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Wednesday, 23 July 2025

ज्योतिष और इसके भेद

ज्योतिष और ज्योतिष के भेद 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार "ज्योतिषां सूर्यादिग्रहाणां बोधकं शास्त्रम् " अर्थात सूर्यादि ग्रह और काल का बोध कराने वाले शास्त्र को ज्योतिष शास्त्र कहा जाता है। इसमें मुख्य रूप से ग्रह, नक्षत्र आदि के स्वरूप, संचार, परिभ्रमण काल, ग्रहण और स्थिति संबधित घटनाओं का निरूपण एवं शुभाशुभ फलों का कथन किया जाता है। नभमंडल में स्थित ग्रह नक्षत्रों की गणना एवं निरूपण मनुष्य जीवन के लिए महत्वपूर्ण होते हैं और यह व्यक्तित्व की परीक्षा की भी एक कारगर तकनीक है और इसके द्वारा किसी व्यक्ति के भविष्य में घटने वाली घटनाओं का पता किया जा सकता है साथ ही यह भी मालूम हो जाता है कि व्यक्ति के जीवन में कौन-कौन से घातक अवरोध उसकी राह रोकने वाले हैं अथवा प्रारब्ध के किस दुर्योग को उसे किस समय सहने के लिए विवश होना पड़ेगा और ऐसे समय में ज्योतिष शास्त्र ही एकमात्र ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा जातक को सही दिशा प्राप्त होती है। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार ज्योतिष एक प्राचीन विज्ञान है जो समय, ग्रहों, और नक्षत्रों के संबंधों को अध्ययन करता है और माना जाता है कि इनके बीच के संबंधों का मानव जीवन पर प्रभाव होता है। यह एक पूर्वाग्रही विज्ञान है जिसमें विभिन्न ग्रहों, राशियों, और नक्षत्रों के स्थिति और गतिविधियों का अध्ययन किया जाता है ताकि भविष्य में किसी व्यक्ति के जीवन में घटित होने वाली घटनाओं की पूर्वानुमान किया जा सके।
 पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार भारतीय ज्योतिष शास्त्र में अलग-अलग तरीके से भाग्य या भविष्य बताया जाता है। माना जाता है कि भारत में लगभग 150 से ज्यादा ज्योतिष विद्या प्रचलित हैं। प्रत्येक विद्या आपके भविष्य को बताने का दावा करती है। माना यह ‍भी जाता है कि प्रत्येक विद्या भविष्य बताने में सक्षम है, लेकिन उक्त विद्या के जानकार कम ही मिलते हैं, जबकि भटकाने वाले ज्यादा। मन में सवाल यह उठता है कि आखिर किस विद्या से जानें हम अपना भविष्य।  पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार ज्योतिष के विभिन्न प्रकार होते हैं, जिनमें समान्तर ज्योतिष, नाड़ी ज्योतिष, पाराशरी ज्योतिष, होरा ज्योतिष, वस्तु ज्योतिष, नक्षत्र ज्योतिष, और विवाह ज्योतिष शामिल हैं। इन प्रकारों के अनुसार, ज्योतिष का अध्ययन और प्रयोग भिन्न-भिन्न तरीकों में किया जाता है। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार समान्तर ज्योतिष में ग्रहों के अध्ययन पर जोर दिया जाता है, जबकि होरा ज्योतिष में कुंडली का अध्ययन किया जाता है। वस्तु ज्योतिष में भविष्य की पूर्वानुमान के लिए वस्तुओं का अध्ययन किया जाता है। नाड़ी ज्योतिष में व्यक्ति की कुंडली के माध्यम से भविष्य की पूर्वानुमान किया जाता है। मैं पंडित अंजनी कुमार दाधीच आज कुछ प्रचलित ज्योतिष विद्याओं की जानकारी दे रहा हूँ जो निम्नलिखित है-
1. कुंडली ज्योतिष :- यह कुंडली पर आधारित विद्या है। इसके तीन भाग है- सिद्धांत ज्योतिष, संहिता ज्योतिष और होरा शास्त्र। इस विद्या के अनुसार व्यक्ति के जन्म के समय में आकाश में जो ग्रह, तारा या नक्षत्र जहाँ था उस पर आधारित कुंडली बनाई जाती है। बारह राशियों पर आधारित नौ ग्रह और 27 नक्षत्रों का अध्ययन कर जातक का भविष्य बताया जाता है। उक्त विद्या को बहुत से भागों में विभक्त किया गया है, लेकिन आधुनिक दौर में मुख्यत: चार माने जाते हैं। ये चार निम्न हैं- नवजात ज्योतिष, कतार्चिक ज्योतिष, प्रतिघंटा या प्रश्न कुंडली और विश्व ज्योतिष विद्या।
2. लाल किताब की विद्या :- यह मूलत: उत्तरांचल, हिमाचल और कश्मीर क्षेत्र की विद्या है। इसे ज्योतिष के परंपरागत सिद्धांत से हटकर 'व्यावहारिक ज्ञान' माना जाता है। इसे बहुत ही कठिन विद्या माना जाता है। इसके अच्‍छे जानकार बगैर कुंडली को देखे उपाय बताकर समस्या का समाधान कर सकते हैं। उक्त विद्या के सिद्धांत को एकत्र कर सर्वप्रथम इस पर एक ‍पुस्तक प्रकाशित की थी जिसका नाम था 'लाल किताब के फरमान'। मान्यता अनुसार उक्त किताब को उर्दू में लिखा गया था इसलिए इसके बारे में भ्रम उत्पन्न हो गया।
3 अंक ज्योतिष :- इस भारतीय विद्या को अंक विद्या भी कहते हैं। इसके अंतर्गत प्रत्येक ग्रह, नक्षत्र, राशि आदि के अंक निर्धारित हैं। फिर जन्म तारीख, वर्ष आदि के जोड़ अनुसार भाग्यशाली अंक और भाग्य निकाला जाता है।
4 नंदी नाड़ी ज्योतिष :- यह मूल रूप से दक्षिण भारत में प्रचलित विद्या है जिसमें ताड़पत्र के द्वारा भविष्य जाना जाता है। इस विद्या के जन्मदाता भगवान शंकर के गण नंदी हैं इसी कारण इसे नंदी नाड़ी ज्योतिष विद्या कहा जाता है।
5 पंच पक्षी सिद्धान्त :- यह भी दक्षिण भारत में प्रचलित है। इस ज्योतिष सिद्धान्त के अंतर्गत समय को पाँच भागों में बाँटकर प्रत्येक भाग का नाम एक विशेष पक्षी पर रखा गया है। इस सिद्धांत के अनुसार जब कोई कार्य किया जाता है उस समय जिस पक्षी की स्थिति होती है उसी के अनुरूप उसका फल मिलता है। पंच पक्षी सिद्धान्त के अंतर्गत आने वाले पाँच पंक्षी के नाम हैं गिद्ध, उल्लू, कौआ, मुर्गा और मोर। आपके लग्न, नक्षत्र, जन्म स्थान के आधार पर आपका पक्षी ज्ञात कर आपका भविष्य बताया जाता है।
ज्योतिष और इसके भेद
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार “ज्योतिषां सूर्यादिग्रहाणां बोधकं शास्त्रम् ” अर्थात सूर्यादि ग्रह और काल का बोध कराने वाले शास्त्र को ज्योतिष शास्त्र कहा जाता है। इसमें मुख्य रूप से ग्रह, नक्षत्र आदि के स्वरूप, संचार, परिभ्रमण काल, ग्रहण और स्थिति संबधित घटनाओं का निरूपण एवं शुभाशुभ फलों का कथन किया जाता है। नभमंडल में स्थित ग्रह नक्षत्रों की गणना एवं निरूपण मनुष्य जीवन के लिए महत्वपूर्ण होते हैं और यह व्यक्तित्व की परीक्षा की भी एक कारगर तकनीक है और इसके द्वारा किसी व्यक्ति के भविष्य में घटने वाली घटनाओं का पता किया जा सकता है साथ ही यह भी मालूम हो जाता है कि व्यक्ति के जीवन में कौन-कौन से घातक अवरोध उसकी राह रोकने वाले हैं अथवा प्रारब्ध के किस दुर्योग को उसे किस समय सहने के लिए विवश होना पड़ेगा और ऐसे समय में ज्योतिष शास्त्र ही एकमात्र ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा जातक को सही दिशा प्राप्त होती है। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार ज्योतिष एक प्राचीन विज्ञान है जो समय, ग्रहों, और नक्षत्रों के संबंधों को अध्ययन करता है और माना जाता है कि इनके बीच के संबंधों का मानव जीवन पर प्रभाव होता है। यह एक पूर्वाग्रही विज्ञान है जिसमें विभिन्न ग्रहों, राशियों, और नक्षत्रों के स्थिति और गतिविधियों का अध्ययन किया जाता है ताकि भविष्य में किसी व्यक्ति के जीवन में घटित होने वाली घटनाओं की पूर्वानुमान किया जा सके।
ज्योतिष के विभिन्न प्रकार
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार भारतीय ज्योतिष शास्त्र में अलग-अलग तरीके से भाग्य या भविष्य बताया जाता है। माना जाता है कि भारत में लगभग 150 से ज्यादा ज्योतिष विद्या प्रचलित हैं। प्रत्येक विद्या आपके भविष्य को बताने का दावा करती है। माना यह ‍भी जाता है कि प्रत्येक विद्या भविष्य बताने में सक्षम है, लेकिन उक्त विद्या के जानकार कम ही मिलते हैं, जबकि भटकाने वाले ज्यादा। मन में सवाल यह उठता है कि आखिर किस विद्या से जानें हम अपना भविष्य।  पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार ज्योतिष के विभिन्न प्रकार होते हैं, जिनमें समान्तर ज्योतिष, नाड़ी ज्योतिष, पाराशरी ज्योतिष, होरा ज्योतिष, वस्तु ज्योतिष, नक्षत्र ज्योतिष, और विवाह ज्योतिष शामिल हैं। इन प्रकारों के अनुसार, ज्योतिष का अध्ययन और प्रयोग भिन्न-भिन्न तरीकों में किया जाता है। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार समान्तर ज्योतिष में ग्रहों के अध्ययन पर जोर दिया जाता है, जबकि होरा ज्योतिष में कुंडली का अध्ययन किया जाता है। वस्तु ज्योतिष में भविष्य की पूर्वानुमान के लिए वस्तुओं का अध्ययन किया जाता है। नाड़ी ज्योतिष में व्यक्ति की कुंडली के माध्यम से भविष्य की पूर्वानुमान किया जाता है। मैं पंडित अंजनी कुमार दाधीच आज कुछ प्रचलित ज्योतिष विद्याओं की जानकारी दे रहा हूँ जो निम्नलिखित है- 1. कुंडली ज्योतिष :- यह कुंडली पर आधारित विद्या है। इसके तीन भाग है- सिद्धांत ज्योतिष, संहिता ज्योतिष और होरा शास्त्र। इस विद्या के अनुसार व्यक्ति के जन्म के समय में आकाश में जो ग्रह, तारा या नक्षत्र जहाँ था उस पर आधारित कुंडली बनाई जाती है। बारह राशियों पर आधारित नौ ग्रह और 27 नक्षत्रों का अध्ययन कर जातक का भविष्य बताया जाता है। उक्त विद्या को बहुत से भागों में विभक्त किया गया है, लेकिन आधुनिक दौर में मुख्यत: चार माने जाते हैं। ये चार निम्न हैं- नवजात ज्योतिष, कतार्चिक ज्योतिष, प्रतिघंटा या प्रश्न कुंडली और विश्व ज्योतिष विद्या।
2. लाल किताब की विद्या :- यह मूलत: उत्तरांचल, हिमाचल और कश्मीर क्षेत्र की विद्या है। इसे ज्योतिष के परंपरागत सिद्धांत से हटकर ‘व्यावहारिक ज्ञान’ माना जाता है। इसे बहुत ही कठिन विद्या माना जाता है। इसके अच्‍छे जानकार बगैर कुंडली को देखे उपाय बताकर समस्या का समाधान कर सकते हैं। उक्त विद्या के सिद्धांत को एकत्र कर सर्वप्रथम इस पर एक ‍पुस्तक प्रकाशित की थी जिसका नाम था ‘लाल किताब के फरमान’। मान्यता अनुसार उक्त किताब को उर्दू में लिखा गया था इसलिए इसके बारे में भ्रम उत्पन्न हो गया।

अंक ज्योतिष :- इस भारतीय विद्या को अंक विद्या भी कहते हैं। इसके अंतर्गत प्रत्येक ग्रह, नक्षत्र, राशि आदि के अंक निर्धारित हैं। फिर जन्म तारीख, वर्ष आदि के जोड़ अनुसार भाग्यशाली अंक और भाग्य निकाला जाता है।
नंदी नाड़ी ज्योतिष :- यह मूल रूप से दक्षिण भारत में प्रचलित विद्या है जिसमें ताड़पत्र के द्वारा भविष्य जाना जाता है। इस विद्या के जन्मदाता भगवान शंकर के गण नंदी हैं इसी कारण इसे नंदी नाड़ी ज्योतिष विद्या कहा जाता है।
पंच पक्षी सिद्धान्त :- यह भी दक्षिण भारत में प्रचलित है। इस ज्योतिष सिद्धान्त के अंतर्गत समय को पाँच भागों में बाँटकर प्रत्येक भाग का नाम एक विशेष पक्षी पर रखा गया है। इस सिद्धांत के अनुसार जब कोई कार्य किया जाता है उस समय जिस पक्षी की स्थिति होती है उसी के अनुरूप उसका फल मिलता है। पंच पक्षी सिद्धान्त के अंतर्गत आने वाले पाँच पंक्षी के नाम हैं गिद्ध, उल्लू, कौआ, मुर्गा और मोर। आपके लग्न, नक्षत्र, जन्म स्थान के आधार पर आपका पक्षी ज्ञात कर आपका भविष्य बताया जाता है।
हस्तरेखा ज्योतिष :- हाथों की आड़ी-तिरछी और सीधी रेखाओं के अलावा, हाथों के चक्र, द्वीप, क्रास आदि का अध्ययन कर व्यक्ति का भूत और भविष्य बताया जाता है। यह बहुत ही प्राचीन विद्या है और भारत के सभी राज्यों में प्रचलित है।
नक्षत्र ज्योतिष :- वैदिक काल में नक्षत्रों पर आधारित ज्योतिष विज्ञान ज्यादा प्रचलित था। जो व्यक्ति जिस नक्षत्र में जन्म लेता था उसके उस नक्षत्र अनुसार उसका भविष्य बताया जाता था। नक्षत्र 27 होते हैं।
अँगूठा शास्त्र :- यह विद्या भी दक्षिण भारत में प्रचलित है। इसके अनुसार अँगूठे की छाप लेकर उस पर उभरी रेखाओं का अध्ययन कर बताया जाता है कि जातक का भविष्य कैसा होगा।
सामुद्रिक विद्या:- यह विद्या भी भारत की सबसे प्राचीन विद्या है। इसके अंतर्गत व्यक्ति के चेहरे, नाक-नक्श और माथे की रेखा सहित संपूर्ण शरीर की बनावट का अध्ययन कर व्यक्ति के चरित्र और भविष्य को बताया जाता है।
चीनी ज्योतिष :- चीनी ज्योतिष में बारह वर्ष को पशुओं के नाम पर नामांकित किया गया है। इसे ‘पशु-नामांकित राशि-चक्र’ कहते हैं। यही उनकी बारह राशियाँ हैं, जिन्हें ‘वर्ष’ या ‘सम्बन्धित पशु-वर्ष’ के नाम से जानते हैं। यह वर्ष निम्न हैं- चूहा, बैल, चीता, बिल्ली, ड्रैगन, सर्प, अश्व, बकरी, वानर, मुर्ग, कुत्ता और सुअर। जो व्यक्ति जिस वर्ष में जन्मा उसकी राशि उसी वर्ष अनुसार होती है और उसके चरित्र, गुण और भाग्य का निर्णय भी उसी वर्ष की गणना अनुसार माना जाता है।
वैदिक ज्योतिष :- वैदिक ज्योतिष अनुसार राशि चक्र, नवग्रह, जन्म राशि के आधा‍र पर गणना की जाती है। मूलत: नक्षत्रों की गणना और गति को आधार बनाया जाता है। मान्यता अनुसार वेदों का ज्योतिष किसी व्यक्ति के भविष्य कथक के लिए नहीं, खगोलीय गणना तथा काल को विभक्त करने के लिए था।
टैरो कार्ड :- टैरो कार्ड में ताश की तरह पत्ते होते हैं। जब भी कोई व्यक्ति अपना भविष्य या भाग्य जानने के लिए टैरो कार्ड के जानकार के पास जाता है तो वह जानकार एक कार्ड निकालकर उसमें लिखा उसका भविष्य बताता है। यह उसी तरह हो सकता है जैसा की पिंजरे के तोते से कार्ड निकलवाकर भविष्य जाना जाता है। यह उस तरह भी है जैसे कि बस स्टॉप या रेलवे स्टेशन पर एक मशीन लगी होती है जिसमें एक रुपए का सिक्का डालो और जान लो भविष्य। किसी मेले या जत्रा में एक कम्प्यूटर होता है जो आपका भविष्य बताता है। उपरोक्त विद्या जुए-सट्टे जैसी है यदि अच्छा कार्ड लग गया तो अच्छी भविष्यवाणी, बुरा लगा तो बुरी और सामान्य लगा तो सामान्य। हालाँकि टैरो एक्सपर्ट मनोविज्ञान को आधार बनाकर व्यक्ति का चरित्र और भविष्य बताते हैं। अब इसमें कितनी सच्चाई होती है यह कहना मुश्किल है। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार इसके अलावा माया, हेलेनिस्टिक, सेल्टिक, पर्शियन या इस्लामिक, बेबिलोनी आदि अनेक ज्योतिष धारणाएँ हैं। हर देश की अपनी अलग ज्योतिष धारणाएँ हैं और अलग-अलग भविष्यवाणियाँ। ज्योतिष विविधता का प्रदर्शन करता है और विश्वव्यापी है, हालांकि यह एक वैज्ञानिक विधि के रूप में स्वीकार नहीं किया गया है। इसे आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विवादास्पद माना जाता है, लेकिन यह अनेक लोगों के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
लेखक परिचय - Pandit Anjani Kumar Dadhich 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच 
Nakastra Jyotish Sansthan 
नक्षत्र ज्योतिष संस्थान नागौर 
panditanjanikumardadhich@gmail.com 
6377054504

Friday, 18 April 2025

यदि सप्तम भाव का स्वामी छ्ठे भाव में स्थित हो

यदि सप्तम भाव का स्वामी छ्ठे भाव में स्थित हो 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार वैदिक ज्योतिष में सातवें भाव के स्वामी (सातवें भाव के शासक) का छ्ठे भाव में स्थित होना कई तरह के प्रभाव डाल सकता है खास तौर पर रिश्तों, साझेदारी और स्वास्थ्य के संबंध में। यहाँ कुछ मुख्य प्रभाव दिए गए हैं जिन पर विचार किया जाना चाहिए-
1. रिश्तों में चुनौतियाँ- छठा भाव संघर्ष, कर्ज और शत्रुओं से जुड़ा हुआ है। जब सप्तम भाव का स्वामी यहां स्थित होता है, तो यह रिश्तों और साझेदारी में चुनौतियों या संघर्षों का संकेत दे सकता है। जीवनसाथी या व्यावसायिक साझेदारों के साथ गलतफहमी या विवाद हो सकता है।
2. स्वास्थ्य संबंधी मुद्दे- छठा भाव स्वास्थ्य और सेवा से भी जुड़ा हुआ है। यह स्थिति यह संकेत दे सकती है कि व्यक्ति के रिश्ते स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से प्रभावित हो सकते हैं, चाहे वह स्वयं के हों या उसके साथी के। यह रिश्तों में दूसरों की सेवा करने की आवश्यकता को भी इंगित कर सकता है, संभवतः व्यक्तिगत जरूरतों की कीमत पर।
3. कार्यस्थल संबंध- छठा भाव काम, कर्मचारियों और दैनिक दिनचर्या से संबंधित है। यह स्थिति संकेत दे सकती है कि कार्यस्थल पर विवाह सहित महत्वपूर्ण संबंध विकसित हो सकते हैं या भागीदारों का कोई सेवा-उन्मुख या स्वास्थ्य-संबंधी पेशा हो सकता है।
4. कानूनी मामले- छठा भाव मुकदमेबाजी और विवादों से जुड़ा हुआ है। यह साझेदारी या विवाह से संबंधित संभावित कानूनी मुद्दों का संकेत दे सकता है, या व्यक्ति को अपने रिश्तों से संबंधित कानूनी मामलों से निपटना पड़ सकता है।
5. सेवा और त्याग- रिश्तों में त्याग की भावना हो सकती है, जहां एक साथी को अधिक सेवा-उन्मुख भूमिका निभाने की आवश्यकता हो सकती है। इससे एक ऐसी गतिशीलता पैदा हो सकती है जहां एक साथी को अत्यधिक बोझ या कम सराहना महसूस हो।
6. चुनौतियों के माध्यम से विकास- अधिक सकारात्मक रूप से, यह स्थिति यह भी सुझाव दे सकती है कि रिश्तों में चुनौतियों से विकास और गहरी समझ पैदा हो सकती है। यह व्यक्ति को कठिनाइयों से निपटने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है, जिससे समय के साथ रिश्ते मजबूत होते हैं।
7. संतुलन की आवश्यकता- इस स्थिति वाले व्यक्तियों को अपनी व्यक्तिगत ज़रूरतों को अपने साथी की ज़रूरतों के साथ संतुलित करना सीखना पड़ सकता है, खास तौर पर स्वास्थ्य और सेवा के मामले में। ज़िम्मेदारियों से अभिभूत होने से बचने के लिए एक स्वस्थ गतिशीलता खोजना महत्वपूर्ण है।
इसके अलावा इस स्थिति में निम्नलिखित प्रभाव भी पड़ते हैं 
सातवें भाव का स्वामी छठे भाव में होने से जीवनसाथी को तर्क-वितर्क करने की क्षमता प्राप्त हो सकती है।
जीवनसाथी किसी प्रकार के स्वास्थ्य संबंधी या चिकित्सा संबंधी अध्ययन या कार्य से जुड़ा हो सकता है।
यदि ग्रह की स्थिति मजबूत और छठे भाव में असंबद्ध हो तो जीवनसाथी बहुत धनवान और स्वस्थ हो सकता है।
यदि ग्रह की स्थिति मजबूत हो तो जीवनसाथी बहुत भौतिकवादी हो सकता है।
यदि सप्तम भाव का स्वामी छठे भाव में कमजोर हो या पीड़ित हो या पाप ग्रहों के साथ युति में हो या सूर्य द्वारा अस्त हो तो जीवनसाथी जातक के लिए अदालती मामले या परेशानियां ला सकता है।
निष्कर्ष - कुल मिलाकर, सातवें भाव के स्वामी का छठवें भाव में स्थित होना रिश्तों, स्वास्थ्य और सेवा के जटिल अंतर्संबंध का संकेत देता है। हालांकि, इसमें चुनौतियां हो सकती हैं, लेकिन इन अनुभवों के माध्यम से विकास और गहरी समझ की संभावना भी है। हमेशा की तरह, पूरा प्रभाव विशिष्ट चार्ट और अन्य ग्रहों की स्थिति पर निर्भर करेगा।

लेखक परिचय- Pandit Anjani Kumar Dadhich
पंडित अंजनी कुमार दाधीच [पुरोहित कर्म (यज्ञ-हवन - पुजा-अनुष्ठान) विशेषज्ञ, वैदिक ज्योतिषी, अंक ज्योतिषी एवं वास्तुविद ]
Nakshatra Jyotish Sansthaan
नक्षत्र ज्योतिष संस्थान
panditanjanikumardadhich@gmail.com
सम्पर्क सूत्र - 063770 54504, 9772380963

Monday, 20 May 2024

शिव स्तुति

शिव स्तुति 
सोमवार के दिन शिवलिंग पर जल,बेलपत्र, दूध,भांग आदि चढ़ाकर शिवलिंग का पुजन करे और शिव स्तुति का पाठ करने से व्यक्ति के सारे कष्ट दूर होते हैं और शिव कृपा प्राप्त होती है। शिव स्तुति का पाठ करने से व्यक्ति को मनोवांछित फल, समस्त सुख और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है और सभी विपदाओं व दुखो का निवारण होता है।
।। अथ श्री शिव स्तुति।।
पशूनां पतिं पापनाशं परेशं गजेन्द्रस्य कृत्तिं वसानं वरेण्यम।
जटाजूटमध्ये स्फुरद्गाङ्गवारिं महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम।1।
 
महेशं सुरेशं सुरारातिनाशं विभुं विश्वनाथं विभूत्यङ्गभूषम्।
विरूपाक्षमिन्द्वर्कवह्नित्रिनेत्रं सदानन्दमीडे प्रभुं पञ्चवक्त्रम्।2।
 
गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं गवेन्द्राधिरूढं गुणातीतरूपम्।
भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गं भवानीकलत्रं भजे पञ्चवक्त्रम्।3।
 
शिवाकान्त शंभो शशाङ्कार्धमौले महेशान शूलिञ्जटाजूटधारिन्।
त्वमेको जगद्व्यापको विश्वरूप: प्रसीद प्रसीद प्रभो पूर्णरूप।4।
 
परात्मानमेकं जगद्बीजमाद्यं निरीहं निराकारमोंकारवेद्यम्।
यतो जायते पाल्यते येन विश्वं तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम्।5।
 
न भूमिर्नं चापो न वह्निर्न वायुर्न चाकाशमास्ते न तन्द्रा न निद्रा।
न गृष्मो न शीतं न देशो न वेषो न यस्यास्ति मूर्तिस्त्रिमूर्तिं तमीड।6।
 
अजं शाश्वतं कारणं कारणानां शिवं केवलं भासकं भासकानाम्।
तुरीयं तम:पारमाद्यन्तहीनं प्रपद्ये परं पावनं द्वैतहीनम।7।
 
नमस्ते नमस्ते विभो विश्वमूर्ते नमस्ते नमस्ते चिदानन्दमूर्ते।
नमस्ते नमस्ते तपोयोगगम्य नमस्ते नमस्ते श्रुतिज्ञानगम्।8।
 
प्रभो शूलपाणे विभो विश्वनाथ महादेव शंभो महेश त्रिनेत्।
शिवाकान्त शान्त स्मरारे पुरारे त्वदन्यो वरेण्यो न मान्यो न गण्य:।9।
 
शंभो महेश करुणामय शूलपाणे गौरीपते पशुपते पशुपाशनाशिन्।
काशीपते करुणया जगदेतदेक-स्त्वंहंसि पासि विदधासि महेश्वरोऽसि।10।
 
त्वत्तो जगद्भवति देव भव स्मरारे त्वय्येव तिष्ठति जगन्मृड विश्वनाथ।
त्वय्येव गच्छति लयं जगदेतदीश लिङ्गात्मके हर चराचरविश्वरूपिन।11।

।।इति श्रीमच्छंकराचार्यविरचितो वेदसारशिवस्तवः संपूर्णः।।
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Pandit Anjani Kumar Dadhich 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच
कुंडली विश्लेषक वास्तुविद एवं अंक ज्योतिषी 
panditanjanikumardadhich@gmail.com
📱 9414863294,6377054504

Sunday, 7 January 2024

पर्वत योग

पर्वत योग 
मैं पंडित अंजनी कुमार दाधीच इस लेख में पर्वत योग के बारे में कुछ जानकारी दे रहा हूं।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार पर्वत योग एक बहुत ही शुभ योग है। पर्वत योग जातक को स्वास्थ्य, आयु, व्यवसाय, विवाह, शिक्षा, धन, संपत्ति, समृद्धि, विलासिता, प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि और कई अन्य अच्छी चीजों से संबंधित अच्छे परिणाम दे सकता है।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार इस पर्वत योग को किसी भी जातक की कुंडली में अलग-अलग तीन तरीकों से पहचाना जा सकता है। यह तीनों प्रकार के तरीके निम्नलिखित हैं -
⁠✿ यदि किसी जातक की कुंडली में उसके प्रथम भाव का स्वामी यानी कि लग्नेश अपनी उच्च राशि में या फिर खुद की राशि में स्थित हो और साथ ही साथ केंद्र के भावों (प्रथम, चतुर्थ, सप्तम और दशम भाव केंद्र के भाव होते हैं) या त्रिकोण भावों (पंचम और नवम भाव त्रिकोण भाव माने जाते हैं) में स्थित हो तब पर्वत योग का निर्माण होता है।
⁠✿ यदि किसी जातक की कुंडली के छठे भाव और आठवें भाव में कोई भी ग्रह स्थित न हो और अगर हो भी तो केवल शुभ ग्रह ही इन दो भावों में हों। इसके साथ ही केंद्र के भावों में सारे शुभ ग्रह स्थित हों तो जातकों की कुंडली में पर्वत योग का निर्माण होता है।
⁠✿ यदि किसी जातक की कुंडली के प्रथम भाव का स्वामी यानी कि लग्नेश और द्वादश भाव का स्वामी यानी कि द्वादशेश एक-दूसरे से केंद्र में स्थित हों तो भी पर्वत योग का निर्माण होता है।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार पर्वत योग वाले व्यक्ति बेहद भाग्यवान, वक्ता, शास्त्रज्ञ, प्राध्यापक, हास्य व्यंग्य, लेखक, यशस्वी, तेजस्वी होते हैं और राजनीतिज्ञ भी इसी योग से बनते हैं।
⁠✿⁠✿पर्वत योग का जीवन पर प्रभाव⁠✿⁠✿
किसी भी जातक की कुंडली में यदि पर्वत योग का निर्माण होता है तो ऐसे जातक को काफी भाग्यशाली माना जाता है। ऐसे जातकों का रुझान राजनीति की तरफ ज्यादा रहता है इसलिए ऐसे जातक कभी न कभी राजनीति को अपने करियर के तौर पर चुनते हैं और उसमें सफलता भी प्राप्त करते हैं। राजनीति में उच्च पद जैसे कि मुख्यमंत्री आदि का पद पर्वत योग की वजह से ही प्राप्त होता है। ऐसे जातक अच्छे वक्ता या लेखक भी माने जाते हैं। जिस भी जातक की कुंडली में पर्वत योग का निर्माण होता है, वे अधिकारों से परिपूर्ण, आर्थिक तौर पर सम्पन्न, समाज में यश व समान और एक खुशहाल पारिवारिक जीवन प्राप्त करते हैं। 
लेखक परिचय- Pandit Anjani Kumar Dadhich 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच
Nakshatra jyotish Hub 
नक्षत्र ज्योतिष हब 
📧 panditanjanikumardadhich@gmail.com
📱6377054504

Sunday, 14 August 2022

माणक धारण करने से पहले की सावधानीयां

सावधानियां रखें सूर्य रत्न माणिक्य (माणक) धारण करने से पहले
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार भारतीय वैदिक ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक माणिक्य रत्न सूर्य का प्रतिनिधित्व करने वाला एक बहुमुल्य रत्न है। अनार के दाने-सा दिखने वाला गुलाबी आभा वाला बहुमूल्य रत्न माणिक्य है। 
माणिक्य उच्च कोटि का मान-सम्मान एवम पद की प्राप्ति करवाता है। इसीलिए सत्ता और राजनीती से जुड़े लोगो को माणिक्य रत्न को अवश्य धारण करना चाहिए क्योकि यह रत्न सत्ताधारियों को एक ऊंचे पद तक पहुंचने में बहुत सहायता कर सकता है। इसे (माणिक्य) को सभी रत्‍नों में सबसे श्रेष्‍ठ माना जाता है। 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार लाल रक्तकमल जैसे सिंदूरी, हल्के नीले आदि रंगों में पाया जाता है पर लाल रंग का माणिक्य सबसे बेहतरीन और मूल्‍यवान होता है। संसार के विभिन्‍न जगहों में पाए जाने के कारण और जलवायु परिवर्तन का असर इसके रंगों में भी दिखता है। यह कई अलग-अलग जगहों में लाल रंग से गुलाबी रंगो में निकलता है। आम बोलचाल की भाषा में माणिक्य को माणक भी कहा जाता है और संस्कृत भाषा में इसे लोहित, पद्यराग, शोणरत्न , रविरत्न, शोणोपल, वसुरत्न, कुरुविंद आदि नामों से तथा पंजाबी में चुन्नी, उर्दू- फारसी में याकत नाम से जाना जाता है और माणिक्य को अंग्रेजी में रूबी कहते हैं। इन्हीं सब विशेषताओं के चलते इसे सूर्यरत्न भी कहा जाता है। जो किसी भी व्यक्ति की कुंडली में सूर्य अशुभ प्रभाव में होता है तो उसे माणिक्य रत्न धारण करना चाहिए ताकि इसे धारण करने से सूर्य की पीड़ा को शांत किया जा सके और माणिक्य सूर्य के प्रभाव को शुद्ध करता है एवं जातक धन आदि की अच्‍छी प्राप्‍ति कर पाता है। माणिक्य रत्न किसी भी व्यक्ति को मान-सम्मान,पद की प्राप्ति करवाने में सहायक सिद्ध होता है और माणिक (माणिक्य) से राजकीय और प्रशासनिक कार्यों में सफलता मिलती है। अगर माणिक पहनना लाभदायक होता है तो जातक के चेहरे पर चमक आ जाती है। इसे कुंडली के अनुसार ही धारण करने का विधान है। 
शुद्धता की पहचान - पंडित अंजनी कुमार के अनुसार यदि माणिक्य की शुद्धता की जांच पड़ताल करनी हो तो माणिक्य को गाय के दूध में डाल देंने पर दूध गुलाबी रंग का दिखाई देने लगे तो वो माणिक्य शुद्ध व असली है इसके अलावा शुद्ध माणिक्य को किसी काँच के पात्र में रखने से ऐसा लगेगा कि जैसे उस पात्र में रक्तिम(लाल) किरणें फूट रही हैं।माणिक रक्तवर्धक, वायुनाशक और पेट रोगों में लाभकारी सिद्ध होता है। यह मानसिक रोग एवं नेत्र रोग में भी फायदा करता है। माणिक धारण करने से नपुंसकता नष्ट होती है।
पंडित अंजनी कुमार के अनुसार माणिक्य पहनने से पहले यह अवश्य जान लेना चाहिए कि कि दोषयुक्त माणिक्य धारण करने से वह लाभ की बजाय हानि ज्यादा करता है। इसके अलावा माणिक्य धारण से सिरदर्द, अपयश, आर्थिक नुकसान और पारिवारिक समस्याएं आदि भी पहुंचा सकता है। इसलिए इसे पहनने से पहले निम्नलिखित सावधानियां बरतनी चाहिए -
रत्न ज्योतिष के अनुसार जिस माणिक्य में आड़ी तिरछी रेखाएं या जाल जैसा दिखाई दे तो वह माणिक्य गृहस्थ जीवन को नष्ट करने वाला होता है।
जिस माणिक्य में दो से अधिक रंग दिखाई दें तो जान लीजिए कि वो माणिक्य आपकी लाइफ काफी परेशानियां ला सकता है।
कहा जाता है जिस माणक में चमक नहीं होती ऐसा माणिक्य विपरीत फल देने वाला होता है। तो कभी भी बिना चमक वाला माणिक्य न पहने।
माणिक्य खरीदने से पहले देख लें कि कहीं वो माणिक्य धुएं के रंग का न हो क्योंकि धुएं के रंग के जैसा दिखने वाला माणिक्य और मटमैला माणिक्य अशुभ होने के साथ हानिकारक माना जाता है। 
माणिक्य को नीलम, हीरा और गोमेद के साथ पहनना नुकसानदायक हो सकता है। माणिक्य को मोती, पन्ना, मूंगा और पुखराज के साथ पहन सकते हैं। 
शनि की राशियों या लग्न में माणिक्य पहनने से पूर्व ज्योतिष की सलाह जरूर लें।
माणिक्य को लोहे की अंगुठी में जड़वाकर पहनना नुकसानदायक है।
माणिक्य का प्रभाव अंगूठी में जड़ाने के समय से 4 वर्षों तक रहता है। इसके बाद दूसरा माणिक्य जड़वाना चाहिए।
किसी ज्‍योतिषाचार्य की सलाह से और जन्मकुंडली में सूर्य की स्‍थ‍िति को देखकर ही इसको धारण करना चाहिए। 

Thursday, 11 August 2022

पंचांग की काल गणना

पंचांग की काल गणना

प्रिय पाठकों, 

11 अगस्त 2022, गुरुवार 

मैं पंडित अंजनी कुमार दाधीच आज पंचांग के सरल ज्ञान के तहत पंचांग की काल गणना के बारे में जानकारी यहाँ दे रहा हूँ।

पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार पंचांग के पांच अंगों के द्वारा ही समय की काल गणना सम्भव हो पाई है और इसी काल गणना का उपयोग कर जन्म कुंडली, विवाह मुहूर्त, अनुष्ठान, शुभ- अशुभ स्थिति, ग्रहों का विचरण और अन्य गणनाएं की जाती है। हिन्दू पंचांग की समय गणना (काल गणना) में समय की अलग अलग प्रकार के माप हैं जो हिन्दू पंचांग में समय के गणनाचक्र को सूर्य सिद्धांत नामक ग्रंथ के पहले अध्याय के 11वें श्लोक से 23वें श्लोक तक में बतलाया गया हैं। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार इन सभी श्लोको का भावार्थ वर्णन निम्नलिखित है- 

☞ जो कि श्वास (प्राण) से आरम्भ होता है वह यथार्थ कहलाता है और वह जो त्रुटि से आरम्भ होता है। अवास्तविक कहलाता है। छः श्वास से एक विनाड़ी बनती है। साठ श्वासों से एक नाड़ी बनती है।

☞ साठ नाड़ियों से एक दिवस (दिन और रात्रि) बनते हैं। तीस दिवसों से एक मास (महीना) बनता है। एक नागरिक (सावन) मास सूर्योदयों की संख्याओं के बराबर होता है। जबकि एक चंद्र मास उतनी चंद्र तिथियों से बनता है। 

☞ एक सौर मास सूर्य के राशि में प्रवेश से निश्चित होता है। बारह मास एक वर्ष बनाते हैं। मानव के एक वर्ष को देवताओं का एक दिवस कहते हैं। देवताओं और दैत्यों के दिन और रात्रि पारस्परिक उलटे होते हैं। 

☞ उनके छः गुणा साठ देवताओं के दिव्य वर्ष होते हैं। ऐसे ही दैत्यों के भी होते हैं। बारह सहस्र (हजार) दिव्य वर्षों को एक चतुर्युग कहते हैं। यह तैंतालीस लाख बीस हजार सौर वर्षों का होता है।  

☞ भारतीय मनीषियों ने पूरे ब्रह्मांड की आयु की भी गणना की। उन्होंने सौर वर्ष के बाद दिव्य वर्ष से लेकर परार्ध तक की गणना की है। उसका चार्ट निम्नानुसार है-

लि युग = 4,32,000 वर्ष

 द्वापर युग = 8,64,000 वर्ष (2 कलि)

 त्रेता युग = 12,96,000 वर्ष (3 कलि)

 कृत युग 17,28,000 वर्ष (4 कलि)

कृत् या सत् युग में धर्म के चार पाद होते हैं, त्रेता में तीन, द्वापर में दो और कलि में केवल एक।

☞ चतुर्युगी की उषा और संध्या काल होते हैं।कॄतयुग या सतयुग और अन्य युगों का अन्तर को चरणों में मापा जाता है। 

☞ एक चतुर्युगी का दशांश को क्रमशः चार, तीन, दो और एक से गुणा करने पर कॄतयुग (सतयुग) और अन्य युगों की अवधि मिलती है। इन सभी का छठा भाग इनकी उषा और संध्या होता है।

☞ इकहत्तर चतुर्युगी का एक मन्वन्तर या एक मनु की आयु होती हैं। इसके अन्त पर संध्या होती है जिसकी अवधि एक सतयुग के बराबर होती है और यह प्रलय होती है। 

☞ एक कल्प में चौदह मन्वन्तर होते हैं और अपनी संध्याओं के साथ प्रत्येक कल्प के आरम्भ में पंद्रहवीं संध्या या उषा होती है। यह भी सतयुग के बराबर ही होती है। 

☞ एक कल्प में एक हजार चतुर्युगी होते हैं और फिर एक प्रलय होती है। यह ब्रह्मा का एक दिन होता है। इसके बाद इतनी ही लम्बी रात्रि भी होती है।

☞ इस दिन और रात्रि के आकलन से उनकी आयु एक सौ वर्ष होती है उनकी आधी आयु निकल चुकी है और शेष में से यह प्रथम कल्प है।

☞ इस कल्प में, छः मनु कंपनी संध्याओं समेत निकल चुके, अब सातवें मनु (वैवस्वत: विवस्वान (सूर्य) के पुत्र) की सत्ताईसवीं चतुर्युगी बीत चुकी है।

☞ वर्तमान समय के अनुसार‌ अट्ठाईसवीं चतुर्युगी का द्वापर युग बीत चुका है तथा भगवान कृष्ण के अवतार समाप्ति से 5123 वाँ वर्ष (ईस्वी सन् 2021 में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से) प्रगतिशील है। जबकि कलियुग की कुल अवधि 4,32,000 वर्ष है।  

पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार एक हिन्दु पंचांग की कालगणना में एक दिवस सूर्य उदय से अगले सूर्य उदय पर समाप्त होता है अर्थात एक सूर्यादय से दूसरे सूर्योदय तक के समय को दिवसके नाम से पुकारा जाता है और एक दिवस में एक दिन और एक रात होते हैं। दिवस से आरम्भ करके समय को साठ-साठ के भागों में विभाजित करके उनके नाम रखे गए हैं। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार भारतीय पंचांग में समय की गणना को बड़ी से बड़ी और छोटे से छोटे इकाईयों में विभक्त कर किसी भी समय का शुभ मुहूर्त या योग निकाला जा सकता है जो निम्नलिखित है-

✷ 1 पलक झपकना = 1 निमेष

✷ 3 निमेष = 1 क्षण

✷ 5 क्षण = 1 काष्ठ

15 काष्ठा =1 लधु

✷ 15 लधु = 1 घटी = 24 मिनट ( घटि को देशज भाषा में घड़ी भी कहा जाता है।]

✷ 1पल = 60 विपल (60 विपल 24 सेकेण्ड के बराबर है। 1 विपल = 0.4 सेकेण्ड)

✷ 1 विपल = 60 प्रतिविपल 

✷ इसके अतिरिक्त 1 पल = 6 प्राण ( 1 प्राण = 4 सेकेण्ड )

✷ डेढ़ घटी = 1 घंटा

✷ 60 घटी = 24 घण्टे [एक दिवस = 60 घटि अर्थात 60 घटि 24 घंटे के बराबर होती है। 

✷ 2 घटी = 1मुहूर्त

✷ 30 मुहूर्त = 1 दिन-रात यानि अहोरात

✷ 1 याम = 1प्रहर (एक दिन का चौथा हिस्सा)

✷  8 प्रहर = 1 दिन -रात

✷ 7 दिन -रात = 1 सप्ताह

✷ 4 सप्ताह = 1 महीना

12 मास = 1 वर्ष (365 -366 दिनो)

पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार हिन्दुओं के धर्मशास्त्रों के अनुसार घण्टो- मिनटों को पलों में परिवर्तन करना और उनको नियम अनुसार देखना चाहिए।

✿ 1 मिनट – 2 -1/2 पल
✿ 4 मिनट – 10 पल
✿ 12 मिनट- 30 पळ
✿ 24 मिनट – 1 घटी
✿ 60 मिनट – 60 घटी यानि 1 घण्टा

भारतीय ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक समय को निम्नलिखित रुप से विभक्त किया जा सकता है - 

☆ 60 विकला = 1 कला

☆ 60 कला = 1 अंश

☆ 30 अंश = 1 राशि

☆ 12 राशि = मगण

☆ सूर्योदय से सूर्यास्त तक = एक दिन या दिनमान

☆ सूर्यास्त अगले दिन सूर्योदय = रात्रिमान

☆ उषाकाल = सूर्याद्य से 8 घटी पहले

☆ प्रात:काल = सूर्यादय से 3 घटी तक

☆ संध्याकाल =सूर्यास्त से 3 घटी तक।

पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार इस प्रकार एक दिवस में 360 पल होते हैं। एक दिवस में जब पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है तो उसके कारण सूर्य विपरीत दिशा में घूमता प्रतीत होता है। 360 पलों में सूर्य एक चक्कर पूरा करता है , इस प्रकार 360 पलों में 360 अंश। 1 पल में सूर्य का जितना कोण बदलता है उसे 1 अंश कहते है। 

पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार ब्रह्मांड में भिन्न-भिन्न लोकों में काल की गति भी भिन्न-भिन्न होती है। एक काल की सबसे छोटी ईकाई भारतीय शास्त्रों में परमाणु की मानी गई है। दो परमाणु के बराबर एक अणु होता है और तीन अणु काल के बराबर एक त्रसरेणु काल होता है। एक त्रसरेणु काल के माप के बारें में बताते हुए भारतीय शास्त्रकारों ने लिखा है कि किसी द्वार की झिरी में से आ रहे सूर्य के प्रकाश में जो कण उड़ते हुए दिखते हैं, उसे ही त्रसरेणु कहते हैं। प्रकाश को इसे पार करने में जितना समय लगता है, उसे ही एक त्रसरेणु काल कहते हैं। तीन त्रसरेणु काल को एक त्रुटि कहा गया है। त्रुटि से काल की गणना को बढ़ाते हुए परार्ध तक ले जाया गया है।

विष्णुधर्मोत्तर पुराण ( प्रथम खण्ड,73। 4-1, हेमाद्रि कृत चतुर्वर्ग चिन्तामणि, काल खंड)

1 लघु अक्षर उच्चारण 1 निमेष 

2 निमेष 1 त्रुटि 

10 त्रुटि 1 प्राण 

6 प्राण 1 विनाडिका 

60 विनाडिका 1 नाडिका 

60 नाडिका 1 मुहूर्त 

30 मुहूर्त 1 अहोरात्र

पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार भारतीय ज्योतिषियों ने निम्नलिखित मंत्रों के आधार पर ही गणनाएं कीं और उन्हीं गणनाओं को आज का कथित वैज्ञानिक जगत में भी स्वीकार किया जाता है। 

☆ दादशारं नहि तज्जराय वर्वर्ति चक्रं परि द्यामृतस्य।आ पुत्रा अग्ने मिथुनासो अत्र सप्त शतानी विंशतिश्च तस्थुः॥ (ऋग्वेद 1/164/11)

☆ द्वादश प्रधयश्चक्रमेकं त्रीणि नभ्यानि क उ तच्चिकेत।तस्मिन्त्साकं त्रिंशता न शङ्कवोऽर्पिताः षष्टिर्न चलाचलास: ॥ (ऋग्वेद 1/164/48)

इन दो मंत्रों में यह स्पष्ट किया गया है कि संवत्सर में बारह अरे या प्रविधियाँ हैं। 360 शंकु यानी दिन अथवा 729 जोड़े यानी रात-दिन हैं। यहाँ इसे एक चक्र के रूप में निरूपित किया गया है, जोकि पृथ्वी की सूर्य के चारों ओर की चक्राकार गति तथा काल की चक्रीय होने दोनों का ही प्रतीक है। इससे स्पष्ट है कि संवत्सर यानी एक वर्ष में 360 दिन और बारह मास होने की संकल्पना भारत में एकदम प्रारंभ से ही है। परंतु इस सामान्य आधार को आगे बढ़ाते हुए भारतीय ज्योतिषाचार्यों ने पृथ्वी की अयन गति को जाना और इसके बाद उन्होंने वर्ष का वास्तविक परिगणन भी किया। मासों की गणना या निर्माण पृथ्वी की अपनी कक्षा से नहीं की गई, इसका निर्धारण चंद्रमा के पृथिवी के चारों ओर की कक्षा से किया गया। इसलिए इसे चांद्रमास भी कहते हैं। चंद्रमा का एक मास 30 चंद्र तिथियों का होता है परंतु वह सौर मास से लगभग आधा दिन छोटा होता है। दोनों मासों में सामंजस्य बैठाने के लिए भारतीय ज्योतिषाचार्यों ने मलमास या अधिमास का विधान किया। वास्तव में चंद्रमा से मासों का निर्धारण केवल गणना का एक प्रकार मात्र नहीं है बल्कि इसका वैज्ञानिक आधार भी है। यह आज हमें ठीक से ज्ञात हो चुका है कि चंद्रमा ही पृथ्वी पर वातावरण संबंधी अनेक बदलावों को लाने का कारण है। वेदों में इस सृष्टि को अग्निसोमात्मकं यानी कि अग्नि तथा सोम से निर्मित और संचालित होना कहा गया है। सूर्य अग्नि है और चंद्रमा सोम है। कृषि में हम इसका प्रत्यक्ष प्रमाण देख सकते हैं। चंद्रमा के कारण पौधों की बालियों में रस भरता है और सूर्य के कारण फसले पकती हैं। मानव की पूरी सभ्यता आदि काल से कृषि आधारित रही है और चांद्र मास की गणना कृषिकार्य में सहायक है। यही कारण है कि सौर मासों की गणना करने के बाद भी भारतीय आचार्यों ने चांद्रमासों की भी गणना की।पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार विक्रम संवत् विश्व का सर्वश्रेष्ठ सौर-चांद्र के सामंजस्य वाला संवत् है। आज उस गणना को भुलाने के कारण कृषि में जो बाधाएं आ रही है वो बाधाएं किसी से छिपी नहीं हैं। भले ही उनका सही कारण नही समझने के कारण उसके निदान कुछ और किए जा रहे हैं जो और भी नवीन समस्याओं को जन्म दे रहे हैं। कुल मिलाकर कृषि कार्य भी कालगणना से जुड़ा हुआ मामला है।पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार प्राचीन काल के भारतीय ज्योतिषाचार्यों ने मासों का नाम पश्चिम सभ्यता का प्रचलित ईस्वी संवत की तरह मनमाने ढंग से नहीं रखा हालाँकि वेदों तथा उनके ब्राह्मणों में 12 मासों के नाम भिन्न दिए गए थे परंतु बाद में इन मासों का नाम उनके नक्षत्रों के आधार पर रखा गया जिनसे इनका प्रारंभ होता है। चित्रा नक्षत्र में प्रारंभ होने वाले मास का नाम चैत्र, विशाखा नक्षत्र में प्रारंभ होने वाले मास का नाम वैशाख। इस क्रम में सभी मासों के नाम निर्धारित किए गए। चंद्रमा और सूर्य की चाल से एक मास में तिथियों को निर्धारित किया गया और जो मनमाने ढंग से निर्धारित नहीं किया जाता है और आज भी तिथियों को निर्धारण किया जाता है। इस क्रम को आगे बढ़ाते हुए प्राचीन काल के भारतीय ज्योतिषाचार्यों ने प्रत्येक अहोरात्र को 24 होराओं में बांटा और हरेक का नामकरण भी किया। दिन के पहले होरा के नाम पर उस दिन का नाम किया गया। इस प्रकार सात दिनों के नाम रखे गए और इन्हीं नामों के आधार पर यूरोप में प्रचलित संवत में भी सातों दिनों के नाम रखे गए।

लेखक - Pandit Anjani Kumar Dadhich
पंडित अंजनी कुमार दाधीच
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नक्षत्र ज्योतिष हब
Panditanjanikumardadhich@gmail.com
Phone No-6377054504,9414863294 वो

Friday, 29 July 2022

वक्री बृहस्पति का विश्व और भारत पर प्रभाव

वक्री गुरु(देव गुरु बृहस्पति) का देश दुनिया पर पड़ने वाला प्रभाव
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार देवगुरु बृहस्पति के वक्री होने का यह समय देश दुनिया के लिए चुनौती पूर्ण रहेगा। विश्व के नेताओं की बुद्धि विपरीत होगी। जनता में आक्रोश बढ़ेगा। महंगाई पहले कि अपेक्षा बढ़ेगी।10 सितंबर से 2 अक्टूबर तक शनि, गुरु के साथ बुध ग्रह भी वक्री रहेगा।और शुक्र भी साथ होकर निचभंग राजयोग का निर्माण करेगा। कुछ देशों में सत्ता परिवर्तन होगा।जिन देशों में युद्ध चल रहा है वहां और परेशानी बढ़ेगी। कुछ दुसरे देशों के बीच भी युद्ध के आसार बनेंगे।
✿ भारत की कुंडली में देव गुरु बृहस्पति का वक्री प्रभाव
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार 
भारत देश की कुंडली वृष लग्न की है अतः देव गुरु बृहस्पति लाभ भाव में वक्री हो रहे है जो कि अष्टमेश भी है जिसके निम्नलिखित प्रभाव है-  
☞कुछ पुरानी चीजो की तरफ देश का ध्यान आकर्षित होगा। 
☞लाभ में पहले की अपेक्षा कमी आएगी। 
नए कार्य की प्रगति देश के लिए धीमी हो जाएगी और पुराने मामले बाहर आना शुरू हो जाएंगे। 
☞ गुरु बली अवस्था में शनि के नक्षत्र में है जिसकी वजह से पुराने मामलो मे तेज़ी आएगी और न्याय भी होता दिख रहा है।
☞ पूरे विश्व में हलचल रहेगी। 
☞ धर्म का विरोध बढ़ेगा। 
☞ धर्म और सांप्रदायिक घटनाएं बढ़ेगी। आतंकवादी घटनाएं होगी लेकिन सरकार और सेना भी इसका पूरी तरह सामना करेगी।यह गोचर फायदा और नुकसान दोनों लेकर आएगा। लेकिन गुरु शुभ ग्रह है तो इनकी शुभता भी देखने को मिलेगी।
लेखक - Pandit Anjani Kumar Dadhich
पंडित अंजनी कुमार दाधीच
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