google24482cba33272f17.html Pandit Anjani Kumar Dadhich

Friday, 5 January 2024

आर अक्षर वाले

R अक्षर वाले 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार R अक्षर से शुरु होने वाले व्यक्ति के स्वभाव की विशेषताएं निम्नलिखित है-
⁠✿ अगर जिसका नाम R से शुरू होता है तो आप स्वभाव से खुशमिजाज और हंसमुख हैं।
✿ R अक्षर के नाम वाले लोग बहुत ही लोकप्रिय और प्रतिष्ठित होते हैं। 
✿ R अक्षर वालो को समाज में खूब प्यार और सम्मान मिलता है।
✿ R अक्षर वाले अपने अनोखे व्यक्तित्व गुणों के लिए जाने जाते हैं जो उन्हें भीड़ से अलग करते हैं।
✿ R अक्षर वाले रचनात्मक, आकर्षक और जीवन के प्रति उत्साह रखने वाले होते हैं।
✿ R अक्षर वाले व्यक्तियों में जबरदस्त मेहनत करने की क्षमता होती है जिसकी वजह से आप  जीवन में सफल हो जाते हैं  और अपना एक विशिष्ट नाम भी बनाते हैं। 
✿ R अक्षर वालो के अंदर किसी भी नए काम को सीखने की इच्छा भी प्रबल होती है।
✿ R अक्षर वाले आमतौर पर काफी रोमांटिक और वफादार होते हैं। 
✿ R अक्षर वाली लड़कियां अपने जीवनसाथी का चुनाव भी बहुत सोच समझकर करती हैं।
✿ R अक्षर वाले अपने साथी को प्यार और दुलार महसूस कराने के लिए अतिरिक्त काम करते हैं।
✿ R अक्षर वाले पारिवारिक रिश्तों में ईमानदारी और पारदर्शिता को महत्व देते हैं और साथ ही विश्वास और आपसी सम्मान के आधार पर मजबूत संबंध बनाने में विश्वास करते हैं।
✿ R अक्षर वाली लड़कियां काफी सोच समझकर फैसले करने वाली होती हैं। यह लड़कियां अपने फैसले दिल से नहीं दिमाग से लेती हैं और इसलिए उनके फैसले अधिकतर सही साबित होते हैं।
✿ R अक्षर के नाम वाली लड़कियो को लग्जरी लाइफ पसंद होती है और वो महंगी चीजों का शौक रखती हैं।
✿ R अक्षर वाली लड़कियो का स्वाभाव कुछ कंजूसी वाला होता है। हालांकि ये अपने ऊपर दिल खोलकर खर्च करती हैं लेकिन दूसरों पर खर्च करने के मामले में कंजूसी करना इनकी आदत होती है।
✿ R अक्षर वालो का गुस्सा खतरनाक होता है। अगर एक बार ये किसी से नाराज हो जाने पर आसानी से मानती नहीं हैं। इन्हें गुस्सा भी जल्दी आता है और इसके कारण इन्हें नुकसान भी उठाना पड़ता है।
✿ R अक्षर वाले व्यक्ति बहुत ही क्रियेटिव होते है।

ओपल

ओपल रत्न और उसका विश्लेषण 
प्रिय पाठकों
05 जनवरी 2024, शुक्रवार 
मैं पंडित अंजनी कुमार दाधीच आज इस लेख में ओपल रत्न और उसके ज्योतिषीय विश्लेषण के बारे में कुछ जानकारी दे रहा हूं।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार ज्योतिष शास्त्र में हर ग्रह के प्रतिनिधित्नव रत्न के बारे में बताया गया है। प्रत्येक व्यक्ति को रत्न अपनी राशि और ज्योतिष अनुसार ही रत्न धारण करना चाहिए। दापंत्य जीवन, प्रेम, सौंदर्य, आकर्षण और भोतिक सुख-सुविधाओं के ग्रह है शुक्र और इनका प्रतिनिधि रत्न हीरा है। लेकिन कई बार रत्न के बजाय उसका काम उपरत्न भी कर देते हैं जो रत्न के बजाय कम कीमत के होकर भी रत्न का काम कर देते हैं। हीरे रत्न के उपरत्न का नाम ओपल है।
ओपल एक बहुत शक्तिशाली रत्न है। ओपल रत्न अपने चांद जैसे सफेद रंग के लिए प्रसिद्ध है और यह कई रंगों में पाया जाता है जैसे की काला, नीला, सफ़ेद, पीला, और स्लेटी और कई ओपल पत्थरों की सतह पर इंद्रधनुषी रंग दिखाई देते हैं जो उनकी सुंदरता में चार चांद लगाते हैं। इसलिए प्राचीन काल से ही इस रत्न का उपयोग आभूषण और सजावटी सामान बनाने में किया जाता रहा है।
ओपल रत्न पहनने के लाभ✿✿
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार ओपल रत्न पहनने से होने वाले लाभ निम्नलिखित हैं -
✿ ओपल रत्न का स्वामी या संबंध शुक्र ग्रह है जो प्रेम और सौंदर्य का ग्रह माना जाता है। यदि आपकी जन्म कुंडली में शुक्र की महादशा चल रही है तो आपको इसके नकारात्मक प्रभावों को कम करने के लिए ओपल रत्न को अवश्य धारण करना चाहिए।
✿ ओपल रत्न वैदिक ज्योतिष और चिकित्सा ज्योतिष में अपना महत्वपूर्ण महत्व रखता है। यह रत्न धारण करने से विभिन्न लाभों की प्राप्ति होती है।इस रत्न को सफलता और प्रतिष्ठा प्रदान करने की अपनी शक्ति के लिए भी जाना जाता है। 
✿ ज्योतिषीय प्रभाव बढ़ाने से लेकर भावनात्मक उपचार, रचनात्मकता उत्तेजना और रिश्ते को मजबूत करने तक, ओपल एक ऐसा रत्न है जो कई फायदे प्रदान करता है। इसकी शक्ति का उपयोग करके व्यक्ति अपना और समाज कल्याण की ओर रुख कर सकता है एवं अपने पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों में भी सुधार ला सकता है और व्यक्ति अपने गहरे संबंध का अनुभव कर सकता है।
✿ ओपल रत्न आंतरिक शांति, आत्मविश्वास और सकारात्मकता की भावना को बढ़ावा देता है और साथ ही यह व्यक्तियों को चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों से शालीनता से निपटने में सक्षम बनाता है। 
✿ इन सब के अलावा प्राकृतिक ओपल रत्न इसे पहनने वाले व्यक्ति को जो लाभ प्रदान करता है वह इस प्रकार है -
✿ ओपल रत्न पहनने के ज्योतिषीय लाभ 
यह रत्न अपने पहनने वाले के लिए प्रेम, सौंदर्य, रचनात्मकता और विलासिता लाता है। ओपल धारण करके व्यक्ति अपने जीवन में शुक्र के सकारात्मक प्रभाव को मजबूत कर सकते हैं। यह ओपल रत्न प्यार और सौहार्दपूर्ण रिश्तों को आकर्षित करता है और इंसान के जीवन में समृद्धि लाता है।
✿ ओपल पहनने वाले की समझ, सहानुभूति और संचार करने की क्षमता को बढ़ावा देता है।
✿ ओपल पहनने वाले व्यक्ति को यह एक स्वस्थ और पूर्ण संबंध बनाने में भी मदद करता है। यह वफादारी को बढ़ाता है और लंबे समय तक चलने वाली साझेदारी के लिए एक मजबूत आधार तैयार करता है। ओपल संतुलन और सद् भाव का पत्थर है।
✿ पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार यह रत्न शरीर में ऊर्जा केंद्रों (चक्रों) को संतुलित करता है जिससे समग्र कल्याण को बढ़ावा मिलता है। ओपल भावनात्मक, मानसिक और आध्यात्मिक पहलुओं को संरेखित और संतुलित करता है। जिससे संपूर्णता और संतुलन की भावना आती है। यह पूरे शरीर में सकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह को सुविधाजनक बनाता है, साथ ही जीवन शक्ति की भावना का पोषण करता है।
✯⁠✯पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार ओपल रत्न धारण करने से न केवल ज्योतिषीय लाभ मिलते है बल्कि कई चिकित्सीय लाभ भी है जो निम्नलिखित हैं 
✯⁠ ओपल की शक्ति विभिन्न शारीरिक समस्यायों का उपचार कर सकती है। ऐसा माना जाता है कि यह प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करता है और यकृत और गुर्दे जैसे अंगों की कार्यप्रणाली को बढ़ाता है।
✯⁠ ओपल पत्थर में भावनाओं को संतुलित करने और भावनात्मक उपचार प्रदान करने की क्षमता भी होती है। ऐसा कहा जाता है कि इसका दिमाग पर शांत प्रभाव पड़ता है जो व्यक्तियों को भावनात्मक अशांति, चिंता और तनाव से उबरने में मदद करता है।
✯⁠ यह प्राकृतिक रत्न आंखों के स्वास्थ्य के लिए भी बड़ा फायदेमंद माना जाता है। यह आंखों के तनाव से राहत देता है और दृष्टि को बढ़ावा भी देता है। इसके अतिरिक्त, ऐसा माना जाता है कि यह हार्मोनल संतुलन के नियमन में सहायता करता है और प्रजनन स्वास्थ्य में सुधार करता है।
कुल मिलाकर यह रत्न अपने पहनने वाले की संपूर्ण जीवन शक्ति में सुधार करेगा।
ओपल रत्न पहनने से होने वाले दुष्प्रभाव✷
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार यदि ओपल रत्न को किसी ज्योतिषी या रत्न सलाहकार से बिना सलाह लिए धारण करा जाए तो आपको इसके नकारात्मक प्रभाव का सामना करना पड़ सकता है जो निम्नलिखित है -
✷ ओपल आपके स्वास्थ्य पर प्रभाव डाल सकता है आप लगातार बीमार पड़ सकते है और आपका शरीर पीला पड़ सकता है व आप शारीरिक रूप से कमजोर हो सकते है।
✷ आपके प्रेम संबंध, या विवाहित जीवन पर भी इसका बुरा प्रभाव देखा जा सकता है और आप पति-पत्नी में गलतफहमी व लड़ाईयाँ हो सकती है।
✷ ओपल के बुरे प्रभाव से आपकी आय पर भी असर हो सकता है और आपको अपने व्यवसाय के क्षेत्र में भारी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है या आपके बचाये हुए पैसे आपको एक बार में कहीं खर्च करने पड़े।
✷ ओपल की शक्ति आपकी समझ पर भी पर्दा डाल सकती है और आपके फैसले लेने की समझदारी कम हो सकती है जिस से आपके हर फैसले पर असर हो सकता है।
✿✿ओपल रत्न किन लोगो पहनना चाहिए 
✿ पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार ओपल रत्न उन लोगों को पहनना चाहिए जिन लोगो का जन्म तुला और वृषभ राशि में हुआ है उन्हें भी ओपल रत्न पहनने की सलाह है।
✿ इसके अलावा, मकर, कुंभ, मिथुन और कन्या राशि वाले भी इस रत्न को पहन सकते हैं हालांकि उन्हें इसे पहनने से पहले किसी ज्योतिषी से परामर्श लेना चाहिए। यह सुनिश्चित करना आवश्यक है की ये रत्न आपकी कुंडली के अनुसार आपके अनुकूल है या नहीं यदि आपके अनुकूल नहीं है तो इसके नकारातमक प्रभाव आपको परेशान कर सकते है।
✿ ओपल रत्न कलाकारो, लेखकों और रचनात्मक गतिविधियों में शामिल व्यक्तियों को पहनना चाहिए क्योंकि यह किसी व्यक्ति में रचनात्मकता कौशल को बढ़ाता है। ओपल पहनकर, व्यक्ति अपनी रचनात्मक क्षमता का दोहन कर सकता है, अपनी कल्पना का विस्तार कर सकता है और नवीन विचारों को सामने ला सकता है। यह प्रेरणा, कलात्मक अभिव्यक्ति और किसी के विचारों और भावनाओं को प्रभावी ढंग से संप्रेषित करने की क्षमता को प्रोत्साहित करता है।
✿ यदि आपकी जन्म कुंडली में शुक्र की महादशा चल रही है तो आपको इसके नकारात्मक प्रभावों को कम करने के लिए ओपल रत्न को अवश्य धारण करना चाहिए।
✯⁠✯ पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार ओपल पहनने के विधि निम्नलिखित हैं -
✯ कोई भी व्यक्ति ओपल रत्न को पेंडेंट या अंगूठी के रूप में पहन सकता है। आपके ओपल रत्न का वजन आपके शरीर के वजन को 10 से विभाजित करने का परिणाम होना चाहिए उदाहरण के लिए - यदि उपयोगकर्ता के शरीर का वजन 70 किलोग्राम है, तो उसे कम से कम 5 से 7 कैरेट का ओपल रत्न पहनना चाहिए।
✯ यदि आप ओपल रत्न को सोने या सफेद सोने, प्लैटिनम, चांदी या पंचधातु में स्थापित कर सकते है।
✯ ओपल स्टोन पहनने का सबसे अच्छा दिन और समय शुक्ल पक्ष के शुक्रवार की सुबह है। इस रत्न को दाहिने हाथ की मध्यमा उंगली में पहना जाता है।
✯ ओपल स्टोन या किसी अन्य रत्न को पहनने से पहले आपको अधिकतम लाभ के लिए अपने रत्न को शुद्ध और ऊर्जावान बनाना होगा इसलिए अपने रत्न को शुद्ध करने के लिए एक धातु का कटोरा लें और उसमें अपना रत्न रखें और एक-एक करके निम्न चरण का पालन करे
✯ एक कटोरे में अपने रत्न को रखकर रत्न पर गंगा जल, तुलसी के पत्ते, देशी गाय का कच्चा दूध, थोड़ा शहद और अंत में घी डालें फिर "ओम शुं शुक्राय नमः" मंत्र का 108 बार जाप करना शुरू करें। जब आप आखिरी बार इस मंत्र का जाप करने के पश्चात आप ओपल रत्न निकालें और गंगा जल से धोकर शुद्ध कपड़े से इसे साफ़ करने के बाद ओपल रत्न को पहन लें।
✷✷नोट - पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार ध्यान रखने योग्य बात यह है कि मोती, पुखराज और माणिक्य जैसे रत्नों के साथ ओपल रत्न को नहीं पहनना चाहिए। 
ओपल को कभी सगाई की अंगूठी के रूप में भी धारण नहीं करना चाहिए।
लेखक परिचय - Pandit Anjani Kumar Dadhich
पंडित अंजनी कुमार दाधीच
Nakshatra jyotish Hub
नक्षत्र ज्योतिष हब
Panditanjanikumardadhich@gmail.com
📱6377054504

श्री लक्ष्मी अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र

श्री लक्ष्मी अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र
मैं पंडित अंजनी कुमार दाधीच श्री लक्ष्मीअष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र के पाठ के बारे में कुछ जानकारी दे रहा हूं।

श्री लक्ष्मीअष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र के पाठ से लाभ -
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार शुक्रवार के दिन मां लक्ष्मी का पंचामृत से अभिषेक कर पुजन करते हुए श्री लक्ष्मी अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति को धन, वैभव और प्रसिद्धी के साथ मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है।
श्री लक्ष्मी अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र का नियमित पाठ करने से व्यक्ति को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है और आर्थिक तंगी की समस्या का निवारण होता है।

🧿श्री लक्ष्मी अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र 🧿

।।अथ श्री लक्ष्मी अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रम्।।
देव्युवाच-
 
देवदेव! महादेव! त्रिकालज्ञ! महेश्वर!
 
करुणाकर देवेश! भक्तानुग्रहकारक! ॥
 
अष्टोत्तर शतं लक्ष्म्याः श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥
 
ईश्वर उवाच-
 
देवि! साधु महाभागे महाभाग्य प्रदायकम् ।
 
सर्वैश्वर्यकरं पुण्यं सर्वपाप प्रणाशनम् ॥
 
सर्वदारिद्र्य शमनं श्रवणाद्भुक्ति मुक्तिदम् ।
 
राजवश्यकरं दिव्यं गुह्याद्–गुह्यतरं परम् ॥
 
दुर्लभं सर्वदेवानां चतुष्षष्टि कलास्पदम् ।
 
पद्मादीनां वरांतानां निधीनां नित्यदायकम् ॥
 
समस्त देव संसेव्यम् अणिमाद्यष्ट सिद्धिदम् ।
 
किमत्र बहुनोक्तेन देवी प्रत्यक्षदायकम् ॥
 
तव प्रीत्याद्य वक्ष्यामि समाहितमनाश्शृणु ।
 
अष्टोत्तर शतस्यास्य महालक्ष्मिस्तु देवता ॥
 
क्लीं बीज पदमित्युक्तं शक्तिस्तु भुवनेश्वरी ।
 
अंगन्यासः करन्यासः स इत्यादि प्रकीर्तितः ॥
 
 ध्यानम्
 
वंदे पद्मकरां प्रसन्नवदनां सौभाग्यदां भाग्यदां
 
हस्ताभ्यामभयप्रदां मणिगणैः नानाविधैः भूषिताम् ।
 
भक्ताभीष्ट फलप्रदां हरिहर ब्रह्माधिभिस्सेवितां
 
पार्श्वे पंकज शंखपद्म निधिभिः युक्तां सदा शक्तिभिः ॥
 
सरसिज नयने सरोजहस्ते धवल तरांशुक गंधमाल्य शोभे ।
 
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवन भूतिकरि प्रसीदमह्यम् ॥
 
ॐ प्रकृतिं, विकृतिं, विद्यां, सर्वभूत हितप्रदाम् ।
 
श्रद्धां, विभूतिं, सुरभिं, नमामि परमात्मिकाम् ॥ १ ॥
 
वाचं, पद्मालयां, पद्मां, शुचिं, स्वाहां, स्वधां, सुधाम् ।
धन्यां, हिरण्ययीं, लक्ष्मीं, नित्यपुष्टां, विभावरीम् ॥ २ ॥
 
अदितिं च, दितिं, दीप्तां, वसुधां, वसुधारिणीम् ।
 
नमामि कमलां, कांतां, क्षमां, क्षीरोद संभवाम् ॥ ३ ॥
 
अनुग्रहपरां, बुद्धिं, अनघां, हरिवल्लभाम् ।
 
अशोका,ममृतां दीप्तां, लोकशोक विनाशिनीम् ॥ ४ ॥
 
नमामि धर्मनिलयां, करुणां, लोकमातरम् ।
 
पद्मप्रियां, पद्महस्तां, पद्माक्षीं, पद्मसुंदरीम् ॥ ५ ॥

पद्मोद्भवां, पद्ममुखीं, पद्मनाभप्रियां, रमाम् ।
 
पद्ममालाधरां, देवीं, पद्मिनीं, पद्मगंधिनीम् ॥ ६ ॥
 
पुण्यगंधां, सुप्रसन्नां, प्रसादाभिमुखीं, प्रभाम् ।
 
नमामि चंद्रवदनां, चंद्रां, चंद्रसहोदरीम् ॥ ७ ॥
 
चतुर्भुजां, चंद्ररूपां, इंदिरा,मिंदुशीतलाम् ।
 
आह्लाद जननीं, पुष्टिं, शिवां, शिवकरीं, सतीम् ॥ ८ ॥
 
विमलां, विश्वजननीं, तुष्टिं, दारिद्र्य नाशिनीम् ।
 
प्रीति पुष्करिणीं, शांतां, शुक्लमाल्यांबरां, श्रियम् ॥ ९ ॥
 
भास्करीं, बिल्वनिलयां, वरारोहां, यशस्विनीम् ।
 
वसुंधरा, मुदारांगां, हरिणीं, हेममालिनीम् ॥ १० ॥
 
 धनधान्यकरीं, सिद्धिं, स्रैणसौम्यां, शुभप्रदाम् ।
 
नृपवेश्म गतानंदां, वरलक्ष्मीं, वसुप्रदाम् ॥ ११ ॥
 
शुभां, हिरण्यप्राकारां, समुद्रतनयां, जयाम् ।
 
नमामि मंगलां देवीं, विष्णु वक्षःस्थल स्थिताम् ॥ १२ ॥
 
विष्णुपत्नीं, प्रसन्नाक्षीं, नारायण समाश्रिताम् ।
 
दारिद्र्य ध्वंसिनीं, देवीं, सर्वोपद्रव वारिणीम् ॥ १३ ॥
 
नवदुर्गां, महाकालीं, ब्रह्म विष्णु शिवात्मिकाम् ।
 
त्रिकालज्ञान संपन्नां, नमामि भुवनेश्वरीम् ॥ १४ ॥
 
लक्ष्मीं क्षीरसमुद्रराज तनयां श्रीरंगधामेश्वरीम् ।
 
दासीभूत समस्तदेव वनितां लोकैक दीपांकुराम् ॥
 
श्रीमन्मंद कटाक्ष लब्ध विभवद्–ब्रह्मेंद्र गंगाधराम् ।
 
त्वां त्रैलोक्य कुटुंबिनीं सरसिजां वंदे मुकुंदप्रियाम् ॥ १५ ॥
 
मातर्नमामि! कमले! कमलायताक्षि!
 
श्री विष्णु हृत्–कमलवासिनि! विश्वमातः!
 
क्षीरोदजे कमल कोमल गर्भगौरि!
 
लक्ष्मी! प्रसीद सततं समतां शरण्ये ॥ १६ ॥
 
 त्रिकालं यो जपेत् विद्वान् षण्मासं विजितेंद्रियः ।
 
दारिद्र्य ध्वंसनं कृत्वा सर्वमाप्नोत्–ययत्नतः ।
 
देवीनाम सहस्रेषु पुण्यमष्टोत्तरं शतम् ।
 
येन श्रिय मवाप्नोति कोटिजन्म दरिद्रतः ॥ १७ ॥
 
भृगुवारे शतं धीमान् पठेत् वत्सरमात्रकम् ।
 
अष्टैश्वर्य मवाप्नोति कुबेर इव भूतले ॥
 
दारिद्र्य मोचनं नाम स्तोत्रमंबापरं शतम् ।
 
येन श्रिय मवाप्नोति कोटिजन्म दरिद्रतः ॥ १८ ॥
 
भुक्त्वातु विपुलान् भोगान् अंते सायुज्यमाप्नुयात् ।
 
प्रातःकाले पठेन्नित्यं सर्व दुःखोप शांतये ।
 
पठंतु चिंतयेद्देवीं सर्वाभरण भूषिताम् ॥ १९ ॥
 
॥ इति श्री लक्ष्मी अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रं संपूर्णम् ॥
***********************************************
Pandit Anjani Kumar Dadhich 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच
कुंडली विश्लेषक वास्तुविद एवं अंक ज्योतिषी
panditanjanikumardadhich@gmail.com
📱6377054504

Thursday, 4 January 2024

नारायण स्तोत्र

नारायण स्तोत्र 
गुरुवार(बृहस्पतिवार) को भगवान नारायण का विधिवत पूजन कर आदि शंकराचार्य द्वारा रचित श्री नारायण स्तोत्र का पाठ करने से मनुष्‍य की हर मनोकामना पूर्ण हो जाती है।
आदि शंकराचार्य द्वारा रचित नारायण स्तोत्र भगवान विष्णु के शक्तिशाली स्तोत्र में से एक है। नारायण स्तोत्र का नियमित पाठ करने से सुखी और शांतिपूर्ण जीवन में मदद मिलेगी। नारायण स्तोत्र के नियमित पाठ से मन की शांति भी मिलती है और जीवन से सभी बुराई दूर होती है। इस पाठ के करने से व्यक्ति स्वस्थ,धनवान और समृद्ध बनता हैं।
नारायण स्तोत्र 
।। अथ श्रीमच्छंकराचार्यविरचितं नारायणस्तोत्रं।।
नारायण नारायण जय गोविंद हरे ॥
नारायण नारायण जय गोपाल हरे ॥
करुणापारावारा वरुणालयगम्भीरा ॥
घननीरदसंकाशा कृतकलिकल्मषनाशा ॥
यमुनातीरविहारा धृतकौस्तुभमणिहारा ॥
पीताम्बरपरिधाना सुरकल्याणनिधाना ॥
मंजुलगुंजाभूषा मायामानुषवेषा ॥
राधाऽधरमधुरसिका रजनीकरकुलतिलका ॥
मुरलीगानविनोदा वेदस्तुतभूपादा ॥
बर्हिनिवर्हापीडा नटनाटकफणिक्रीडा ॥
वारिजभूषाभरणा राजिवरुक्मिणिरमणा ॥
जलरुहदलनिभनेत्रा जगदारम्भकसूत्रा ॥
पातकरजनीसंहर करुणालय मामुद्धर ॥
अधबकक्षयकंसारे केशव कृष्ण मुरारे ॥
हाटकनिभपीताम्बर अभयं कुरु मे मावर ॥
दशरथराजकुमारा दानवमदस्रंहारा ॥
गोवर्धनगिरिरमणा गोपीमानसहरणा ॥
शरयूतीरविहारासज्जनऋषिमन्दारा ॥
विश्वामित्रमखत्रा विविधपरासुचरित्रा ॥
ध्वजवज्रांकुशपादा धरणीसुतस्रहमोदा ॥
जनकसुताप्रतिपाला जय जय संसृतिलीला ॥
दशरथवाग्घृतिभारा दण्डकवनसंचारा ॥
मुष्टिकचाणूरसंहारा मुनिमानसविहारा ॥
वालिविनिग्रहशौर्या वरसुग्रीवहितार्या ॥
मां मुरलीकर धीवर पालय पालय श्रीधर ॥
जलनिधिबन्धनधीरा रावणकण्ठविदारा ॥
ताटीमददलनाढ्या नटगुणविविधधनाढ्या ॥
गौतमपत्नीपूजन करुणाघनावलोकन ॥
स्रम्भ्रमसीताहारा साकेतपुरविहारा ॥
अचलोद्घृतिञ्चत्कर भक्तानुग्रहतत्पर ॥
नैगमगानविनोदा रक्षःसुतप्रह्लादा ॥
भारतियतिवरशंकर नामामृतमखिलान्तर ॥
।। इति श्रीमच्छंकराचार्यविरचितं नारायणस्तोत्रं सम्पूर्णम्‌ ।।
Pandit Anjani Kumar Dadhich 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच
(कुंडली विश्लेषक वास्तुविद एवं अंक ज्योतिषी)
panditanjanikumardadhich@gmail.com
📱 6377054504

Wednesday, 3 January 2024

गणेश कवच स्तोत्र

श्री गणेश कवच स्तोत्र 
प्रिय पाठकों, 
मैं पंडित अंजनी कुमार दाधीच आज श्री गणेश कवच स्तोत्र  के बारे में यहाँ जानकारी दे रहा हूँ।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार बुधवार के दिन भगवान गणेश जी का विधिवत पूजन कर दुर्वा चढ़ाते हुए मोदक का भोग लगाकर श्री गणेश कवच का पाठ करने से व्यक्ति की समस्त कठिनाईयां दूर होती हैं और गणेश की कृपा प्राप्त होती है। यह गणेश कवच कश्यप ने मुद्गल को बताया था मुद्गल ने महर्षि माण्डव्य को बताया था। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार गणेश कवच का पाठ करने से भौतिक, मानसिक, शारीरिक कष्ट दूर होते हैं साथ ही व्यक्ति यश, सद्बुद्धि, सदाचरण, बल, तेज और सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण होता है।  
इस कवच का 7 बार 21 दिनों तक जाप करने से मारण, उच्चाटन, आकर्षण, स्तंभन, मोहन आदि सिद्धियों का फल साधक को प्राप्त होता है। इस कवच को भोजपत्र पर लिखकर जो बुद्धिमान साधक अपने कंठ पर धारण करना चाहिए।
श्री गणेश कवच स्तोत्र 

।।अथ श्री गणेश कवचम्।।

गौर्युवाच
एषोऽतिचपलो दैत्यान्बाल्येऽपि नाशयत्यहो ।

अग्रे किं कर्म कर्तेति न जाने मुनिसत्तम ।।1।।

दैत्या नानाविधा दुष्टा: साधुदेवद्रुह: खला: ।

अतोऽस्य कण्ठे किंचित्त्वं रक्षार्थं बद्धुमर्हसि ।।2।।

मुनिरुवाच
ध्यायेत्सिंहगतं विनायकममुं दिग्बाहुमाद्यं युगे त्रेतायां तु मयूरवाहनममुं षड्बाहुकं सिद्धिदम् ।

द्वापरे तु गजाननं युगभुजं रक्तांगरागं विभुं तुर्ये तु द्विभुजं सितांगरूचिरं सर्वार्थदं सर्वदा ।।3।।

विनायक: शिखां पातु परमात्मा परात्पर: ।

अतिसुंदरकायस्तु मस्तकं सुमहोत्कट: ।।4।।

ललाटं कश्यप: पातु भ्रूयुगं तु महोदर: ।

नयने भालचन्द्रस्तु गजास्यस्तवोष्ठपल्लवौ ।।5।।

जिह्वां पातु गणाक्रीडश्रिचबुकं गिरिजासुत: ।

पादं विनायक: पातु दन्तान् रक्षतु दुर्मुख: ।।6।।

श्रवणौ पाशपाणिस्तु नासिकां चिंतितार्थद: ।

गणेशस्तु मुखं कंठं पातु देवो गणञज्य: ।।7।।

स्कंधौ पातु गजस्कन्ध: स्तनौ विघ्नविनाशन: ।

ह्रदयं गणनाथस्तु हेरंबो जठरं महान् ।।8।।

धराधर: पातु पाश्र्वौ पृष्ठं विघ्नहर: शुभ: ।

लिंगं गुज्झं सदा पातु वक्रतुन्ड़ो महाबल: ।।9।।

गणाक्रीडो जानुजंघे ऊरू मंगलमूर्तिमान् ।

एकदंतो महाबुद्धि: पादौ गुल्फौ सदाऽवतु ।।10।।

क्षिप्रप्रसादनो बाहू पाणी आशाप्रपूरक: ।

अंगुलीश्च नखान्पातु पद्महस्तोऽरिनाशन ।।11।।

सर्वांगनि मयूरेशो विश्र्वव्यापी सदाऽवतु ।

अनुक्तमपि यत्स्थानं धूम्रकेतु: सदाऽवतु ।।12।।

आमोदस्त्वग्रत: पातु प्रमोद: पृष्ठतोऽवतु ।

प्राच्यां रक्षतु बुद्धीश आग्नेय्यां सिद्धिदायक: ।।13।।

दक्षिणस्यामुमापुत्रो नैर्ऋत्यां तु गणेश्वर: ।

प्रतीच्यां विघ्नहर्ताऽव्याद्वायव्यां गजगर्णक: ।।14।।

कौबेर्यां निधिप: पायादीशान्यामीशनन्दन: ।

दिवोऽव्यादेलनन्दस्तु रात्रौ संध्यासु विघ्नह्रत् ।।15।।

राक्षसासुरवेतालग्रहभूतपिशाचत: पाशांकुशधर: पातु रज:सत्त्वतम:स्मृति: ।।16।।

ज्ञानं धर्मं च लक्ष्मीं च लज्जां कीर्तिं तथा कुलम् ।

वपुर्धनं च धान्यश्र्च ग्रहदारान्सुतान्सखीन् ।।17।।

सर्वायुधधर: पौत्रान्मयूरेशोऽवतात्सदा ।

कपिलोऽजाबिकं पातु गजाश्रवान्विकटोऽवतु ।।18।।

भूर्जपत्रे लिखित्वेदं य: कण्ठेधारयेत्सुधी: ।

न भयं जायते तस्य यक्षरक्ष:पिशाचत: ।।19।।

त्रिसंध्यं जपते यस्तु वज्रसारतनुर्भवेत् ।

यात्राकाले पठेद्यस्तु निर्विघ्नेन फलं लभेत् ।।20।।

युद्धकाले पठेद्यस्तु विजयं चाप्नुयाद्ध्रुवम् ।

मारणोच्चटनाकर्षस्तंभमोहनकर्मणि ।।21।।

सप्तवारं जपेदेतद्दिननामेकविशतिम ।

तत्तत्फलमवाप्नोति साधको नात्र संशय: ।।22।।

एकविंशतिवारं च पठेत्तावद्दिनानि य: ।

काराग्रहगतं सद्यो राज्ञा वध्यं च मोचयेत् ।।23।।

राजदर्शनवेलायां पठेदेतत्तत्त्रिवारत: ।

स राजानं वशं नीत्वा प्रक्रतीश्र्च सभां जयेत् ।।24।।

इदं गणेशकवचं कश्यपेन समीरितम् ।

मुद्गलाय च तेनाथ मांडव्याय महर्षये ।।25।।

मज्झं स प्राह कृपया कवचं सर्वसिद्धिदम् ।

न देयं भक्तिहीनाय देयं श्रद्धावते शुभम् ।।26।।

अनेनास्य कृता रक्षा न बाधाऽस्य भवेत्कचित् ।

राक्षसासुरवेतालदैत्यदानवसंभवा ।।27।।

॥ इति श्री गणेशपुराणे श्री गणेश कवचं संपूर्णम् ॥
***********************************************
Pandit Anjani Kumar Dadhich 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच
कुंडली विश्लेषक वास्तुविद एवं अंक ज्योतिषी 
panditanjanikumardadhich@gmail.com
📱 9414863294, 9772380963

Tuesday, 2 January 2024

गृह की नींव

गृह की नींव 
प्रिय पाठकों, 
मैं पंडित अंजनी कुमार दाधीच आज गृह की नींव और उससे संबंधित वास्तु टिप्स के बारे में यहाँ जानकारी दे रहा हूँ।
पंडित अंजनी कुमार के अनुसार किसी घर की सबसे अहम चीज होती है उस घर की नींव। नींव न केवल घर की मजबूती के लिए बल्कि घर की सुख-शांति और विकास के लिए भी जरूरी होती है। ज्योतिष में घर में खुशियों की शुरुआत नींव से मानी जाती है। ज्योतिष विज्ञान भी कहता है यदि घर कि नींव बेहतर होगी तो घर में अपने आप खुशियों का वास होगा। इसलिए घर से नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने के लिए नींव से ही शुरुआत करनी चाहिए। नींव खुदवाने से पहले हमेशा भूमि पूजन करनी चाहिए। इसके बाद नींव की खुदाई से पहले दिशा और कोण का ध्यान देना जरूरी है।
भारतीय मुहूर्त शास्त्र में इसके लिए कुछ नियम बताए गए हैं, जिन्हें देखकर आप स्वयं भी यह पता लगा सकते हैं किघर की नींव किस दिशा में खोदना प्रारंभ करना चाहिए। सबसे पहली बात तो यह किनींव हमेशा कोणों में ही खोदी जाती है, दिशाओं में नहीं यानि घर की नींव ईशान, आग्नेय, नैऋत्य या वायव्य कोण में ही खोदी जाती है, पूर्व, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर दिशा में नहीं।
पंडित अंजनी कुमार के अनुसार गृह निर्माण का कार्य प्रारंभ करने से पूर्व सूर्य के गोचर के अनुसार यह तय करना चाहिए कि घर की किस दिशा में नींव खोदना चाहिए।
गृह निर्माण प्रारंभ करने वाले दिन सूर्य सिंह, कन्या या तुला राशि में हो तो आग्नेय कोण (साऊथ- ईस्ट क्षेत्र) में नींव खोदना चाहिए।
गृह निर्माण प्रारंभ करने वाले दिन सूर्य वृश्चिक,धनु या मकर राशि में हो तो ईशान कोण (नार्थ ईस्ट जोन) में नींव खोदना चाहिए।
गृह निर्माण प्रारंभ करने वाले दिन सूर्य कुंभ, मीन या मेष राशि में हो तो वायव्य कोण (नार्थ वेस्ट जोन) में नींव खोदना चाहिए। 
गृह निर्माण प्रारंभ करने वाले दिन सूर्य वृषभ,मिथुन या कर्क राशि में हो तो नैऋत्य कोण (साऊथ-वेस्ट जोन) में नींव खोदना चाहिए।
नींव की भराई जब भी कराएं वह नींव की खुदाई के विपरीत होना चाहिए। यानी सबसे पहले जहां नींव खोदी गई वहां से भराई न करें बल्कि सबसे अंत वाले से भराई शुरू करनी चाहिए।


लेखक - Pandit Anjani Kumar Dadhich
पंडित अंजनी कुमार दाधीच
Nakshatra jyotish Hub
नक्षत्र ज्योतिष हब
Panditanjanikumardadhich@gmail.com
📱6377054504

हनुमान साठिका

हनुमान साठिका
तुलसीदास जी द्वारा रचित हनुमान साठिका हनुमान जी की साठ चौपाई वाली शक्तिशाली स्तुति है जिसका लाभ प्राप्त करने के लिए इसका मंगलवार से 60 दिनों तक अखंड पाठ करना चाहिए।
मंगलवार के दिन हनुमान जी की पुजा कर तुलसीदास जी द्वारा रचित हनुमान साठिका का पाठ करने से रोग, ऋण, शत्रु और बाधाएं दूर होने के साथ व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि, खुशी व हनुमत कृपा की प्राप्त होती हैं।
हनुमान साठिका 

।। गोस्वामी तुलसीदास कृत हनुमान साठिका।।

— दोहा —

वीर बखानौं पवनसुत,जानत सकल जहान |
धन्य-धन्य अञ्जनितनय,संकट हर हनुमान ||

— चौपाइयां —

जय जय जय हनुमान अडंगी ।
महावीर विक्रम बजरंगी ॥

जय कपीश जय पवन कुमारा ।
जय जगबन्दन सील अगारा ॥

जय आदित्य अमर अबिकारी ।
अरि मरदन जय-जय गिरधारी ॥

अंजनि उदर जन्म तुम लीन्हा ।
जय-जयकार देवतन कीन्हा ॥

बाजे दुन्दुभि गगन गम्भीरा ।
सुर मन हर्ष असुर मन पीरा ॥

कपि के डर गढ़ लंक सकानी ।
छूटे बंध देवतन जानी ॥

ऋषि समूह निकट चलि आये ।
पवन तनय के पद सिर नाये॥

बार-बार अस्तुति करि नाना ।
निर्मल नाम धरा हनुमाना ॥

सकल ऋषिन मिलि अस मत ठाना ।
दीन्ह बताय लाल फल खाना ॥

सुनत बचन कपि मन हर्षाना ।
रवि रथ उदय लाल फल जाना ॥

रथ समेत कपि कीन्ह अहारा ।
सूर्य बिना भए अति अंधियारा ॥

विनय तुम्हार करै अकुलाना ।
तब कपीस की अस्तुति ठाना ॥

सकल लोक वृतान्त सुनावा ।
चतुरानन तब रवि उगिलावा ॥

कहा बहोरि सुनहु बलसीला ।
रामचन्द्र करिहैं बहु लीला ॥

तब तुम उन्हकर करेहू सहाई ।
अबहिं बसहु कानन में जाई ॥

असकहि विधि निजलोक सिधारा ।
मिले सखा संग पवन कुमारा ॥

खेलैं खेल महा तरु तोरैं ।
ढेर करैं बहु पर्वत फोरैं ॥

जेहि गिरि चरण देहि कपि धाई ।
गिरि समेत पातालहिं जाई ॥

कपि सुग्रीव बालि की त्रासा ।
निरखति रहे राम मगु आसा ॥

मिले राम तहं पवन कुमारा ।
अति आनन्द सप्रेम दुलारा ॥

मनि मुंदरी रघुपति सों पाई ।
सीता खोज चले सिरु नाई ॥

सतयोजन जलनिधि विस्तारा ।
अगम अपार देवतन हारा ॥

जिमि सर गोखुर सरिस कपीसा ।
लांघि गये कपि कहि जगदीशा ॥

सीता चरण सीस तिन्ह नाये ।
अजर अमर के आसिस पाये ॥

रहे दनुज उपवन रखवारी ।
एक से एक महाभट भारी ॥

तिन्हैं मारि पुनि कहेउ कपीसा ।
दहेउ लंक कोप्यो भुज बीसा ॥

सिया बोध दै पुनि फिर आये ।
रामचन्द्र के पद सिर नाये ॥

मेरु उपारि आप छिन माहीं ।
बांधे सेतु निमिष इक मांहीं ॥

लछमन शक्ति लागी उर जबहीं ।
राम बुलाय कहा पुनि तबहीं ॥

भवन समेत सुषेन लै आये ।
तुरत सजीवन को पुनि धाये ॥

मग महं कालनेमि कहं मारा ।
अमित सुभट निसिचर संहारा ॥

आनि संजीवन गिरि समेता ।
धरि दीन्हों जहं कृपा निकेता ॥

फनपति केर सोक हरि लीन्हा ।
वर्षि सुमन सुर जय जय कीन्हा ॥

अहिरावण हरि अनुज समेता ।
लै गयो तहां पाताल निकेता ॥

जहां रहे देवि अस्थाना ।
दीन चहै बलि काढ़ि कृपाना ॥

पवनतनय प्रभु कीन गुहारी ।
कटक समेत निसाचर मारी ॥

रीछ कीसपति सबै बहोरी ।
राम लषन कीने यक ठोरी ॥

सब देवतन की बन्दि छुड़ाये ।
सो कीरति मुनि नारद गाये ॥

अछयकुमार दनुज बलवाना ।
कालकेतु कहं सब जग जाना ॥

कुम्भकरण रावण का भाई ।
ताहि निपात कीन्ह कपिराई ॥

मेघनाद पर शक्ति मारा ।
पवन तनय तब सो बरियारा ॥

रहा तनय नारान्तक जाना ।
पल में हते ताहि हनुमाना ॥

जहं लगि भान दनुज कर पावा ।
पवन तनय सब मारि नसावा ॥

जय मारुत सुत जय अनुकूला ।
नाम कृसानु सोक सम तूला ॥

जहं जीवन के संकट होई ।
रवि तम सम सो संकट खोई ॥

बन्दि परै सुमिरै हनुमाना ।
संकट कटै धरै जो ध्याना ॥

जाको बांध बामपद दीन्हा ।
मारुत सुत व्याकुल बहु कीन्हा ॥

सो भुजबल का कीन कृपाला ।
अच्छत तुम्हें मोर यह हाला ॥

आरत हरन नाम हनुमाना ।
सादर सुरपति कीन बखाना ॥

संकट रहै न एक रती को ।
ध्यान धरै हनुमान जती को ॥

धावहु देखि दीनता मोरी ।
कहौं पवनसुत जुगकर जोरी ॥

कपिपति बेगि अनुग्रह करहु ।
आतुर आइ दुसइ दुख हरहु ॥

राम सपथ मैं तुमहिं सुनाया ।
जवन गुहार लाग सिय जाया ॥

यश तुम्हार सकल जग जाना ।
भव बन्धन भंजन हनुमाना ॥

यह बन्धन कर केतिक बाता ।
नाम तुम्हार जगत सुखदाता ॥

करौ कृपा जय जय जग स्वामी ।
बार अनेक नमामि नमामी ॥

भौमवार कर होम विधाना ।
धूप दीप नैवेद्य सुजाना ॥

मंगल दायक को लौ लावे ।
सुन नर मुनि वांछित फल पावे ॥

जयति जयति जय जय जग स्वामी ।
समरथ पुरुष सुअन्तरजामी ॥

अंजनि तनय नाम हनुमाना ।
सो तुलसी के प्राण समाना ॥

— दोहा —

जय कपीस सुग्रीव तुम, जय अंगद हनुमान ।
राम लषन सीता सहित, सदा करो कल्याण॥

बन्दौं हनुमत नाम यह, भौमवार परमान ।
ध्यान धरै नर निश्चय, पावै पद कल्याण॥

जो नित पढ़ै यह साठिका, तुलसी कहैं बिचारि।
रहै न संकट ताहि को, साक्षी हैं त्रिपुरारि॥

— सवैया —

आरत बन पुकारत हौं कपिनाथ सुनो विनती मम भारी ।
अंगद औ नल-नील महाबलि देव सदा बल की बलिहारी ॥

जाम्बवन्त् सुग्रीव पवन-सुत दिबिद मयंद महा भटभारी ।
दुःख दोष हरो तुलसी जन-को श्री द्वादश बीरन की बलिहारी ॥
।। इति श्री हनुमान साठिका सम्पूर्ण।।
***********************************************
Pandit Anjani Kumar Dadhich 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच
कुंडली विश्लेषक वास्तुविद एवं अंक ज्योतिषी 
panditanjanikumardadhich@gmail.com
📱9414863294, 9772380963