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Wednesday, 1 March 2023

meaning of the individual numbers

Meaning of the Individual Numbers

Dear Readers, 
March 01, 2023, Wednesdays 
l Pandit Anjani Kumar Dadhich is giving information about Meaning of the Individual Numbers here today.
As the Pandit Anjani Kumar Dadhich says that there is a significant amount of literature available on the meaning of the individual numbers, with more detailed interpretation depending on where in your numerological chart they appear you can and should spend time researching the meaning of your individual numbers. Nevertheless, below is an outline guide for the single digit numbers from 1-9 and the Master Numbers to get you started. For more detailed information on all Numerology numbers -
 1 – Unity, beginnings, and creativity as well as mental and physical activity. It expresses leadership and a spotlight type individuality. It indicates being organized, ambitious, and a tendency to go over the top.

2 – A dualist number with traits such as yielding, receptiveness, accepting, forgiving and stability. It is a sign of devotion to truth and simplicity and often indicates a follower who is supportive, but sometimes overly subservient.

3 – Representing the trinity, three is a number of activity, harmony, and pleasure. Versatile and social, it is a sign of optimism, and the power to bring light into the lives of others.

4 – This number represents matter and reflects the 4 seasons, the 4 elements, 4 directions, 4 sides of a cube. It is a symbol of stability and determination, and perhaps rigidity.

5 – The number of the senses and the stars, it is a sign of restlessness, liveliness, and adventurousness. An impatient soul with a quick wit and a quick temper.

6 – A symbol of nurturing warmth and domestic harmony, it is a sign of support, harmony, and responsibility.

7 – A holy number reflecting the 7 days of creation, 7 pillars of wisdom and 7 chakras, it is a symbol of strength and psychic ability.

8 – A number of material matters and practicality, it relates to wealth in the material realm, but also the eightfold path from materialism to Nirvana.

9 – A number of achievement and completion, it represents broad vision and achievement.

Master Numbers
These numbers are considered to carry more potential than other numbers and to be highly charged.

11 – Represents instinct and is the most intuitive of all the numbers. It represents connection to the subconscious and gut feeling.

22 – Is a pragmatic number of doing and represents lofty goals brought down to earth and made into something real.

33 – A combination of 11 and 22, this represents a more altruistic side of life, doing things for the greater good rather than personal gain.

Written by - Pandit Anjani Kumar Dadhich
पंडित अंजनी कुमार दाधीच
Nakshatra jyotish Hub
नक्षत्र ज्योतिष हब
📧panditanjanikumardadhich@gmail.com
फोन नंबर - 9414863294

Friday, 24 February 2023

कुंडली और कैरियर

कुंडली और केरियर
कुंडली और कैरियर  
प्रिय पाठकों, 
24फरवरी2023, शुक्रवार 
मैं पंडित अंजनी कुमार दाधीच आज कुंडली और कैरियर के बारे में यहाँ जानकारी दे रहा हूँ।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार अपने व्यक्तित्व के अनुकूल या लाभदायक व्यवसाय (व्यापार) और नौकरी का चयन न कर पाते हैं जो अपनी रुचि के विपरीत है या जिसमे हम अपनी योग्यताओं या क्षमताओं का उपयोग पूरी तरह से नहीं कर पाते हैं। इस सम्बन्ध में ज्योतिष अच्छा मार्गदर्शन दे सकता है।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार लाभ और उज्ज्वल भविष्य के लिए रोजगार के हजारो व्यवसाय में से किसी एक लाभदायक व्यवसाय का चयन करना वास्तव में अत्यंत कठिन है। परन्तु विभिन्न व्यवसायों या रोजगार को दर्शाने वाले विभिन्न भावों का विश्लेषण निम्नलिखित है। 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार रोजगर को दर्शाने वाले भाव- कुण्डली के बारह भावों में से द्वितीय भाव धन का होता है। सप्तम भाव रोजगार का है। नवम भाव भाग्य का प्रतिनिधित्व करता है और ग्यारहवां भाव लाभ का है।जातक किन ग्रहों से संबंधित कार्य करेगा यह तय करना इन चार भावों के द्वारा ही सम्भव है।धन (द्वितीय)भाव व्यक्ति के बैंक बैलेंस को दर्शाता है। दैनिक रोजगार (सप्तम) भाव व्यक्ति की आजीविका से संबंधित है।
भाग्य (नवम) भाव व्यक्ति के भाग्योदय और भाग्योदय और भाग्य सम्बन्धी उतर चढ़ाव को व्यक्त करता है। लाभ (एकादश) भाव क्षेत्र विशेष की तरह संकेत देता है जहाँ से लाभ की आशा की जा सकती है।अब यहाँ समस्या उत्पन्न होती है कि किस भाव के स्वामी विशेष की प्रकृति के अनुसार वास्तु या व्यवसाय का चयन किया जाए। इस समस्या का पहला सूत्र है की जिस भाव का स्वामी सर्वाधिक बली हो अर्थात स्वराशिगत उच्चस्थ या वार्गोत्तमी हो उस ग्रह में संबंधित व्यवसाय वास्तु या नौकरी करने से लाभ होता है। हालांकि ये सब प्रचलित सूत्र है लेकिन मेरी धारणा है कि सूर्य से दशम में जो ग्रह हो उससे संबंधित व्यवसाय करने से लाभ होता है। उदाहरण के लिए सूर्य यदि मकर राशि में हो तो मकर से दसवीं राशि तुला के स्वामी शुक्र से संबंधित व्यवसाय को अपनाने से लाभ की संभावना अधिक होती है। इसके अलावा आय (लाभ) भाव इन चारों भावों में सबसे महत्वपूर्ण है। सूर्य से दशमेश के अलावा लाभ भाव पर अवश्य दृष्टि डालनी चाहिए। अनुभव में आता है कि जब जातक के जन्मांक के एकादश भाव में पाप ग्रह (शनि,मंगल,राहु) हो तो किसी भी तरह का व्यवसाय क्यों न किया जाए, लाभ की स्थिति काफी विलंब से ही आ पाती है। इन चारों भाव और सूर्य से दशमेश की परस्पर शक्ति के आकलन के बाद किसी एक ग्रह का चयन करना चाहिए। निश्चित ग्रह को पकड़ लेने के पश्चात उस ग्रह से संबंधित व्यवसाय का चयन करना चाहिए| यहां पाठकों को बता दूं कि इस अध्याय में व्यवसाय शब्द का व्यापक अर्थों में प्रयोग किया गया है।
उदाहरण के लिए आप कैसा भी कार्य करें, उसे व्यवसाय ही माना गया है।लोहे के उत्पादों की फैक्टरी का मालिक होना और लोहे की फैक्टरी में एक श्रमिक या प्रबंधक का काम करना दोनों को लोहे का ही व्यवसाय मानकर लिखा गया है।
ग्रह और उनसे संबंधित कैरियर क्या क्या होने चाहिए जो निम्नलिखित हैं -
✷ सूर्य- फायनेंसर, गोल्डस्मिथ, बीज, विक्रेता, चमड़े की वस्तुओं का निर्माता और विक्रेता, एंटीवायोटिक मेडिसिन मैन्युफैक्चर, स्कूल, कालेज, प्रबंधक, मैनेजमेंट, फार्मेसिस्ट, अस्पताल कर्मी, सामाजिक कार्यकर्ता, उत्पादन प्रबंधक आर्किटेक्ट इन्वेस्टमेंट आदि।
✷चन्द्र- लाइब्रेरियन, रिसेप्शनिस्ट लेखक, गारमेंट, डिजाइनर, चप्पल, जूता, डिजाइनर, कांसेप्ट फिल्म ड्रेस डिजाइनर, ट्यूटर, सलाहकार, सूचना अधिकारी, जिंगल राइटर, मनोवैज्ञानिक, फोरेंसिक वैज्ञानिक, पटकथा लेखक, गीतकार, ट्रैवल एजेंट, कैरियर काउंसलर, आयात-निर्यात कर्ता, ट्रांसपोर्ट, कंपनी आनर, प्रकाशन, काव्य सृजन, लघु पत्रिका का संपादन/प्रकाशन, सिल्वर स्मिथ साल्ट मर्चेंट आदि।
 मंगल- सेना अधिकारी, प्रापर्टी डीलर, डिटेक्टिव सर्जन, मेडिकल शॉप, पुलिस अधिकारी अग्निशमन आफिसर प्रोफेशनल स्पोर्ट्स प्लेयर, हेल्थ वर्कर, सिक्योरिटी सर्विस, चोर बुरा धमकाकर हफ्ता वसूली करने वाला, भूगर्भ विशेषज्ञ, सर्जिकल इंस्ट्रूमेंट मैन्युफैक्चरर और विक्रेता, भूमाफिया, हथियार विक्रेता आदि।
✷ बुध- सी.ए. लेख-विश्लेषक, क्लर्क, फीचर, संपादक, प्रकाशक, हाबी क्लास टीचर, प्रोफेशनल वक्ता, इंवेस्टमेंट प्रबंधक, कैश प्रबंधक, रीटेल शॉप, जनरल स्टोर, एकाउंट्स एग्जीक्यूटिव, लेखक, स्किन केयर विशेषज्ञ, टीवी समाचार वक्ता, जालसाज, छोटे गबन करने वाला, बुक बाइंडर, प्रूफ रीडर, कंपोजर, बैंक कर्मी, गणितज्ञ किराने का दुकानदार, मेलों का आयोजक आदि।
✷ बृहस्पति(गुरु)- सरकारी साहित्य संस्थाओं के अधिकारी, ग्वाला, वेब पेज डिजाइनर, संगठन, प्रबंधक आर्किटेक्ट, फ्रीलांस मैनेजमेंट कंसलटेंट, कम्प्यूटर प्रोग्रामर, राजनीतिज्ञ, व्यवसायी, संपादक, कालेज प्रोफेसर, वकील, मंदिर संचालक, ज्योतिषी, इकोनामि फोरकास्टर, शोधकर्ता धार्मिक कार्यकर्ता, सामाजिक कार्यकर्ता, होटल प्रबंधक, प्रोजेक्ट मैनेजर, न्यायाधीश, सरकारी सेवाकर्मी, राजदूत, प्रकाशक, दीवानी मुकदमों के अधिवक्ता आदि।
✷ शुक्र- मीडिया प्लानर, सर्जन, इंटीरियर डेकोरेटर, फोटोग्राफर, ज्योतिषी, मैरिज ब्यूरो संचालक, टीवी एंकर, ब्यूटीशियन, टीवी और फिल्म अभिनेता। अभिनेत्री, फैशन डिजाइनर, ज्वैलरी डिजाइनर, संगीतज्ञ, माडल, गायक, केश सज्जा, मेकअप विशेषज्ञ, आयुर्वेद डाक्टर, मैन्युफैक्चरर आफ मेडिसिन, वेश्या, नट, सौन्दर्य प्रसाधन विक्रेता आभूषण प्रबंधक, मिठाई निर्माता/विक्रेता आदि।
✷ शनि- उत्पादन प्रबंधक, हार्डवेयर इंजीनियर, टेक्नीशियन, वैज्ञानिक शोधकर्ता, विदेशी भाषा अनुवादक, कम्प्यूटर प्रोग्रामर, प्राइवेट डिटेक्टिव, अंग्रेजी भाषा अध्यापक, फ्लोर मिल आनर, लेबोरेट्री टेक्नीशियन, कबाडी एंटिक आर्टिकल बुलेक्टर और सेलर, स्टील फैक्ट्री मालिक/श्रमिक आदि।
✷ राहु- वेंचट कैपिटलिस्ट, फिजियो थेरेपिस्ट, शेयर ब्रोकर, राजनीतिज्ञ, होटल कर्मी, घोटाला करने वाले आपोपार्ट्स विक्रेता, शराब के ठेकेदार, नशीले पदार्थों, हड्डियों का ठेकेदार आदि।
✷ केतु- मंदिरों से संबंधित कार्य करने वाला, झंडों का निर्माता और विक्रेता रस्सी जैसी लम्बी वस्तुओं का निर्माता और विक्रेता आदि।
लेखक - Pandit Anjani Kumar Dadhich
पंडित अंजनी कुमार दाधीच
Nakshatra jyotish Hub
नक्षत्र ज्योतिष हब
📧panditanjanikumardadhich@gmail.com
फोन नंबर - 9414863294

Thursday, 23 February 2023

होलाष्टक

होलाष्टक
प्रिय पाठकों, 
23फरवरी2023, गुरुवार 
मैं पंडित अंजनी कुमार दाधीच आज होलाष्टक और विभिन्न उपायों के बारे में यहाँ जानकारी दे रहा हूँ।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार हिन्दू धर्म शास्त्रों के मुताबिक होली के त्योहार से पहले के 8 दिनो को शुभ नहीं माना जाता है। इन आठ दिनों को होलाष्टक के नाम से जाना जाता है। होलाष्टक फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से शुरू होकर फाल्गुन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को होलिका दहन के बाद होलाष्टक  समाप्त हो जाता है।
                 पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार फाल्गुन शुक्ल पक्ष में इस बार एकादशी तिथि दो होने के कारण इस वर्ष होलाष्टक आठ दिन का नहीं होकर नौ दिनों तक चलने वाला है। इस बार फाल्गुन शुक्ल अष्टमी तिथि 27 फरवरी 2023 को प्रात: 12.59 मिनट से शुरू हो रही है और वहीं 7 मार्च 2023 को फाल्गुन की पूर्णिमा पर इसकी समाप्ति है। 
                पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार होलाष्टक के दौरान किसी भी तरह के मांगलिक और शुभ कार्य को करना वर्जित माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार होलाष्टक की अवधि में ग्रहों का स्वभाव उग्र हो जाता है जिस कारण से इनके दुष्प्रभाव का खतरा बढ़ जाता है। पौराणिक कथा  के अनुसार भगवान शिव की तपस्या भंग करने के परिणाम स्वरूप भोलेनाथ ने कामदेव को फाल्गुन शुक्लपक्ष की अष्टमी तिथि को भस्म कर दिया था। इसी कारण से यह दिन शुभ नहीं माने जाते हैं।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार होलाष्टक के दौरान निम्नलिखित कार्यो को नहीं करना चाहिए - 
✷ होलाष्टक में शादी-विवाह और सगाई जैसे मांगलिक कार्यों के अलावा मुंडन और नामकरण जैसे संस्कार नहीं करने चाहिए।
✷ होलाष्टक में भवन निर्माण, वाहन, प्लॉट या किसी प्रॉपर्टी को खरीदना या बेचना वर्जित है।
✷ होलाष्टक में शुभ कार्यों की शुरुआत बिल्कुल न करना चाहिए जैसे- अगर आप किसी नई दुकान का शुभारंभ करने वाले हैं तो होलाष्टक से पहले या बाद में करना चाहिए।
✷ होलाष्टक में सोने या चांदी के आभूषण खरीदने से बचना चाहिए। होलाष्टक से पहले या बाद में इन्हें (सोने या चांदी के आभूषण) खरीद सकते हैं।
✷ होलाष्टक के दौरान किसी मकान या प्लॉट की रजिस्ट्री भी नहीं करना चाहिए। इस तरह के कार्य भी इस दौरान (होलाष्टक) वर्जित रहते हैं। मकान बनवाने का काम अगर आप होलाष्टक से पहले से करते आ रहे हैं तो इसे जारी रहने देंना चाहिए। लेकिन इसकी शुरुआत होलाष्टक से नहीं करनी चाहिए।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार होलाष्टक के दौरान निम्नलिखित उपाय करने चाहिए -
❁होलाष्टक के दौरान मनुष्य को ज्यादा से ज्यादा ईश्वर की भक्ति और वैदिक अनुष्ठान करने चाहिए। ताकि उसे अपने सभी कष्टों से मुक्ति मिल सके। 
❁होलाष्टक के दौरान यदि कोई व्यक्ति किसी ऐसे रोग से पीड़ित है जिसका उपचार करवाने के बाद भी उसे लाभ नहीं मिल पा रहा है तो ऐसे रोगी व्यक्ति को भगवान शिव का पूजन करना चाहिए और इसके अलावा ब्राह्मण द्वारा महामृत्युंजय मंत्र के अनुष्ठान के साथ घर में गुगल से हवन करना चाहिए। 
❁लक्ष्मी प्राप्ति व ऋण मुक्ति हेतु होलाष्टक के दौरान श्रीसूक्त व मंगल ऋण मोचन स्त्रोत का पाठ करते हुए कमल गट्टे,साबूदाने की खीर से हवन करने चाहिए। 
❁अपार धन-संपदा के लिए होलाष्टक के दौरान गुड़,कनेर के पुष्प, हल्दी की गांठ व पीली सरसों से हवन करना चाहिए। 
❁सौभाग्य की प्राप्ति के लिए होलाष्टक के दौरान चावल,घी, केसर से हवन करना चाहिए। 
❁कन्या के विवाह के लिए होलाष्टक के दौरान कात्यायनी के मंत्रों का जाप करना चाहिए।
❁होलाष्टक के दौरान अगर बच्चों का पढाई में मन नहीं लग रहा है तो गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ करना चाहिए और गणेश जी को मोदक का भोग लगाए व दूर्वा से हवन करना चाहिए। 
लेखक - Pandit Anjani Kumar Dadhich
पंडित अंजनी कुमार दाधीच
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Sunday, 12 February 2023

महाशिवरात्रि

महाशिवरात्रि
प्रिय पाठकों, 
12 फरवरी 2023, रविवार 
मैं पंडित अंजनी कुमार दाधीच आज महाशिवरात्रि के बारे में जानकारी यहाँ दे रहा हूँ।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार भारत में सनातन धर्म में मनाए जाने वाले प्रमुख त्योहारों में से महाशिवरात्रि एक है। भारत में ज्यादातर लोग भगवान शिव की पूजा-अर्चना करने के लिए जाना जाता हैं। हिन्दू धार्मिक पंचांग के मुताबिक महाशिवरात्रि का त्योंहार हर साल फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार इस बार महाशिवरात्रि का त्योहार शनिवार 18 फरवरी 2023 को मनाया जाएगा।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार वैदिक मान्यता हैं कि इस दिन (महाशिवरात्रि के दिन) भगवान शिव और देवी पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था।  पौराणिक कथाओं में ऐसा भी कहा जाता है कि इस दिन भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों का धरती पर प्रकाट्य हुआ था साथ ही यह मान्‍यता है कि महाशिवरात्रि के दिन भगवान महादेव पृथ्‍वी पर मौजूद प्रत्‍येक शिवलिंग में मौजूद होते हैं। इसी कारण महाशिवरात्रि ‍के दिन शिवलिंग का अभिषेक करना बहुत शुभ माना जाता है। महाशिवरात्रि के दिन शिवजी की पूजा-आराधना करना सारे कष्‍ट दूर कर देता है और अपार सुख-समृद्धि देता है।भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा पाने के लिए महाशिवरात्रि साल का सबसे उत्तम दिन होता है। 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार भारतीय शास्त्रों में महाशिवरात्रि की पूजा निशिता काल में करने का विधान है। इस साल 2023 में कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि 18 फरवरी को रात 8 बजकर 2 मिनट से शुरू होकर अगले दिन 19 फरवरी को 4 बजकर 18 मिनट पर समाप्त होगी। साधक रात्रि के समय में महादेव और माता पार्वती की भक्ति भाव से पूजा कर सकते हैं। इसके अलावा, दिन के समय में भी पूजा उपासना कर सकते हैं। वहीं महाशिवरात्रि का व्रत उपवास 18 फरवरी को भी कर सकते हैं।
इस दिन (महाशिवरात्रि के दिन) ब्रह्म मुहूर्त में उठकर भगवान शिव जी का स्मरण कर दिन की शुरुआत करें और इसके पश्चात नित्य कर्मों से निवृत होकर गंगाजल युक्त पानी से स्नान करें और अब आमचन कर अपने आप को शुद्ध करें। इसके बाद सफेद कपड़े धारण कर सबसे पहले भगवान सूर्य को जल का अर्घ्य देंवे। इसके बाद भगवान शिव जी एवं माता पार्वती की पूजा फल, फूल, धूप, दीप, अक्षत, भांग, धतूरा, दूध,दही और पंचामृत से अभिषेक करें। अभिषेक पूजा के दौरान ओम् नमः शिवाय मंत्र और शिव चालीसा का जाप करने के बाद अंत में आरती अर्चना कर भगवान शिव और माता पार्वती से कामना करें। दिनभर उपवास रखें। निशिता काल में पूजा आरती के पश्चात फलाहार करें। अगले दिन पूजा-पाठ संपन्न कर व्रत खोलें।
लेखक - Pandit Anjani Kumar Dadhich
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Wednesday, 31 August 2022

गणेश चतुर्थी के विशेष उपाय

गणेश चतुर्थी के विशेष उपाय 
प्रिय पाठकों, 
31अगस्त 2022, बुधवार
मैं पंडित अंजनी कुमार दाधीच आज गणेश चतुर्थी के उपाय के बारे में जानकारी यहाँ दे रहा हूँ।पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार ज्ञान, बुद्धि और सौभाग्य के प्रतीक भगवान गणेश का जन्मोत्सव भाद्रपद मास की चतुर्थी को मनाया जाता है जो कि इस बार 31 अगस्त 2022 बुधवार को है अतः इस दिन गणेश चतुर्थी मनाई जाएगी। 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार गणेश चतुर्थी पर निम्नलिखित उपायों को करने से भगवान श्रीगणेश जी व्यक्ति की सारे कष्टों का निवारण कर मनोवांछित फल प्रदान करते हैं-
✷ भगवान श्रीगणेश का अभिषेक करने का विधान बताया गया है। गणेश चतुर्थी पर भगवान श्रीगणेश का अभिषेक करने से विशेष लाभ होता है। इस दिन आप शुद्ध पानी से श्रीगणेश का अभिषेक करें। साथ में गणपति अथर्व शीर्ष का पाठ भी करें। बाद में मावे के लड्डुओं का भोग लगाकर भक्तों में बांट दें।
✷ गणेश चतुर्थी के दिन किसी कुम्हार के चाक से थोड़ी से मिट्टी लेकर आए और अंगूठे बराबर भगवान गणेश की मूर्ति बना लेवें। इसके बाद चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर षोडशोपचार विधि से पूजा-अर्चना करते हुए 'ओम् ह्रीं ग्रीं ह्रीं' मंत्र का 108 बार जप करना चाहिए। यह लगातार अनंत चतुर्दशी यानी 10 दिन तक करते रहने से सभी विघ्न दूर होते हैं और जीवन में उन्नति एवं सौभाग्य की प्राप्ति होती है। 
✷ धन की तंगी से मुक्ति और धनवान बनने के लिए गणेश चतुर्थी के दिन गणेश जी के साथ सुपारी की पूजा करें और फिर इस सुपारी को कपड़े में बांधकर तिजोरी या धन स्थान में रख देने से कभी भी धन की कमी नहीं होगी।
✷ यदि कोई कार्य बार-बार प्रयास करने के बाद भी पूर्ण नहीं हो रहा है तो आज गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणेश को एक माला में 4 नारियल चढ़ाकर भगवान गणेश जी से अपने कार्य पूर्ण करने की प्रार्थना करने से समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
✷ मनोकामना पूर्ति के लिए गणेश चतुर्थी के दिन हाथी को चारा खिलाएं और फिर गणेश जी से मनोकामना पूर्ण करने की प्रार्थना करें।
✷ संतान प्राप्ति में अगर परेशानी आ रही है तो गणेश चतुर्थी के दिन गणपति के बाल रूप की स्थापना करके उनकी पूजा करते हुए संतान गणपति स्त्रोत का पाठ और “ओम गं गणपतये: नमः” मंत्र का जाप 108 बार करने से आपको  संतान की प्राप्ति होगी।
✷ आर्थिक समस्याओं से परेशान हैं तो गणेश चतुर्थी के दिन 22 दूर्वा को एक साथ जोड़कर 11 जोड़े की गांठो को तैयार कर लेवे(ध्यान रहे कि एक गांठ दो दूर्वा से बनती है।) इसके बाद 11 गांठों को भगवान गणेशजी के मस्तिष्क से छूआकर उनको भगवान गणेश जी के चरणों में अर्पित कर देने के बाद गंध, फूल, दीप, धूप आदि वस्तुएं अर्पित कर भगवान गणेश जी का पुजन करें। यह प्रक्रिया को आप अनंत चतुर्दशी तक करते रहने से भगवान गणेश की कृपा प्राप्त होती है और धन संबंधित समस्याओं से मुक्ति मिलती है।
✷ नौकरी व व्यवसाय में उन्नति के लिए गणेश चतुर्थी के दिन घर में पीले रंग की गणेशजी की प्रतिमा स्थापित कर गणेश जी के चरणों में हल्दी की पांच गांठ चढ़ाएं और फिर भगवान गणेश जी का पंचोपचार विधि से पुजन करें और इसके बाद 108 दूर्वा को गीली हल्दी लगाकर हर दूर्वा को चढ़ाते समय 'श्री गजवक्त्रं नमो नम:' मंत्र का मन ही मन जप करते रहें। यह गणेशजी के पुजन की क्रिया अनंत चतुर्दशी तिथि तक प्रतिदिन करते रहें। ऐसा करने से उन्नति के द्वार खुलते हैं और रास्ते में आ रही अड़चन दूर होती है। 
✷ अगर किसी भी लड़की के विवाह में अड़चन आ रही है तो गणेश चतुर्थी पर उस लड़की को गणेश जी की पुजन कर विवाह की कामना करते हुए भगवान गणेश को मालपुए का भोग लगाएं और पूरा परिवार एक साथ प्रार्थना करें और अगर लड़के के विवाह में अड़चन आ रही है तो गणेश चतुर्थी पर उस लड़के को गणेश जी की पुजन कर विवाह की कामना करते हुए भगवान गणेश को पीले रंग की मिठाई का भोग लगाएं। ऐसा करने से गणेशजी की कृपा से शीघ्र विवाह के योग बनते हैं और अड़चन दूर होती हैं।
✷ धन संबंधित समस्या से मुक्ति के लिए गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणेश का पूजनकर भगवान गणेश जी को घी और गुड़ का भोग लगाकर के गणपति अर्थवशीर्ष का पाठ करें। गणपति पूजन करने के बाद घी और गुड़ या हरी घास गाय को खिलाएं ऐसा करने से कर्ज की समस्या खत्म होती है और धन के मार्ग प्रशस्त होते हैं। 
लेखक - Pandit Anjani Kumar Dadhich
पंडित अंजनी कुमार दाधीच
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Sunday, 14 August 2022

माणक धारण करने से पहले की सावधानीयां

सावधानियां रखें सूर्य रत्न माणिक्य (माणक) धारण करने से पहले
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार भारतीय वैदिक ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक माणिक्य रत्न सूर्य का प्रतिनिधित्व करने वाला एक बहुमुल्य रत्न है। अनार के दाने-सा दिखने वाला गुलाबी आभा वाला बहुमूल्य रत्न माणिक्य है। 
माणिक्य उच्च कोटि का मान-सम्मान एवम पद की प्राप्ति करवाता है। इसीलिए सत्ता और राजनीती से जुड़े लोगो को माणिक्य रत्न को अवश्य धारण करना चाहिए क्योकि यह रत्न सत्ताधारियों को एक ऊंचे पद तक पहुंचने में बहुत सहायता कर सकता है। इसे (माणिक्य) को सभी रत्‍नों में सबसे श्रेष्‍ठ माना जाता है। 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार लाल रक्तकमल जैसे सिंदूरी, हल्के नीले आदि रंगों में पाया जाता है पर लाल रंग का माणिक्य सबसे बेहतरीन और मूल्‍यवान होता है। संसार के विभिन्‍न जगहों में पाए जाने के कारण और जलवायु परिवर्तन का असर इसके रंगों में भी दिखता है। यह कई अलग-अलग जगहों में लाल रंग से गुलाबी रंगो में निकलता है। आम बोलचाल की भाषा में माणिक्य को माणक भी कहा जाता है और संस्कृत भाषा में इसे लोहित, पद्यराग, शोणरत्न , रविरत्न, शोणोपल, वसुरत्न, कुरुविंद आदि नामों से तथा पंजाबी में चुन्नी, उर्दू- फारसी में याकत नाम से जाना जाता है और माणिक्य को अंग्रेजी में रूबी कहते हैं। इन्हीं सब विशेषताओं के चलते इसे सूर्यरत्न भी कहा जाता है। जो किसी भी व्यक्ति की कुंडली में सूर्य अशुभ प्रभाव में होता है तो उसे माणिक्य रत्न धारण करना चाहिए ताकि इसे धारण करने से सूर्य की पीड़ा को शांत किया जा सके और माणिक्य सूर्य के प्रभाव को शुद्ध करता है एवं जातक धन आदि की अच्‍छी प्राप्‍ति कर पाता है। माणिक्य रत्न किसी भी व्यक्ति को मान-सम्मान,पद की प्राप्ति करवाने में सहायक सिद्ध होता है और माणिक (माणिक्य) से राजकीय और प्रशासनिक कार्यों में सफलता मिलती है। अगर माणिक पहनना लाभदायक होता है तो जातक के चेहरे पर चमक आ जाती है। इसे कुंडली के अनुसार ही धारण करने का विधान है। 
शुद्धता की पहचान - पंडित अंजनी कुमार के अनुसार यदि माणिक्य की शुद्धता की जांच पड़ताल करनी हो तो माणिक्य को गाय के दूध में डाल देंने पर दूध गुलाबी रंग का दिखाई देने लगे तो वो माणिक्य शुद्ध व असली है इसके अलावा शुद्ध माणिक्य को किसी काँच के पात्र में रखने से ऐसा लगेगा कि जैसे उस पात्र में रक्तिम(लाल) किरणें फूट रही हैं।माणिक रक्तवर्धक, वायुनाशक और पेट रोगों में लाभकारी सिद्ध होता है। यह मानसिक रोग एवं नेत्र रोग में भी फायदा करता है। माणिक धारण करने से नपुंसकता नष्ट होती है।
पंडित अंजनी कुमार के अनुसार माणिक्य पहनने से पहले यह अवश्य जान लेना चाहिए कि कि दोषयुक्त माणिक्य धारण करने से वह लाभ की बजाय हानि ज्यादा करता है। इसके अलावा माणिक्य धारण से सिरदर्द, अपयश, आर्थिक नुकसान और पारिवारिक समस्याएं आदि भी पहुंचा सकता है। इसलिए इसे पहनने से पहले निम्नलिखित सावधानियां बरतनी चाहिए -
रत्न ज्योतिष के अनुसार जिस माणिक्य में आड़ी तिरछी रेखाएं या जाल जैसा दिखाई दे तो वह माणिक्य गृहस्थ जीवन को नष्ट करने वाला होता है।
जिस माणिक्य में दो से अधिक रंग दिखाई दें तो जान लीजिए कि वो माणिक्य आपकी लाइफ काफी परेशानियां ला सकता है।
कहा जाता है जिस माणक में चमक नहीं होती ऐसा माणिक्य विपरीत फल देने वाला होता है। तो कभी भी बिना चमक वाला माणिक्य न पहने।
माणिक्य खरीदने से पहले देख लें कि कहीं वो माणिक्य धुएं के रंग का न हो क्योंकि धुएं के रंग के जैसा दिखने वाला माणिक्य और मटमैला माणिक्य अशुभ होने के साथ हानिकारक माना जाता है। 
माणिक्य को नीलम, हीरा और गोमेद के साथ पहनना नुकसानदायक हो सकता है। माणिक्य को मोती, पन्ना, मूंगा और पुखराज के साथ पहन सकते हैं। 
शनि की राशियों या लग्न में माणिक्य पहनने से पूर्व ज्योतिष की सलाह जरूर लें।
माणिक्य को लोहे की अंगुठी में जड़वाकर पहनना नुकसानदायक है।
माणिक्य का प्रभाव अंगूठी में जड़ाने के समय से 4 वर्षों तक रहता है। इसके बाद दूसरा माणिक्य जड़वाना चाहिए।
किसी ज्‍योतिषाचार्य की सलाह से और जन्मकुंडली में सूर्य की स्‍थ‍िति को देखकर ही इसको धारण करना चाहिए। 

Thursday, 11 August 2022

पंचांग की काल गणना

पंचांग की काल गणना

प्रिय पाठकों, 

11 अगस्त 2022, गुरुवार 

मैं पंडित अंजनी कुमार दाधीच आज पंचांग के सरल ज्ञान के तहत पंचांग की काल गणना के बारे में जानकारी यहाँ दे रहा हूँ।

पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार पंचांग के पांच अंगों के द्वारा ही समय की काल गणना सम्भव हो पाई है और इसी काल गणना का उपयोग कर जन्म कुंडली, विवाह मुहूर्त, अनुष्ठान, शुभ- अशुभ स्थिति, ग्रहों का विचरण और अन्य गणनाएं की जाती है। हिन्दू पंचांग की समय गणना (काल गणना) में समय की अलग अलग प्रकार के माप हैं जो हिन्दू पंचांग में समय के गणनाचक्र को सूर्य सिद्धांत नामक ग्रंथ के पहले अध्याय के 11वें श्लोक से 23वें श्लोक तक में बतलाया गया हैं। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार इन सभी श्लोको का भावार्थ वर्णन निम्नलिखित है- 

☞ जो कि श्वास (प्राण) से आरम्भ होता है वह यथार्थ कहलाता है और वह जो त्रुटि से आरम्भ होता है। अवास्तविक कहलाता है। छः श्वास से एक विनाड़ी बनती है। साठ श्वासों से एक नाड़ी बनती है।

☞ साठ नाड़ियों से एक दिवस (दिन और रात्रि) बनते हैं। तीस दिवसों से एक मास (महीना) बनता है। एक नागरिक (सावन) मास सूर्योदयों की संख्याओं के बराबर होता है। जबकि एक चंद्र मास उतनी चंद्र तिथियों से बनता है। 

☞ एक सौर मास सूर्य के राशि में प्रवेश से निश्चित होता है। बारह मास एक वर्ष बनाते हैं। मानव के एक वर्ष को देवताओं का एक दिवस कहते हैं। देवताओं और दैत्यों के दिन और रात्रि पारस्परिक उलटे होते हैं। 

☞ उनके छः गुणा साठ देवताओं के दिव्य वर्ष होते हैं। ऐसे ही दैत्यों के भी होते हैं। बारह सहस्र (हजार) दिव्य वर्षों को एक चतुर्युग कहते हैं। यह तैंतालीस लाख बीस हजार सौर वर्षों का होता है।  

☞ भारतीय मनीषियों ने पूरे ब्रह्मांड की आयु की भी गणना की। उन्होंने सौर वर्ष के बाद दिव्य वर्ष से लेकर परार्ध तक की गणना की है। उसका चार्ट निम्नानुसार है-

लि युग = 4,32,000 वर्ष

 द्वापर युग = 8,64,000 वर्ष (2 कलि)

 त्रेता युग = 12,96,000 वर्ष (3 कलि)

 कृत युग 17,28,000 वर्ष (4 कलि)

कृत् या सत् युग में धर्म के चार पाद होते हैं, त्रेता में तीन, द्वापर में दो और कलि में केवल एक।

☞ चतुर्युगी की उषा और संध्या काल होते हैं।कॄतयुग या सतयुग और अन्य युगों का अन्तर को चरणों में मापा जाता है। 

☞ एक चतुर्युगी का दशांश को क्रमशः चार, तीन, दो और एक से गुणा करने पर कॄतयुग (सतयुग) और अन्य युगों की अवधि मिलती है। इन सभी का छठा भाग इनकी उषा और संध्या होता है।

☞ इकहत्तर चतुर्युगी का एक मन्वन्तर या एक मनु की आयु होती हैं। इसके अन्त पर संध्या होती है जिसकी अवधि एक सतयुग के बराबर होती है और यह प्रलय होती है। 

☞ एक कल्प में चौदह मन्वन्तर होते हैं और अपनी संध्याओं के साथ प्रत्येक कल्प के आरम्भ में पंद्रहवीं संध्या या उषा होती है। यह भी सतयुग के बराबर ही होती है। 

☞ एक कल्प में एक हजार चतुर्युगी होते हैं और फिर एक प्रलय होती है। यह ब्रह्मा का एक दिन होता है। इसके बाद इतनी ही लम्बी रात्रि भी होती है।

☞ इस दिन और रात्रि के आकलन से उनकी आयु एक सौ वर्ष होती है उनकी आधी आयु निकल चुकी है और शेष में से यह प्रथम कल्प है।

☞ इस कल्प में, छः मनु कंपनी संध्याओं समेत निकल चुके, अब सातवें मनु (वैवस्वत: विवस्वान (सूर्य) के पुत्र) की सत्ताईसवीं चतुर्युगी बीत चुकी है।

☞ वर्तमान समय के अनुसार‌ अट्ठाईसवीं चतुर्युगी का द्वापर युग बीत चुका है तथा भगवान कृष्ण के अवतार समाप्ति से 5123 वाँ वर्ष (ईस्वी सन् 2021 में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से) प्रगतिशील है। जबकि कलियुग की कुल अवधि 4,32,000 वर्ष है।  

पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार एक हिन्दु पंचांग की कालगणना में एक दिवस सूर्य उदय से अगले सूर्य उदय पर समाप्त होता है अर्थात एक सूर्यादय से दूसरे सूर्योदय तक के समय को दिवसके नाम से पुकारा जाता है और एक दिवस में एक दिन और एक रात होते हैं। दिवस से आरम्भ करके समय को साठ-साठ के भागों में विभाजित करके उनके नाम रखे गए हैं। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार भारतीय पंचांग में समय की गणना को बड़ी से बड़ी और छोटे से छोटे इकाईयों में विभक्त कर किसी भी समय का शुभ मुहूर्त या योग निकाला जा सकता है जो निम्नलिखित है-

✷ 1 पलक झपकना = 1 निमेष

✷ 3 निमेष = 1 क्षण

✷ 5 क्षण = 1 काष्ठ

15 काष्ठा =1 लधु

✷ 15 लधु = 1 घटी = 24 मिनट ( घटि को देशज भाषा में घड़ी भी कहा जाता है।]

✷ 1पल = 60 विपल (60 विपल 24 सेकेण्ड के बराबर है। 1 विपल = 0.4 सेकेण्ड)

✷ 1 विपल = 60 प्रतिविपल 

✷ इसके अतिरिक्त 1 पल = 6 प्राण ( 1 प्राण = 4 सेकेण्ड )

✷ डेढ़ घटी = 1 घंटा

✷ 60 घटी = 24 घण्टे [एक दिवस = 60 घटि अर्थात 60 घटि 24 घंटे के बराबर होती है। 

✷ 2 घटी = 1मुहूर्त

✷ 30 मुहूर्त = 1 दिन-रात यानि अहोरात

✷ 1 याम = 1प्रहर (एक दिन का चौथा हिस्सा)

✷  8 प्रहर = 1 दिन -रात

✷ 7 दिन -रात = 1 सप्ताह

✷ 4 सप्ताह = 1 महीना

12 मास = 1 वर्ष (365 -366 दिनो)

पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार हिन्दुओं के धर्मशास्त्रों के अनुसार घण्टो- मिनटों को पलों में परिवर्तन करना और उनको नियम अनुसार देखना चाहिए।

✿ 1 मिनट – 2 -1/2 पल
✿ 4 मिनट – 10 पल
✿ 12 मिनट- 30 पळ
✿ 24 मिनट – 1 घटी
✿ 60 मिनट – 60 घटी यानि 1 घण्टा

भारतीय ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक समय को निम्नलिखित रुप से विभक्त किया जा सकता है - 

☆ 60 विकला = 1 कला

☆ 60 कला = 1 अंश

☆ 30 अंश = 1 राशि

☆ 12 राशि = मगण

☆ सूर्योदय से सूर्यास्त तक = एक दिन या दिनमान

☆ सूर्यास्त अगले दिन सूर्योदय = रात्रिमान

☆ उषाकाल = सूर्याद्य से 8 घटी पहले

☆ प्रात:काल = सूर्यादय से 3 घटी तक

☆ संध्याकाल =सूर्यास्त से 3 घटी तक।

पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार इस प्रकार एक दिवस में 360 पल होते हैं। एक दिवस में जब पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है तो उसके कारण सूर्य विपरीत दिशा में घूमता प्रतीत होता है। 360 पलों में सूर्य एक चक्कर पूरा करता है , इस प्रकार 360 पलों में 360 अंश। 1 पल में सूर्य का जितना कोण बदलता है उसे 1 अंश कहते है। 

पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार ब्रह्मांड में भिन्न-भिन्न लोकों में काल की गति भी भिन्न-भिन्न होती है। एक काल की सबसे छोटी ईकाई भारतीय शास्त्रों में परमाणु की मानी गई है। दो परमाणु के बराबर एक अणु होता है और तीन अणु काल के बराबर एक त्रसरेणु काल होता है। एक त्रसरेणु काल के माप के बारें में बताते हुए भारतीय शास्त्रकारों ने लिखा है कि किसी द्वार की झिरी में से आ रहे सूर्य के प्रकाश में जो कण उड़ते हुए दिखते हैं, उसे ही त्रसरेणु कहते हैं। प्रकाश को इसे पार करने में जितना समय लगता है, उसे ही एक त्रसरेणु काल कहते हैं। तीन त्रसरेणु काल को एक त्रुटि कहा गया है। त्रुटि से काल की गणना को बढ़ाते हुए परार्ध तक ले जाया गया है।

विष्णुधर्मोत्तर पुराण ( प्रथम खण्ड,73। 4-1, हेमाद्रि कृत चतुर्वर्ग चिन्तामणि, काल खंड)

1 लघु अक्षर उच्चारण 1 निमेष 

2 निमेष 1 त्रुटि 

10 त्रुटि 1 प्राण 

6 प्राण 1 विनाडिका 

60 विनाडिका 1 नाडिका 

60 नाडिका 1 मुहूर्त 

30 मुहूर्त 1 अहोरात्र

पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार भारतीय ज्योतिषियों ने निम्नलिखित मंत्रों के आधार पर ही गणनाएं कीं और उन्हीं गणनाओं को आज का कथित वैज्ञानिक जगत में भी स्वीकार किया जाता है। 

☆ दादशारं नहि तज्जराय वर्वर्ति चक्रं परि द्यामृतस्य।आ पुत्रा अग्ने मिथुनासो अत्र सप्त शतानी विंशतिश्च तस्थुः॥ (ऋग्वेद 1/164/11)

☆ द्वादश प्रधयश्चक्रमेकं त्रीणि नभ्यानि क उ तच्चिकेत।तस्मिन्त्साकं त्रिंशता न शङ्कवोऽर्पिताः षष्टिर्न चलाचलास: ॥ (ऋग्वेद 1/164/48)

इन दो मंत्रों में यह स्पष्ट किया गया है कि संवत्सर में बारह अरे या प्रविधियाँ हैं। 360 शंकु यानी दिन अथवा 729 जोड़े यानी रात-दिन हैं। यहाँ इसे एक चक्र के रूप में निरूपित किया गया है, जोकि पृथ्वी की सूर्य के चारों ओर की चक्राकार गति तथा काल की चक्रीय होने दोनों का ही प्रतीक है। इससे स्पष्ट है कि संवत्सर यानी एक वर्ष में 360 दिन और बारह मास होने की संकल्पना भारत में एकदम प्रारंभ से ही है। परंतु इस सामान्य आधार को आगे बढ़ाते हुए भारतीय ज्योतिषाचार्यों ने पृथ्वी की अयन गति को जाना और इसके बाद उन्होंने वर्ष का वास्तविक परिगणन भी किया। मासों की गणना या निर्माण पृथ्वी की अपनी कक्षा से नहीं की गई, इसका निर्धारण चंद्रमा के पृथिवी के चारों ओर की कक्षा से किया गया। इसलिए इसे चांद्रमास भी कहते हैं। चंद्रमा का एक मास 30 चंद्र तिथियों का होता है परंतु वह सौर मास से लगभग आधा दिन छोटा होता है। दोनों मासों में सामंजस्य बैठाने के लिए भारतीय ज्योतिषाचार्यों ने मलमास या अधिमास का विधान किया। वास्तव में चंद्रमा से मासों का निर्धारण केवल गणना का एक प्रकार मात्र नहीं है बल्कि इसका वैज्ञानिक आधार भी है। यह आज हमें ठीक से ज्ञात हो चुका है कि चंद्रमा ही पृथ्वी पर वातावरण संबंधी अनेक बदलावों को लाने का कारण है। वेदों में इस सृष्टि को अग्निसोमात्मकं यानी कि अग्नि तथा सोम से निर्मित और संचालित होना कहा गया है। सूर्य अग्नि है और चंद्रमा सोम है। कृषि में हम इसका प्रत्यक्ष प्रमाण देख सकते हैं। चंद्रमा के कारण पौधों की बालियों में रस भरता है और सूर्य के कारण फसले पकती हैं। मानव की पूरी सभ्यता आदि काल से कृषि आधारित रही है और चांद्र मास की गणना कृषिकार्य में सहायक है। यही कारण है कि सौर मासों की गणना करने के बाद भी भारतीय आचार्यों ने चांद्रमासों की भी गणना की।पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार विक्रम संवत् विश्व का सर्वश्रेष्ठ सौर-चांद्र के सामंजस्य वाला संवत् है। आज उस गणना को भुलाने के कारण कृषि में जो बाधाएं आ रही है वो बाधाएं किसी से छिपी नहीं हैं। भले ही उनका सही कारण नही समझने के कारण उसके निदान कुछ और किए जा रहे हैं जो और भी नवीन समस्याओं को जन्म दे रहे हैं। कुल मिलाकर कृषि कार्य भी कालगणना से जुड़ा हुआ मामला है।पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार प्राचीन काल के भारतीय ज्योतिषाचार्यों ने मासों का नाम पश्चिम सभ्यता का प्रचलित ईस्वी संवत की तरह मनमाने ढंग से नहीं रखा हालाँकि वेदों तथा उनके ब्राह्मणों में 12 मासों के नाम भिन्न दिए गए थे परंतु बाद में इन मासों का नाम उनके नक्षत्रों के आधार पर रखा गया जिनसे इनका प्रारंभ होता है। चित्रा नक्षत्र में प्रारंभ होने वाले मास का नाम चैत्र, विशाखा नक्षत्र में प्रारंभ होने वाले मास का नाम वैशाख। इस क्रम में सभी मासों के नाम निर्धारित किए गए। चंद्रमा और सूर्य की चाल से एक मास में तिथियों को निर्धारित किया गया और जो मनमाने ढंग से निर्धारित नहीं किया जाता है और आज भी तिथियों को निर्धारण किया जाता है। इस क्रम को आगे बढ़ाते हुए प्राचीन काल के भारतीय ज्योतिषाचार्यों ने प्रत्येक अहोरात्र को 24 होराओं में बांटा और हरेक का नामकरण भी किया। दिन के पहले होरा के नाम पर उस दिन का नाम किया गया। इस प्रकार सात दिनों के नाम रखे गए और इन्हीं नामों के आधार पर यूरोप में प्रचलित संवत में भी सातों दिनों के नाम रखे गए।

लेखक - Pandit Anjani Kumar Dadhich
पंडित अंजनी कुमार दाधीच
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