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Monday, 28 February 2022

महाशिवरात्रि

महाशिवरात्रि : एक विशेष पर्व और उसका महत्व 
प्रिय पाठकों, 
01 मार्च 2022, मंगलवार
मैं पंडित अंजनी कुमार दाधीच आज महाशिवरात्रि - शिवभक्ति का महत्वपूर्ण त्यौहार के बारे में यहाँ जानकारी दे रहा हूँ।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार हिंदू धर्म में भगवान शिव को समर्पित महाशिवरात्रि का विशेष महत्व है। भारतीय कालदर्शक पंचांग के मुताबिक फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। इस साल यह पर्व 1 मार्च 2022, मंगलवार को मनाया जाएगा। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन माता पार्वती और भगवान शंकर की पूजा करने से भक्तों की मनोकामना पूरी होती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था इसलिए शिवभक्तों के लिए महाशिवरात्रि का दिन बहुत ही खास होता है। महाशिवरात्रि के दिन पर भगवान शिव के साथ माता पार्वती का पूजन भी किया जाता है। इस दिन शिव जी को उनकी प्रिय चीजें अर्पित करके व्यक्ति अपने जीवन की समस्याओं से मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं। 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार पौराणिक कथाओं के आधार पर ऐसा माना जाता है कि महाशिवरात्रि के दिन विधि-विधान से व्रत रखने वालों को धन,सौभाग्य, समृद्धि, संतान और आरोग्य की प्राप्ति होती है। महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है और उन्‍हें भांग, धतूरा, बेल पत्र और बेर चढ़ाए जाते हैं। इस दिन कई लोग धार्मिक अनुष्‍ठान और रुद्राभिषेक व महा महामृत्युंजय मंत्र का जप करते हैं। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार इस दिन महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने का विशेष महत्‍व होता है और हमारी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इस दिन अधिकांश घरों में लोग शिवजी का व्रत करते हैं और शाम को फलाहार करके व्रत पूरा करते हैं। इस दिन देश भर में कई स्‍थानों पर शिव बारात निकाली जाती है और धूमधाम से यह त्‍योहार मनाया जाता है। महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव के व्रत रखने वालों को सौभाग्य, समृद्धि और संतान की प्राप्ति होती है। शिव जी को महादेव, भोलेनाथ, आदिनाथ के नामों से भी जाना जाता है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार भगवान शिव ने ही धरती पर सबसे पहले जीवन के प्रचार-प्रसार का प्रयास किया था इसीलिए भगवान शिव को आदिदेव भी कहा जाता है।
महाशिवरात्रि पूजा का महत्व निम्नलिखित हैं-
महाशिवरात्रि के दिन महाशिवरात्रि का व्रत रखते हुए रात्रि को शिवजी की विधिवत आराधना करना कल्याणकारी माना जाता है। दूसरे दिन अर्थात अमावस के दिन मिष्ठान्नादि सहित ब्राहम्णों तथा शारीरिक रुप से अस्मर्थ लोगों को भोजन देने के बाद ही स्वयं भोजन करना चाहिए। यह व्रत महाकल्याणकारी और अश्वमेध यज्ञ तुल्य फल प्राप्त होता है। इस दिन किए गए अनुष्ठानों, पूजा व व्रत का विशेष लाभ मिलता है। अलौकिक सिद्धियाँ एवं ऋद्धि- सिद्धि प्राप्त करने के लिए यह दिन सर्वाधिक उपयुक्त समय होता है।ईशान संहिता के अनुसार फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को अर्द्धरात्रि के समय करोड़ों सूर्य के तेज के समान ज्योर्तिलिंग का प्रादुर्भाव हुआ था। स्कंद पुराण के अनुसार- चाहे सागर सूख जाए, हिमालय टूट जाए, पर्वत विचलित हो जाएं परंतु शिव-व्रत कभी निष्फल नहीं जाता। भगवान राम भी यह व्रत रख चुके हैं।
महाशिवरात्रि में भगवान शिव की पूजा सामग्री निम्नलिखित है -
प्रातःकाल स्नान से निवृत होकर एक वेदी पर कलश की स्थापना कर गौरी शंकर की मूर्ति या चित्र रखें। कलश को जल से भरकर रोली, मौली, अक्षत, पान सुपारी, लौंग, इलायची, चंदन, दूध,दही, घी, शहद, कमलगट्टा, धतूरा, बिल्व पत्र, कनेर आदि अर्पित करें और शिव की आरती पढ़ें। रात्रि जागरण में शिव की चार आरती का विधान आवश्यक माना गया है। इस अवसर पर शिव पुराण का पाठ और महामृत्युंजय मंत्र का जाप कल्याणकारी कहा जाता है।
महाशिवरात्रि के अवसर पर निम्नलिखित कार्यो का ध्यान रखना चाहिए जो बहुत महत्वपूर्ण है -  
❃महाशिवरात्रि पर भगवान शिव के शिवलिंग का पूजन शुभ शुभफलदायी रहता है इसलिए शिवलिंग अवश्य करना चाहिए।  
❃भगवान शिव की पूजा में सफेद फूलों का प्रयोग करना चाहिए और यदि आक के फूल हो तो और भी श्रेष्ठ रहता है।
❃शिवरात्रि के दिन शिव जी के साथ माता पार्वती की पूजा भी करनी चाहिए जिससे वैवाहिक जीवन सुखमय रहता है और जिन लोगों का विवाह नहीं हुआ हैै तो उनकी विवाह की बाधाएं दूर होती है।
❃ महाशिवरात्रि पर भगवान शिव और माता पार्वती के पूजन के साथ नंदी का पूजन अवश्य करना चाहिए क्योंकि नंदी पूजन के बिना शिव जी की पूजा अधूरी मानी जाती है। 
❃भगवान शिव की कृपा पाने के लिए महाशिवरात्रि के दिन बैल को हरा चारा खिलाना चाहिए।
❃बिल्वपत्र भगवान शिव को बहुत प्रिय है। बिल्वपत्र पर चंदन से ''ओम् नमः शिवाय: '' लिखकर शिवलिंग पर अर्पित करना चाहिए।
❃महाशिवरात्रि पर प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा करने के साथ चारो प्रहर की पूजा करनी चाहिए।
महाशिवरात्रि के अवसर पर निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना अति आवश्यक होता है - 
❁महाशिवरात्रि के दिन सवेरे बिल्कुल भी देर तक न सोएं। यदि महाशिवरात्रि का व्रत नहीं भी किया है तो बिना स्नान और भगवान शिव के पूजन के बिना भोजन नहीं करें।
❁शिवरात्रि के दिन भूलकर भी काले रंग के वस्त्र धारण न करें। 
❁शिवलिंग की परिक्रमा करते समय जल स्थान को भूलकर भी न लांघे।
❁शिव जी की पूजा में हल्दी, तुलसी और कुमकुम का प्रयोग न करें।
❁शिव जी को भूलकर भी शंख से जल न चढ़ाएं।
❁ शिव जी की पूजा में केतकी का फूल वर्जित है इसके अलावा चंपा के फूल का प्रयोग भी न करें।
❁भगवान शिव पशुपतिनाथ कहलाते हैं इसलिए महाशिवरात्रि के दिन भूलकर भी किसी पशु-पक्षी को न सताएं।
❁ महाशिवरात्रि पर घर में या आस-पास किसी से भी कलह करने से बचें। किसी को अपशब्द न कहें और न ही निंदा करें।
❁ महाशिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर चढ़ाई गई चीजों को बिल्कुल भी ग्रहण नहीं करना चाहिए क्योंकि
 ❁ शिवलिंग पर चढ़ाई चीजों को ग्रहण करना शुभ नहीं माना जाता है।
❁ महाशिवरात्रि पर सात्विकता बनाएं रखें। इस दिन भूलकर भी मांस-मदिरा का सेवन न करें।
 महाशिवरात्रि पर महादेव की कृपा पाने के लिए करें राशि अनुसार उपाय
मेष राशि: इस दिन मंदिर में या अपने घर में ही भगवान शिव को लाल रंग के गुड़हल फूल चढ़ाएं।
वृषभ राशि: इस दिन भगवान शिव का पंचामृत से अभिषेक करते हुए महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें। इसे बेहद ही शुभ माना गया है।
मिथुन राशि: इस दिन भगवान शिव के समक्ष तेल का दीपक जलाएं तथा महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें।
कर्क राशि- इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती जी का दुग्धाभिषेक कर भगवान शिव के लिंगाष्टकम का पाठ करें। 
सिंह राशि: इस दिन प्रात काल उठकर महादेव की पूजा करें और शिव रक्षा स्तोत्र का पाठ करें। 
कन्या राशि: इस दिन भगवान शिव का पूजन करते हुए ‘ओम् नमः शिवाय’ का 21 बार जप करें। 
तुला राशि- इस दिन भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा करें। महाशिवरात्रि की रात्रि में भगवान शिव की खास पूजा करें।
वृश्चिक राशि इस दिन भगवान शिव की पूजा करें और गन्ने के रस से अभिषेक करें और नंदी को गुड़ का भोग लगाएं। 
धनु राशि: मंदिर में भगवान शिव को दूध अर्पित करें और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें।
मकर राशि: महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव का रुद्राभिषेक करते हुए रुद्राष्टकम का पाठ करें। कुंभ राशि: भगवान शिव का पंचामृत से अभिषेक कर भिखारियों को भोजन कराएं। 
मीन राशि: इस दिन भगवान शिव का अभिषेक कर 11 बिल्व पत्र अर्पित विशेष तौर पर करे तथा अपने बड़े बुजुर्गों का आशीर्वाद अवश्य लें।
लेखक - Pandit Anjani Kumar Dadhich
पंडित अंजनी कुमार दाधीच
Nakshatra jyotish Hub
नक्षत्र ज्योतिष हब
📧panditanjanikumardadhich@gmail.com
फोन नंबर - 9414863294

Wednesday, 2 February 2022

गुप्त नवरात्रि

माँ दुर्गा की कृपा पाने के लिए चमत्कारी मन्त्र 

प्रिय पाठकों, 
2 फरवरी 2022, बुधवार
मैं पंडित अंजनी कुमार दाधीच आज गुप्त नवरात्रि और चमत्कारी मंत्र जाप के बारे में यहाँ जानकारी दे रहा हूँ।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार
नवरात्रि यानि नौ दिन मां दुर्गा की पूजा और अराधना के दिन होते हैं। नवरात्रि के दिन मां दुर्गा को समर्पित होते हैं। एक साल में चार बार नवरात्रि मनाए जाते हैं। दो बार गुप्त नवरात्रि और एक चैत्र एक शारदीय नवरात्रि। साल में दो बार आने वाले नवरात्रि में से एक माघ माह में आने वाले गुप्त नवरात्रि हैं।
भारतीय वैदिक पंचांग के अनुसार गुप्त नवरात्रि 2 फरवरी 2022 बुधवार से प्रारंभ हो रहे हैं। 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार हिंदीके व्याकरण साहित्य में गुप्त शब्द का अर्थ छिपा हुआ होता है। इस नवरात्रि में गुप्त विद्याओं की सिद्धि हेतु साधना की जाती है। गुप्त नवरात्रि में तंत्र एवं मंत्र साधनाओं का महत्व होता है और तंत्र और मंत्र साधना को गुप्त रूप से ही किया जाता है। इसीलिए इसे गुप्त नवरात्रि कहते हैं। इसमें विशेष कामनाओं की सिद्धि की जाती है। साधकों को इसका ज्ञान होने के कारण या इसके छिपे हुए होने के कारण इसको गुप्त नवरात्र कहते हैं। गुप्‍त नवरात्रि में विशेष पूजा से कई प्रकार के दुखों से मुक्‍ति पाई जा सकती है। गुप्त नवरात्रि में महाविद्याओं को सिद्ध करने के लिए उपासना करते हैं। यह नवरात्रि मोक्ष की कामने से भी की जाती है। इस दौरान 10 महाविद्याओं मां काली, तारा देवी, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, माता छिन्नमस्ता, त्रिपुर भैरवी, मां ध्रुमावती, मां बंगलामुखी, मातंगी और कमला देवी की पूजा-अर्चना की जाती है। 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार माता दुर्गा की कृपा प्राप्ति का का सबसे सरल उपाय दुर्गा सप्तशती का पाठ है। नवरात्र में माँ के कलश स्थापना के साथ शतचंडी, नवचंडी, दुर्गा सप्तशती, देवी अथर्वशीर्ष आदि का पाठ किया जाता है। दुर्गा सप्तशती महर्षि वेदव्यास रचित मार्कण्डेय पुराण के सावर्णि मन्वतर के देवी महात्म्य के सात सौ श्लोक का एक भाग है। 
दुर्गा सप्तशती में कुछ ऐसे परम शक्तिशाली और दुर्लभ स्तोत्र एवं मंत्र हैं, जिनके विधिवत पारायण से मनुष्य की समस्त इच्छित मनोकामना की अवश्य ही पूर्ति होती है। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार साधक को अपनी आवश्यकता के अनुसार माँ के दिव्य मन्त्र का चयन करके नित्य उसकी 5 माला या कम से कम एक माला का जाप तो अवश्य करना ही चाहिए ।
जीवन में सर्वकल्याण एवं शुभ फलो की प्राप्ति के लिए अत्यंत प्रभावशाली मन्त्र:-
सर्व मंगलं मांगल्ये शिवे सर्वाथ साधिके।
शरण्येत्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुऽते॥  
जीवन में किसी भी तरह की बाधा से मुक्ति एवं सुख समृद्धि एवं योग्य संतान की प्राप्ति के लिए :-
सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो धन धान्य सुतान्वितः।
मनुष्यों मत्प्रसादेन भवष्यति न संशय॥
जीवन में सर्वबाधा की शांति के लिए :-
सर्वाबाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्दैरिविनाशनम्।। 
आरोग्य एवं सौभाग्य प्राप्ति के लिए चमत्कारिक मन्त्र इस दिव्य मंत्र को देवी दुर्गा ने स्वयं देवताओं को दिया है:-
देहि सौभाग्यं आरोग्यं देहि में परमं सुखम्‌। 
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषोजहि॥ 
माँ के चरणो में स्थान पाने के लिए मोक्ष प्राप्ति के लिए:-
त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या।
विश्वस्य बीजं परमासि माया।।
सम्मोहितं देवि समस्तमेतत्।
त्वं वैप्रसन्ना भुवि मुक्त हेतु:।। 
जीवन में शक्ति एवं सम्पन्नता प्राप्ति के लिए :-सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि।
गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोह्यस्तु ते।। 
सभी प्रकार के संकटो से रक्षा का मंत्र:-
शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके।
घण्टास्वनेन न: पाहि चापज्यानि: स्वनेन च।। 
समस्त रोगो के नाश के लिए चमत्कारी मंत्र:- 
रोगान शेषान पहंसि तुष्टा रूष्टा तु कामान सकलानभीष्टान्।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता हाश्रयतां प्रयान्ति।। 
समस्त दु:ख और दरिद्रता के नाश के लिए:-
दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तो:।
स्वस्थै स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।।
द्रारिद्र दु:ख भयहारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकारकारणाय सदाह्यह्यद्र्रचिता।। 
जीवन में सभी तरह के सुख सौभाग्य, ऐश्वर्य, आरोग्य, धन संपदा एवं शत्रु भय मुक्ति-मोक्ष के लिए - 
ऐश्वर्य यत्प्रसादेन सौभाग्य-आरोग्य सम्पदः।
शत्रु हानि परो मोक्षः स्तुयते सान किं जनै॥ 
किसी भी तरह के भय के नाश के लिए दुर्गा मंत्र :- 
सर्व स्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्ति समन्विते।
भयेभ्यास्त्रहिनो देवी दुर्गे देवी नमोस्तुते।। 
स्वप्न में अपने कार्यों के फलो को जानने के लिए मन्त्र :-
दुर्गे देवि नमस्तुभ्यं सर्वकामार्थ साधिके।
मम सिद्घिमसिद्घिं वा स्वप्ने सर्व प्रदर्शय।। 
लेखक - Pandit Anjani Kumar Dadhich
पंडित अंजनी कुमार दाधीच
Nakshatra jyotish Hub
नक्षत्र ज्योतिष हब
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Friday, 28 January 2022

टाइगर स्टोन

टाइगर स्टोन
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार टाइगर स्टोन उस व्यक्ति को गजब का आत्मविश्वास प्रदान करता है जो व्यक्ति आत्मविश्वास की कमी के कारण बार-बार व्यवसाय और अन्य कार्यों में असफल होकर  दुखी जीवन व्यतीत कर रहा है साथ ही वह अपने आप को डरपोक, उदासीन महसूस कर रहा है तो ऐसे व्यक्ति को टाइगर के समान पीली एवं काली धारियां वाला टाइगर स्टोन नामक रत्न धारण करना चाहिए। इस रत्न में पीली एवं काली धारियां होने के कारण इसे टाइगर स्टोन कहते हैं। टाइगर स्टोन को ही टाइगर आई के नाम से जाना जाता है। टाइगर स्टोन को धारण करने वाले व्यक्ति साहसी एवं पुरुषार्थी बन जाते हैं और उनको हर कार्य में पूर्ण सफलता मिलती है। शेर जैसा आत्मबल और साहस भी यह रत्न प्रदान करने में सक्षम है।

Thursday, 13 January 2022

पुत्रदा एकादशी

पुत्रदा एकादशी 
प्रिय पाठकों, 
13 जनवरी 2022, गुरुवार
मैं पंडित अंजनी कुमार दाधीच आज पुत्रदा एकादशी के बारे में यहाँ जानकारी दे रहा हूँ।

पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार आज 13 जनवरी 2022 गुरुवार को सनातन धर्म के पंचांग के आधार पर पौष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है। पौष मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी के नाम से भी जाना जाता हैं। इसके अलावा इस एकादशी को वैकुण्ठ एकादशी और मुक्कोटी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।  
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार धार्मिक शास्त्रों में योग्य संतान की प्राप्ति के लिए इस व्रत को उत्तम माना जाता है। कहते हैं कि इस व्रत के प्रभाव से संतान को संकटों से मुक्ति मिलती है।
पौष पुत्रदा एकादशी के दिन भगवान विष्णु के साथ-साथ लड्डू गोपाल की पूजा अवश्य करनी चाहिए। लड्डू गोपाल का गंगाजल,पंचामृत में तुलसीदल डालकर अभिषेक कराना चाहिए। केसर, कुमकुम, मोली, अक्षत,पीले पुष्प प्रसाद और पुष्पमाला आदि लड्डू गोपाल को अर्पित कर पूजा करे। ऐसा करने से आपकी संतान से संबंधित सभी समस्याएं दूर हो जाती हैं।
पुत्रदा एकादशी के दिन निम्नलिखित उपाय भी करना चाहिए -
☞ पुत्रदा एकादशी के दिन संतान गोपाल सहस्रनाम का पाठ करने से संतान सुख की प्राप्ति तथा संतान संबंधित कष्ट दूर होते हैं।
☞ पुत्रदा एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा कर विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र का पाठ भी करना चाहिए। जिससे घर में शांति और सुख समृद्धि आदि बनी रहती है।
लेखक - Pandit Anjani Kumar Dadhich
पंडित अंजनी कुमार दाधीच
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Wednesday, 12 January 2022

श्रीगणेश सहस्त्रनाम स्तोत्र

श्रीगणेश सहस्त्रनाम स्तोत्र 
प्रिय पाठकों, 
12 जनवरी 2022, बुधवार
मैं पंडित अंजनी कुमार दाधीच आज श्रीगणेश सहस्त्रनाम स्तोत्र के बारे में यहाँ जानकारी दे रहा हूँ।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार किसी भी शुक्ल पक्ष के बुधवार के दिन से शुरू करके प्रत्येक दिन श्रीगणेश सहस्त्रनाम स्तोत्र का पाठ करने से आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, धैर्य, शौर्य, बल, यश, बुद्धि, कांति, सौभाग्य, रूप-सौंदर्य, संसार को वशीकरण करने की शक्ति, शास्त्रार्थ में निपुणता, उच्च कोटि की वाक शक्ति, शील, वीर्य, धन-धान्य की वृद्धि आदि प्राप्त होते हैं।
इसके अलावा श्रीगणेश सहस्त्रनाम का पाठ करने से कुंडली के दोष, वास्तु दोष, पितृ दोष आदि शांत होते हैं और परेशानियां कम होने लगती हैं।
श्री गणेश सहस्त्रनामावली
॥ॐ गणपतये नमः ॥ ॐ गणेश्वराय नमः ॥ ॐ गणक्रीडाय नमः ॥
ॐ गणनाथाय नमः ॥ ॐ गणाधिपाय नमः ॥ ॐ एकदंष्ट्राय नमः ॥
ॐ वक्रतुण्डाय नमः ॥ ॐ गजवक्त्राय नमः ॥ ॐ मदोदराय नमः ॥
ॐ लम्बोदराय नमः ॥ ॐ धूम्रवर्णाय नमः ॥ ॐ विकटाय नमः ॥
ॐ विघ्ननायकाय नमः ॥ ॐ सुमुखाय नमः ॥ ॐ दुर्मुखाय नमः ॥ॐ बुद्धाय नमः ॥ ॐ विघ्नराजाय नमः ॥ ॐ गजाननाय नमः ॥
ॐ भीमाय नमः ॥ ॐ प्रमोदाय नमः ॥ ॐ आनन्दाय नमः ॥
ॐ सुरानन्दाय नमः ॥ ॐ मदोत्कटाय नमः ॥ ॐ हेरम्बाय नमः॥
ॐ शम्बराय नमः ॥ ॐ शम्भवे नमः ॥ ॐ लम्बकर्णाय नमः ॥
ॐ महाबलाय नमः ॥ ॐ नन्दनाय नमः ॥ ॐ अलम्पटाय नमः ॥
ॐ भीमाय नमः ॥ ॐ मेघनादाय नमः ॥ ॐ गणञ्जयाय नमः ॥
ॐ विनायकाय नमः ॥ ॐ विरूपाक्षाय नमः ॥ ॐ धीराय नमः ॥
ॐ शूराय नमः ॥ ॐ वरप्रदाय नमः ॥ ॐ महागणपतये नमः ॥
ॐ बुद्धिप्रियाय नमः ॥ ॐ क्षिप्रप्रसादनाय नमः ॥ ॐ रुद्रप्रियाय नमः ॥
ॐ गणाध्यक्षाय नमः ॥ ॐ उमापुत्राय नमः ॥ ॐ अघनाशनाय नमः ॥
 ॐ कुमारगुरवे नमः ॥ ॐ ईशानपुत्राय नमः ॥ ॐ मूषकवाहनाय नः ॥
ॐ सिद्धिप्रदाय नमः ॥ ॐ सिद्धिपतये नमः ॥ ॐ सिद्ध्यै नमः ॥
ॐ सिद्धिविनायकाय नमः ॥ ॐ विघ्नाय नमः ॥ ॐ तुङ्गभुजाय नमः ॥
ॐ सिंहवाहनाय नमः ॥ ॐ मोहिनीप्रियाय नमः ॥ ॐ कटिंकटाय नमः ॥
ॐ राजपूत्राय नमः ॥ ॐ शकलाय नमः ॥ ॐ सम्मिताय नमः ॥ॐ अमिताय नमः ॥ ॐ कूश्माण्डगणसम्भूताय नमः ॥ ॐ दुर्जयाय नमः ॥
ॐ धूर्जयाय नमः ॥ ॐ अजयाय नमः ॥ ॐ भूपतये नमः ॥
ॐ भुवनेशाय नमः ॥ ॐ भूतानां पतये नमः ॥ ॐ अव्ययाय नमः ॥
ॐ विश्वकर्त्रे नमः ॥ ॐ विश्वमुखाय नमः ॥ ॐ विश्वरूपाय नमः ॥
ॐ निधये नमः ॥ ॐ घृणये नमः ॥ ॐ कवये नमः ॥
 ॐ कवीनामृषभाय नमः ॥ ॐ ब्रह्मण्याय नमः ॥ ॐ ब्रह्मणस्पतये नमः ॥
ॐ ज्येष्ठराजाय नमः ॥ ॐ निधिपतये नमः ॥ ॐ निधिप्रियपतिप्रियाय नमः ॥
ॐ हिरण्मयपुरान्तस्थाय नमः ॥ ॐ सूर्यमण्डलमध्यगाय नमः
॥ ॐ कराहतिध्वस्तसिन्धुसलिलाय नमः ॥ ॐ पूषदन्तभृते नमः ॥
ॐ उमाङ्गकेळिकुतुकिने नमः ॥ ॐ मुक्तिदाय नमः ॥ ॐ कुलपालकाय नमः ॥ॐ किरीटिने नमः ॥ ॐ कुण्डलिने नमः ॥ ॐ हारिणे नमः ॥ ॐ वनमालिने नमः ॥
ॐ मनोमयाय नमः ॥ ॐ वैमुख्यहतदृश्यश्रियै नमः ॥ ॐ पादाहत्याजितक्षितये नमः ॥
ॐ सद्योजाताय नमः ॥ ॐ स्वर्णभुजाय नमः ॥ ॐ मेखलिन नमः ॥
ॐ दुर्निमित्तहृते नमः ॥ ॐ दुस्स्वप्नहृते नमः ॥ ॐ प्रहसनाय नमः ॥
ॐ गुणिने नमः ॥ ॐ नादप्रतिष्ठिताय नमः ॥ ॐ सुरूपाय नमः ॥ॐ सर्वनेत्राधिवासाय नमः ॥ ॐ वीरासनाश्रयाय नमः ॥ ॐ पीताम्बराय नमः ॥
ॐ खड्गधराय नमः ॥ ॐ खण्डेन्दुकृतशेखराय नमः ॥
ॐ चित्राङ्कश्यामदशनाय नमः ॥ ॐ फालचन्द्राय नमः ॥ ॐ चतुर्भुजाय नमः ॥
ॐ योगाधिपाय नमः ॥ ॐ तारकस्थाय नमः ॥ ॐ पुरुषाय नमः ॥
ॐ गजकर्णकाय नमः ॥ ॐ गणाधिराजाय नमः ॥ ॐ विजयस्थिराय नमः ॥
ॐ गणपतये नमः ॥ ॐ ध्वजिने नमः ॥ 
ॐ देवदेवाय नमः ॥
ॐ स्मरप्राणदीपकाय नमः ॥
 ॐ वायुकीलकाय नमः ॥ ॐ विपश्चिद्वरदाय नमः ॥
ॐ नादाय नमः ॥ ॐ नादभिन्नवलाहकाय नमः ॥ ॐ वराहवदनाय नमः ॥
ॐ मृत्युञ्जयाय नमः ॥ 
ॐ व्याघ्राजिनाम्बराय नमः ॥ 
ॐ इच्छाशक्तिधराय नमः ॥
ॐ देवत्रात्रे नमः ॥ ॐ दैत्यविमर्दनाय नमः ॥ ॐ शम्भुवक्त्रोद्भवाय नमः ॥
ॐ शम्भुकोपघ्ने नमः ॥ ॐ शम्भुहास्यभुवे नमः ॥ ॐ शम्भुतेजसे नमः ॥
ॐ शिवाशोकहारिणे नमः ॥ ॐ गौरीसुखावहाय नमः ॥ ॐ उमाङ्गमलजाय नमः ॥
ॐ गौरीतेजोभुवे नमः ॥ ॐ स्वर्धुनीभवाय नमः ॥ ॐ यज्ञकायाय नमः ॥
ॐ महानादाय नमः ॥ ॐ गिरिवर्ष्मणे नमः ॥ ॐ शुभाननाय नमः ॥
ॐ सर्वात्मने नमः ॥ ॐ सर्वदेवात्मने नमः ॥ ॐ ब्रह्ममूर्ध्ने नमः ॥ॐ ककुप्छ्रुतये नमः ॥ ॐ ब्रह्माण्डकुम्भाय नमः ॥ ॐ चिद्व्योमफालाय नमः ॥
ॐ सत्यशिरोरुहाय नमः ॥ ॐ जगज्जन्मलयोन्मेषनिमेषाय नमः ॥
ॐ अग्न्यर्कसोमदृशे नमः ॥ ॐ गिरीन्द्रैकरदाय नमः ॥ ॐ धर्माय नमः ॥
ॐ धर्मिष्ठाय नमः ॥ ॐ सामबृंहिताय नमः ॥ ॐ ग्रहर्क्षदशनाय नमः ॥
ॐ वाणीजिह्वाय नमः ॥ ॐ वासवनासिकाय नमः ॥ ॐ कुलाचलांसाय नमः ॥ॐ सोमार्कघण्टाय नमः ॥ ॐ रुद्रशिरोधराय नमः ॥ ॐ नदीनदभुजाय नमः ॥
ॐ सर्पाङ्गुळिकाय नमः ॥ ॐ तारकानखाय नमः ॥ ॐ भ्रूमध्यसंस्थतकराय नमः ॥
ॐ ब्रह्मविद्यामदोत्कटाय नमः ॥ ॐ व्योमनाभाय नमः ॥ ॐ श्रीहृदयाय नमः ॥
ॐ मेरुपृष्ठाय नमः ॥ ॐ अर्णवोदराय नमः ॥
ॐ कुक्षिस्थयक्षगन्धर्वरक्षः किन्नरमानुषाय नमः ॥
।। इति समाप्त ।।
लेखक - Pandit Anjani Kumar Dadhich
पंडित अंजनी कुमार दाधीच
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Tuesday, 11 January 2022

हनुमान वडवानल स्तोत्र

11 जनवरी 2022, मंगलवार
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार लंकापति रावण के छोटे भाई विभीषण ने हनुमानजी की  स्तुति करते हुए एक स्तोत्र की रचना की जो हनुमान वडवानल स्तोत्र के नाम से विख्यात हैं। 
इस स्तोत्र के पाठ करने से बड़ी-से-बड़ी विपत्ति या संकट,शत्रु-बाधा, सभी प्रकार के तंत्र-मंत्र, बंधन, प्रयोग, भूत-बाधा आदि नष्ट हो जाते है और हनुमान जी के कृपा से सुख-सम्पत्ति की भी वृद्धि होती है।
किसी भी शुक्ल पक्ष के मंगलवार या शनिवार को प्रात:काल उठकर नित्य कर्म करके स्नान के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करने के बाद पूजा स्थल को शुद्ध कर एक चौकी पर लाल आसन पर हनुमानजी, गणेश जी, भगवान श्रीराम और माता जानकी की मूर्ति या चित्र को रखकर सामने आसन पर बैठकर पंचोपचार पूजन विधि से सबसे पहले गणेश जी भगवान श्रीराम और माता जानकी उसके बाद हनुमान जी की पूजा करते हुए सरसों के तेल का दीपक जलाकर हनुमानजी के सम्मुख रखना चाहिए।
उसके बाद हनुमान वडवानल स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। यह पाठ लगातार 41 दिनों तक करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। इन 41 दिनों तक ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए और सात्विक भोजन करने के साथ-साथ सभी प्रकार के व्यभिचार से दूर रहना चाहिए।

विनियोग:- ॐ अस्य श्री हनुमान् वडवानल-स्तोत्र मन्त्रस्य श्रीरामचन्द्र ऋषि:, श्रीहनुमान् वडवानल देवता, ह्रां बीजम्, ह्रीं शक्तिं, सौं कीलकं, मम समस्त विघ्न-दोष निवारणार्थे, सर्व-शत्रुक्षयार्थे सकल- राज- कुल- संमोहनार्थे, मम समस्त- रोग प्रशमनार्थम् आयुरारोग्यैश्वर्याऽभिवृद्धयर्थं समस्त- पाप-क्षयार्थं श्रीसीतारामचन्द्र-प्रीत्यर्थं च हनुमद् वडवानल-स्तोत्र जपमहं करिष्ये।

ध्यान:- मनोजवं मारुत-तुल्य-वेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं वातात्मजं वानर-यूथ-मुख्यं श्रीरामदूतम् शरणं प्रपद्ये।।

वडवानल स्तोत्र :- ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते श्रीमहा-हनुमते प्रकट-पराक्रम सकल- दिङ्मण्डल- यशोवितान- धवलीकृत- जगत-त्रितय वज्र-देह रुद्रावतार लंकापुरीदहय उमा-अर्गल-मंत्र उदधि-बंधन दशशिर: कृतान्तक सीताश्वसन वायु-पुत्र अञ्जनी-गर्भ-सम्भूत श्रीराम-लक्ष्मणानन्दकर कपि-सैन्य-प्राकार सुग्रीव-साह्यकरण पर्वतोत्पाटन कुमार- ब्रह्मचारिन् गंभीरनाद सर्व- पाप- ग्रह- वारण- सर्व- ज्वरोच्चाटन डाकिनी- शाकिनी- विध्वंसन ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते महावीर-वीराय सर्व-दु:ख निवारणाय ग्रह-मण्डल सर्व-भूत-मण्डल सर्व-पिशाच-मण्डलोच्चाटन भूत-ज्वर-एकाहिक-ज्वर, द्वयाहिक-ज्वर, त्र्याहिक-ज्वर चातुर्थिक-ज्वर, संताप-ज्वर, विषम-ज्वर, ताप-ज्वर, माहेश्वर-वैष्णव-ज्वरान् छिन्दि-छिन्दि यक्ष ब्रह्म-राक्षस भूत-प्रेत-पिशाचान् उच्चाटय-उच्चाटय स्वाहा ।

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते श्रीमहा-हनुमते ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्र: आं हां हां हां हां ॐ सौं एहि एहि ॐ हं ॐ हं ॐ हं ॐ हं ॐ नमो भगवते श्रीमहा-हनुमते श्रवण-चक्षुर्भूतानां शाकिनी डाकिनीनां विषम-दुष्टानां सर्व-विषं हर हर आकाश-भुवनं भेदय भेदय छेदय छेदय मारय मारय शोषय शोषय मोहय मोहय ज्वालय ज्वालय प्रहारय प्रहारय शकल-मायां भेदय भेदय स्वाहा।

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते महा-हनुमते सर्व-ग्रहोच्चाटन परबलं क्षोभय क्षोभय सकल-बंधन मोक्षणं कुर-कुरु शिर:-शूल गुल्म-शूल सर्व-शूलान्निर्मूलय निर्मूलय नागपाशानन्त- वासुकि- तक्षक- कर्कोटकालियान् यक्ष-कुल-जगत-रात्रिञ्चर-दिवाचर-सर्पान्निर्विषं कुरु-कुरु स्वाहा।

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते महा-हनुमते राजभय चोरभय पर-मन्त्र-पर-यन्त्र-पर-तन्त्र पर-विद्याश्छेदय छेदय सर्व-शत्रून्नासय नाशय असाध्यं साधय साधय हुं फट् स्वाहा।

लेखक - Pandit Anjani Kumar Dadhich
पंडित अंजनी कुमार दाधीच
Nakshatra jyotish Hub
नक्षत्र ज्योतिष हब
Panditanjanikumardadhich@gmail.com
Phone No-6377054504,9414863294
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार लंकापति रावण के छोटे भाई विभीषण ने हनुमानजी की  स्तुति करते हुए एक स्तोत्र की रचना की जो हनुमान वडवानल स्तोत्र के नाम से विख्यात हैं। 
इस स्तोत्र के पाठ करने से बड़ी-से-बड़ी विपत्ति या संकट,शत्रु-बाधा, सभी प्रकार के तंत्र-मंत्र, बंधन, प्रयोग, भूत-बाधा आदि नष्ट हो जाते है और हनुमान जी के कृपा से सुख-सम्पत्ति की भी वृद्धि होती है।
किसी भी शुक्ल पक्ष के मंगलवार या शनिवार को प्रात:काल उठकर नित्य कर्म करके स्नान के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करने के बाद पूजा स्थल को शुद्ध कर एक चौकी पर लाल आसन पर हनुमानजी, गणेश जी, भगवान श्रीराम और माता जानकी की मूर्ति या चित्र को रखकर सामने आसन पर बैठकर पंचोपचार पूजन विधि से सबसे पहले गणेश जी भगवान श्रीराम और माता जानकी उसके बाद हनुमान जी की पूजा करते हुए सरसों के तेल का दीपक जलाकर हनुमानजी के सम्मुख रखना चाहिए।
उसके बाद हनुमान वडवानल स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। यह पाठ लगातार 41 दिनों तक करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। इन 41 दिनों तक ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए और सात्विक भोजन करने के साथ-साथ सभी प्रकार के व्यभिचार से दूर रहना चाहिए।

विनियोग:- ॐ अस्य श्री हनुमान् वडवानल-स्तोत्र मन्त्रस्य श्रीरामचन्द्र ऋषि:, श्रीहनुमान् वडवानल देवता, ह्रां बीजम्, ह्रीं शक्तिं, सौं कीलकं, मम समस्त विघ्न-दोष निवारणार्थे, सर्व-शत्रुक्षयार्थे सकल- राज- कुल- संमोहनार्थे, मम समस्त- रोग प्रशमनार्थम् आयुरारोग्यैश्वर्याऽभिवृद्धयर्थं समस्त- पाप-क्षयार्थं श्रीसीतारामचन्द्र-प्रीत्यर्थं च हनुमद् वडवानल-स्तोत्र जपमहं करिष्ये।

ध्यान:- मनोजवं मारुत-तुल्य-वेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं वातात्मजं वानर-यूथ-मुख्यं श्रीरामदूतम् शरणं प्रपद्ये।।

वडवानल स्तोत्र :- ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते श्रीमहा-हनुमते प्रकट-पराक्रम सकल- दिङ्मण्डल- यशोवितान- धवलीकृत- जगत-त्रितय वज्र-देह रुद्रावतार लंकापुरीदहय उमा-अर्गल-मंत्र उदधि-बंधन दशशिर: कृतान्तक सीताश्वसन वायु-पुत्र अञ्जनी-गर्भ-सम्भूत श्रीराम-लक्ष्मणानन्दकर कपि-सैन्य-प्राकार सुग्रीव-साह्यकरण पर्वतोत्पाटन कुमार- ब्रह्मचारिन् गंभीरनाद सर्व- पाप- ग्रह- वारण- सर्व- ज्वरोच्चाटन डाकिनी- शाकिनी- विध्वंसन ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते महावीर-वीराय सर्व-दु:ख निवारणाय ग्रह-मण्डल सर्व-भूत-मण्डल सर्व-पिशाच-मण्डलोच्चाटन भूत-ज्वर-एकाहिक-ज्वर, द्वयाहिक-ज्वर, त्र्याहिक-ज्वर चातुर्थिक-ज्वर, संताप-ज्वर, विषम-ज्वर, ताप-ज्वर, माहेश्वर-वैष्णव-ज्वरान् छिन्दि-छिन्दि यक्ष ब्रह्म-राक्षस भूत-प्रेत-पिशाचान् उच्चाटय-उच्चाटय स्वाहा ।

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते श्रीमहा-हनुमते ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्र: आं हां हां हां हां ॐ सौं एहि एहि ॐ हं ॐ हं ॐ हं ॐ हं ॐ नमो भगवते श्रीमहा-हनुमते श्रवण-चक्षुर्भूतानां शाकिनी डाकिनीनां विषम-दुष्टानां सर्व-विषं हर हर आकाश-भुवनं भेदय भेदय छेदय छेदय मारय मारय शोषय शोषय मोहय मोहय ज्वालय ज्वालय प्रहारय प्रहारय शकल-मायां भेदय भेदय स्वाहा।

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते महा-हनुमते सर्व-ग्रहोच्चाटन परबलं क्षोभय क्षोभय सकल-बंधन मोक्षणं कुर-कुरु शिर:-शूल गुल्म-शूल सर्व-शूलान्निर्मूलय निर्मूलय नागपाशानन्त- वासुकि- तक्षक- कर्कोटकालियान् यक्ष-कुल-जगत-रात्रिञ्चर-दिवाचर-सर्पान्निर्विषं कुरु-कुरु स्वाहा।

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते महा-हनुमते राजभय चोरभय पर-मन्त्र-पर-यन्त्र-पर-तन्त्र पर-विद्याश्छेदय छेदय सर्व-शत्रून्नासय नाशय असाध्यं साधय साधय हुं फट् स्वाहा।

लेखक - Pandit Anjani Kumar Dadhich
पंडित अंजनी कुमार दाधीच
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Monday, 10 January 2022

शिव रक्षा स्तोत्र

शिव रक्षा स्तोत्र 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार अगर कोई भी व्यक्ति अपने आपको और अपने परिवार को किसी भी प्रकार की कठिनाईयों, बुरी शक्तियों, रोगों, दुर्घटनाओं और दरिद्रता आदि से रक्षा करना चाहता है तो उसे प्रत्येक सोमवार को शिव रक्षा स्तोत्र का पाठ करना चाहिए।शिव रक्षा स्तोत्र के रचयिता याज्ञवल्क्य ऋषि हैं। भगवान विष्णु ने याज्ञवल्क्य ऋषि के सपने में आकर इस स्तोत्र का वर्णन किया था। इसे शिव रक्षा कवच स्तोत्र या शिव अभयंकर कवच के नाम से भी जाना जाता है।
॥ श्री शिव रक्षा स्तोत्र ॥
॥ ओम् गं गणपतये नमः॥
श्री सदाशिवो देवता ॥ अनुष्टुप् छन्दः ।
श्रीसदाशिवप्रीत्यर्थं शिवरक्षास्तोत्रजपे विनियोगः ॥
चरितं देवदेवस्य महादेवस्य पावनम् ।
अपारं परमोदारं चतुर्वर्गस्य साधनम् ॥ १॥
गौरीविनायकोपेतं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रकम् ।
शिवं ध्यात्वा दशभुजं शिवरक्षां पठेन्नरः ॥ २॥
गंगाधरः शिरः पातु भालं अर्धेन्दुशेखरः ।
नयने मदनध्वंसी कर्णो सर्पविभूषण ॥ ३॥
घ्राणं पातु पुरारातिः मुखं पातु जगत्पतिः ।
जिह्वां वागीश्वरः पातु कंधरां शितिकंधरः ॥ ४॥
श्रीकण्ठः पातु मे कण्ठं स्कन्धौ विश्वधुरन्धरः ।
भुजौ भूभारसंहर्ता करौ पातु पिनाकधृक् ॥ ५॥
हृदयं शंकरः पातु जठरं गिरिजापतिः एक़़ 3
नाभिं मृत्युञ्जयः पातु कटी व्याघ्राजिनाम्बरः ॥ ६॥
सक्थिनी पातु दीनार्तशरणागतवत्सलः ।
उरू महेश्वरः पातु जानुनी जगदीश्वरः ॥ ७॥
जङ्घे पातु जगत्कर्ता गुल्फौ पातु गणाधिपः ।
चरणौ करुणासिंधुः सर्वाङ्गानि सदाशिवः ॥ ८॥
एतां शिवबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत् ।
स भुक्त्वा सकलान्कामान् शिवसायुज्यमाप्नुयात् ॥ ९॥
ग्रहभूतपिशाचाद्यास्त्रैलोक्ये विचरन्ति ये ।
दूरादाशु पलायन्ते शिवनामाभिरक्षणात् ॥ १० ॥
अभयङ्करनामेदं कवचं पार्वतीपतेः ।
भक्त्या बिभर्ति यः कण्ठे तस्य वश्यं जगत्त्रयम् ॥ ११॥
इमां नारायणः स्वप्ने शिवरक्षां यथाऽऽदिशत् ।
प्रातरुत्थाय योगीन्द्रो याज्ञवल्क्यः तथाऽलिखत् ॥ १२॥
॥ इति शिव रक्षा स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
अस्य श्रीशिवरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य याज्ञवल्क्य ऋषिः ।