूर्ति को विसर्जित कर दें। इसके बाद किसी योग्य ब्राह्मण को भोजन कराकर व दान देकर ससम्मान विदा करें। यह उपाय करने से शीघ्र ही आपकी मनोकामना पूरी होगी।
**********************************************
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार यह सारे उपाय करने से दुर्घटना से बचाव होगा और आपकी रक्षा होगी। **********************************************
✷✷✷ध्यान रखने योग्य- ये सारे उपाय सावधानीपूर्वक करें। आत्मरक्षा हेतु किसी को कष्ट न पहुंचाएं, किसी का बुरा न करें और न सोचें।
लेखक - Pandit Anjani Kumar Dadhich
पंडित अंजनी कुमार दाधीच
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Monday, 11 March 2024

शिव महिम्न स्तोत्र

शिव महिम्न स्तोत्र 
मै पंडित अंजनी कुमार दाधीच आज इस लेख में भगवान शिव को समर्पित गंधर्व राज पुष्पदंत द्वारा रचित शिव महिम्न स्तोत्र के बारे में जानकारी दे रहा हूं।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार वैसे तो भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कई प्रकार की स्तुतियां, मंत्रो, स्तोत्रो, चालिसाओ आदि का उपयोग किया जाता रहा है पर गंधर्व राज पुष्पदंत ने भगवान शिव की महिमा का बखान करते हुए शिव महिम्न स्तोत्र की रचना करते हुए भगवान शिव का पुजन और जलाभिषेक कर अपने सभी कष्टों को दूर किया। सभी शिवभक्तो को सोमवार के दिन शिवलिंग पर जलाभिषेक कर पुजा करते हुए पुष्पदंत द्वारा रचित शिव महिम्न स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति अपने संचित पापों से मुक्ति और सारे भौतिक सुख पाता है। शिव महिम्न स्तोत्र में 43 छंद है जिसमें शिव के दिव्य स्वरूप एवं उनकी सादगी का वर्णन है। इसके पाठ करने से व्यक्ति का भय, और भूत-प्रेत बाधा भय दूर होते हैं।

शिव महिम्न स्तोत्र
।।अथ श्री शिवमहिम्न: स्तोत्रम्।।

महिम्न: पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी 

स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिर: ।

अथावाच्य: सर्व: स्वमतिपरिणामावधि गृणन्

ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवाद: परिकर: ।।1।।

 अतीत: पन्थानं तव च महिमा वाड्मनसयो – 

रतद्व्यावृत्त्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि ।

स कस्य स्तोतव्य: कतिविधगुण: कस्य विषय:

पदे त्वर्वाचीने पतति न मन: कस्य न वच: ।।2।।

 मधुस्फीता वाच: परमममृतं निर्मितवत –

स्तव ब्रह्मन् किं वागपि सुरगुरोर्विस्मयपदम् ।

मम त्वेतां वाणीं गुणकथनपुण्येन भवत: 

पुनामीत्यर्थेsस्मिन् पुरमथन बुद्धिर्व्यवसिता ।।3।।

 तवैश्चर्यं यत्तज्जगदुदयरक्षाप्रलयकृत्

त्रयीवस्तुव्यस्तं तिसृषु गुणभिन्नासु तनुषु ।

अभव्यानामस्मिन् वरद रमणीयामरमणीं 

विहन्तुं व्याक्रोशीं विदधत इहैके जडधिय: ।।4।।

 किमीह: किंकाय स खलु किमुपायस्त्रिभुवनं 

किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च ।

अतर्क्यैश्वर्ये त्वय्यनवसरदु:स्तो हतधिय: 

कुतर्कोsयं कांश्चिन्मुखरयति मोहाय जगत: ।।5।।

 अजन्मानो लोका: किमवयववन्तोsपि जगता – 

मधिष्ठातारं किं भवविधिरनादृत्य भवति ।

अनीशो वा कुर्याद् भुवनजनने क: परिकरो 

यतो मन्दास्त्वां प्रत्यमरवर संशेरत इमे ।।6।।

 त्रयी सांख्यं योग: पशुपतिमतं वैष्णवमिति 

प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमद: पथ्यमिति च ।

रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषां 

नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ।।7।।

 महोक्ष: खट्वांगं परशुरजिनं भस्म फणिन: 

कपालं चेतीयत्तव वरद तन्त्रोपकरणम् ।

सुरास्तां तामृधिं दधति च भवद्भ्रूप्रणिहितां 

न हि स्वात्मारामं विषयमृगतृष्णा भ्रमयति ।।8।।

 ध्रुवं कश्चित् सर्वं सकलमपरस्त्वध्रुवमिदं 

परो ध्रौव्याध्रौव्ये जगति गदति व्यस्तविषये ।

समस्ते sप्येतस्मिन् पुरमथन तैर्विस्मित इव 

स्तुवंजिह्रेमि त्वां न खलु ननु धृष्टा मुखरता ।।9।।

 तवैश्चर्यं यत्नाद् यदुपरि विरिंचो हरिरध: 

परिच्छेत्तुं यातावनलमनलस्कन्धवपुष: ।

ततो भक्तिश्रद्धाभरगुरुगृणद्भ्यां गिरिश यत्

स्वयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिर्न फलति ।।10।।

 अयत्नादापाद्य त्रिभुवनमवैरव्यतिकरं 

दशास्यो यद् बाहूनभृत रणकण्डूपरवशान् ।

शिर:पद्मश्रेणीरचितचरणाम्भोरुहबले: 

स्थिरायास्त्वद्भक्तेस्त्रिपुरहर विस्फूर्जितमिदम् ।।11।।

 अमुष्य त्वत्सेवासमधिगतसारं भुजवनं 

बलात् कैलासेsपि त्वदधिवसतौ विक्रमयत: ।

अलभ्या पातालेsप्यलसचलितांगुष्ठशिरसि 

प्रतिष्ठा त्वय्यासीद् ध्रुवमुपचितो मुह्यति खल: ।।12।।

 यदृद्धिं सुत्राम्णो वरद परमोच्चैरपि सती – 

मधश्चक्रे बाण: परिजनविधेयत्रिभुवन: ।

न तच्चित्रं तस्मिन् वरिवसितरि त्वच्चरणयो – 

र्न कस्याप्युन्नत्यै भवति शिरसस्त्वय्यवनति: ।।13।।

 अकाण्डब्रह्माण्डक्षयचकितदेवासुरकृपा – 

विधेयस्यासीद्यस्त्रिनयनविषं संहृतवत: ।

स कल्माष: कण्ठे तव न कुरुते न श्रियमहो 

विकारोsपि श्लाघ्यो भुवनभयभंगव्यसनिन: ।।14।।

 असिद्धार्था नैव क्वचिदपि सदेवासुरनरे 

निवर्तन्ते नित्यं जगति जयिनो यस्य विशिखा: ।

स पश्यन्नीश त्वामितरसुरसाधारणमभूत्

स्मर: स्मर्तव्यात्मा नहि वशिषु पथ्य: परिभव: ।।15।।

 मही पादाघाताद् व्रजति सहसा संशयपदं 

पदं विष्णोर्भ्राम्यद्भुजपरिघरुग्णग्रहगणम् ।

मुहुर्द्यौर्दौ:स्थ्यं यात्यनिभृतजटाताडिततटा 

जगद्रक्षायै त्वं नटसि ननु वामैव विभुता ।।16।।

 वियद्व्यापी तारागणगुणितफेनोद्ग्मरुचि: 

प्रवाहो वारां य: पृषतलघुदृष्ट: शिरसि ते ।

जगद् द्वीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमि – 

त्यनेनैवोन्नेयं धृतमहिम दिव्यं तव वपु: ।।17।।

 रथ: क्षोणी यन्ता शतधृतिरगेन्द्रो धनुरथो 

रथांगे चन्द्रार्कौ रथचरणपाणि: शर इति ।

दिधक्षोस्ते कोsयं त्रिपुरतृणमाडम्बरविधि – 

र्विधेयै: क्रीडन्त्यो न खलु परतन्त्रा: प्रभुधिय: ।।18।।

 हरिस्ते साहस्त्रं कमलबलिमाधाय पदयो – 

र्यदेकोने तस्मिन् निजमुदहरन्नेत्रकमलम् ।

गतो भक्त्युद्रेक: परिणतिमसौ चक्रवपुषा 

त्रयाणां रक्षायै त्रिपुरहर जागर्ति जगताम् ।।19।।

 क्रतौ सुप्ते जाग्रत्त्वमसि फलयोगे क्रतुमतां 

क्व कर्म प्रध्वस्तं फलति पुरुषाराधनमृते ।

अतस्त्वां सम्प्रेक्ष्य क्रतुषु फलदानप्रतिभुवं 

श्रुतौ श्रद्धां बद्ध्वा दृढपरिकर: कर्मसु जन: ।।20।।

 क्रियादक्षो दक्ष: क्रतुपतिरधीशस्तनुभृता – 

मृषीणामार्त्विज्यं शरणद सदस्या: सुरगणा: ।

क्रतुभ्रेषस्त्वत्त: क्रतुफलविधानव्यसनिनो 

ध्रुवं कर्तु: श्रद्धाविधुरमभिचाराय हि मखा: ।।21।।

 प्रजानाथं नाथ प्रसभमभिकं स्वां दुहितरं 

गतं रोहिद्भूतां रिरमयिषुमृष्यस्य वपुषा ।

धनुष्पाणेर्यातं दिवमपि सपत्राकृतममुं 

त्रसन्तं तेsद्यापि त्यजति न मृगव्याधरभस: ।।22।।

 स्वलावण्याशंसाधृतधनुषमह्नाय तृणवत्

पुर: प्लुष्टं दृष्ट्वा पुरमथन पुष्पायुधमपि ।

यदि स्त्रैणं देवी यमनिरतदेहार्धघटना – 

दवैति त्वामद्धा बत वरद मुग्धा युवतय: ।।23।।

 श्मशानेष्वाक्रीडा स्मरहर पिशाचा: सहचरा – 

श्चिताभस्मलेप: स्त्रगपि नृकरोटीपरिकर: ।

अमंगलल्यं शीलं तव भवतु नामैवमखिलं 

तथापि स्मर्तृणां वरद परमं मंगलमसि ।।24।।

 मन: प्रत्यक्चित्ते सविधमवधायात्तमरुत: 

प्रहृष्यद्रोमाण: प्रमदसलिलोत्संगितदृश: ।

यदालोक्याह्लादं हृद इव निमज्यामृतमये 

दधत्यन्तस्तत्त्वं किमपि यमिनस्तत् किल भवान् ।।25।।

 त्वमर्कस्त्वं सोमस्त्वमसि पवनस्त्वं हुतवह – 

स्त्वमापस्त्वं व्योम त्वमु धरणिरात्मा त्वमिति च ।

परिच्छिन्नामेवं त्वयि परिणता बिभ्रतु गिरं 

न विद्मस्तत्तत्त्वं वयमिह तु यत्त्वं न भवसि ।।26।।

 

त्रयीं तिस्त्रो वृत्तीस्त्रिभुवनमथो त्रीनपि सुरा – 

नकाराद्यैर्वर्णैस्त्रिभिरभिदधत् तीर्णविकृति ।

तुरीयं ते धाम ध्वनिभिरवरुन्धानमणुभि: 

समस्तं व्यस्तं त्वं शरणद गृणात्योमिति पदम् ।।27।।

 भव: शर्वो रुद्र: पशुपतिरथोग्र: सहमहां – 

स्तथा भीमेशानाविति यदभिधानाष्टकमिदम् ।

अमुष्मिन् प्रत्येकं प्रविचरति देव श्रुतिरपि 

प्रियायास्मै धाम्ने प्रविहितनमस्योsस्मि भवते ।।28।।

 नमो नेदिष्ठाय प्रियदव दविष्ठाय च नमो 

नम: क्षोदिष्ठाय स्मरहर महिष्ठाय च नम: ।

नमो वर्षिष्ठाय त्रिनयन यविष्ठाय च नमो 

नम: सर्वस्मै ते तदिदमिति शर्वाय च नम: ।।29।।

 बहुलरजसे विश्वोत्पत्तौ भवाय नमो नम: 

प्रबलतमसे तत्संहारे हराय नमो नम: ।

जनसुखकृते सत्त्वोद्रिक्तौ मृडाय नमो नम: 

प्रमहसि पदे निस्त्रैगुण्ये शिवाय नमो नम: ।।30।।

 कृशपरिणति चेत: क्लेशवश्यं क्व चेदं 

क्व च तव गुणसीमोल्लंघिनी शश्वदृद्धि: ।

इति चकितममन्दीकृत्य मां भक्तिराधाद्  

वरद चरणयोस्ते वाक्यपुष्पोपहारम् ।।31।।

 असितगिरिसमं स्यात् कज्जलं सिन्धुपात्रे 

सुरतरुवरशाखा लेखनी पत्रमुर्वी ।

लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं 

तदपि तव गुणानामीश पारं न याति ।।32।।

 असुरसुरमुनीन्द्रैरर्चितस्येन्दुमौले – 

र्ग्रथितगुणमहिम्नो निर्गुणस्येश्वरस्य ।

सकलगणवरिष्ठ: पुष्पदन्ताभिधानो 

रुचिरमलघुवृत्तै: स्तोत्रमेतच्चकार ।।33।।

 अहरहरनवद्यं धूर्जटे: स्तोत्रमेतत् 

पठति परमभक्त्या शुद्धचित्त: पुमान् य: ।

स भवति शिवलोके रुद्रतुल्यस्तथात्र 

प्रचुरतरधनायु: पुत्रवान् कीर्तिमांश्च ।।34।।

 महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुति: ।

अघोरान्नापरो मन्त्रो नास्ति तत्त्वं गुरो: परम् ।।35।।

 दीक्षा दानं तपस्तीर्थं ज्ञानं यागादिका: क्रिया: ।

महिम्न: स्तवपाठस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ।।36।।

 कुसुमदशननामा सर्वगन्धर्वराज: 

शिशुशशिधरमौलेर्देवदेवस्य दास: ।

स खलु निजमहिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोषात् 

स्तवनमिदमकार्षीद् दिव्यदिव्यं महिम्न: ।।37।।

 सुरवरमुनिपूज्यं स्वर्गमोक्षैकहेतुं 

पठति यदि मनुष्य: प्रांजलिर्नान्यचेता: ।

व्रजति शिवसमीपं किन्नरै: स्तूयमान: 

स्तवनमिदममोघं पुष्पदन्तप्रणितम् ।।38।।

 आसमाप्तमिदं स्तोत्रं पुण्यं गन्धर्वभाषितम् ।

अनौपम्यं मनोहारि शिवमीश्वरवर्णनम् ।।39।।

 इत्येषा वाड्मयी पूजा श्रीमच्छंकरपादयो: ।

अर्पिता तेन देवेश: प्रीयतां मे सदाशिव: ।।40।।

 तव तत्त्वं न जानामि कीदृशोsसि महेश्वर ।

यादृशोsसि महादेव तादृशाय नमो नम: ।।41।।

 एककालं द्विकालं वा त्रिकालं य: पठेन्नर: ।

सर्वपापविनिर्मुक्त: शिवलोके महीयते ।।42।।

 श्रीपुष्पदन्तमुखपंकजनिर्गतेन 

स्तोत्रेण किल्बिषहरेण हरप्रियेण ।

कण्ठस्थितेन पठितेन समाहितेन 

सुप्रीणितो भवति भूतपतिर्महेश: ।।43।।

।।इति गन्ध्र्वराजपुष्पदन्तकृतं शिवमहिम्न: स्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।
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Pandit Anjani Kumar Dadhich 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच
कुंडली विश्लेषक वास्तुविद एवं अंक ज्योतिषी 
panditanjanikumardadhich@gmail.com
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