google24482cba33272f17.html Pandit Anjani Kumar Dadhich : July 2025

Tuesday, 29 July 2025

नागपंचमी

नाग पंचमी 
प्रिय पाठकों 
मैं पंडित अंजनी कुमार दाधीच इस लेख में श्रावण मास में मनाई जाने वाली नाग पंचमी के बारे में जानकारी दें रहा हूं कृपया इस‌ लेख को जरूर पढ़ें।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार हर वर्ष श्रावण 
मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी के दिन नागपंचमी का त्योहार मनाया जाता है। इस बार भारतीय पंचांग के अनुसार सावन मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि का आरंभ 28 जुलाई को रात में 11 बजकर 25 मिनट पर होगा और 29 जुलाई मंगलवार को पंचमी तिथि रात में 12 बजकर 47 मिनट तक  रहेगी। उदया तिथि का अनुसार नाग पंचमी तिथि 29 जुलाई मंगलवार को ही मनाई जाएगी। इस बार नाग पंचमी तिथि पर शिव योग, रवि योग का बेहद शुभ संयोग बन रहा है। साथ ही इस दिन सावन का मंगलवार होने के कारण इस बार नाग पंचमी पर मंगला गौरी व्रत का संयोग भी है। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार नाग पंचमी के दिन भगवान शिव शंकर और उनके गले में आभूषण की तरह विराजमान नाग देवता के स्वरूपों की पूजा की जाती है। ऐसी मान्यता है कि नाग देवता की पूजा करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और मनचाहा वरदान देते हैं। इसके अलावा जिन जातकों पर काल सर्प दोष है उनके लिए भी यह दिन बहुत अहम माना गया है। 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार इस दिन नागदेव की पूजा करने से कुंडली में राहु और केतु से संबंधित दोष दूर होते हैं। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार हिन्दू धर्म में मान्यता है कि सर्प ही धन की रक्षा करते हैं। इसलिए धन-संपदा व समृद्धि की प्राप्ति के लिए नाग पंचमी के दिन नाग देवता की पुजा करते है। इस दिन श्रीया, नाग और ब्रह्म अर्थात शिवलिंग स्वरुप की आराधना से मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है और साधक को धनलक्ष्मी का आशिर्वाद मिलता है।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार मान्यता है कि इस दिन सर्पों की पूजा करने से नाग देवता और महादेव प्रसन्न होते हैं और काल सर्प दोष से ग्रसित जातकों को इस दोष से मुक्ति से मिलती है। जिन जातकों की कुंडली में कालसर्प दोष है तो उन्हें विशेष तौर पर नागपंचमी को विशेष पूजा-अर्चना करनी चाहिए। कालसर्प दोष कुंडली में तब आता है जब सारे ग्रह राहु और केतु के मध्य आ जाते हैं। इसके अतिरिक्त राहु-केतु की दशा,अन्तर्दशा या गोचरीय प्रभाव के कारण यदि जीवन में कोई समस्या या बाधा आ रही है तो नाग पंचमी के दिन नागों की पूजा करने पर राहु-केतु के दोष का प्रभाव कम हो जाता है। 
नाग पंचमी मनाने का कारण-
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार नागपंचमी मनाने के पीछे मान्यता है कि समुद्र मंथन के बाद जो विष निकला उसे पीने को कोई तैयार नहीं था। अंतत: भगवान शिव ने उसे पी लिया। भगवान शिव जब विष पी रहे थे, तभी उनके मुख से विष की कुछ बूंदें नीचे गिरीं और सर्प के मुख में समा गई। इसके बाद ही सर्प जाति विषैली हो गई। सर्पदंश से बचाने के लिए ही इस दिन नाग देवता की पूजा की जाती है।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने कालिया नाग पर विजय के उपलक्ष में भी नाग पंचमी पर्व मनाया जाता है। 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार नागपंचमी पूजा के दिन अनन्त, वासुकि, पद्म, महापद्म, तक्षक, कुलीर, कर्कट और शंख आदि अष्टनागों की पूजा की जाती है। नागपंचमी पर वासुकि नाग, तक्षक नाग और शेषनाग की पूजा का विधान है।
भविष्य पुराण में आस्तिक मुनि द्वारा यज्ञ से नागों को बचाने की कथा है पुराण के अनुसार आस्तिक मुनि ने यज्ञ की आग में जलते हुए नागों पर दूध से अभिषेक किया था। इससे उन्हें शीतलता मिली और नागों ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि जो भी मनुष्य नाग पंचमी के दिन उनकी पूजा करेगा उसे सर्प दंश का भय नहीं रहेगा। इसीलिए नाग पंचमी के दिन कई लोग आस्तिक ऋषि की भी पुजा करते हैं ।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार नाग पंचमी के दिन सर्वप्रथम भगवान महादेव और पार्वती की विधि-विधान से पूजन कर महादेव का रुद्राभिषेक करें। इसके बाद नाग-नागिन की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर दूध, अक्षत, फूल, चंदन और मीठा अर्पित करें।पूजन साम्रगी अर्पित करने के बाद महादेव और नाग देवता से अपनी बाधाओं को दूर करने की कामना करते हुए निम्नलिखित मंत्र का जाप करे।
सर्वे नागा: प्रीयन्तां मे ये केचित् पृथिवीतले।
ये च हेलिमरीचिस्था येन्तरे दिवि संस्थिता।।
ये नदीषु महानागा ये सरस्वतिगामिन:।
ये च वापीतडागेषु तेषु सर्वेषु वै नम:।।
इसके बाद सर्प देव की आरती करें। कालसर्प शांति की प्रार्थना करें।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार नागपंचमी पर कालसर्प दोष की शांति के अन्य उपाय जो कालसर्प दोष से मुक्ति दिलाते है वो निम्नलिखित हैं-
∆ सर्पों(नागो) का पूजन कर राहु केतु का जप स्वयं करें या किसी ब्राह्मण से करवाए।
∆ किसी सपेरे से सर्पों का जोड़ा ले पूजा कर जंगल में छोड़ें। परन्तु यह उपाय जोखिम भरा है।अतः मैं इसका पक्षधर कदापि नहीं हुं
∆ भगवान शिव को तांबे या चांदी की धातु से बना सर्प अर्पित करें और कालसर्प शांति की प्रार्थना करें।
∆  नागपंचमी को दूध, जल, शहीद, फलों का रस, चंदन, इत्र से रुद्राभिषेक करें।
∆  कालसर्प दोष शान्ति की पुजा करवाना चाहिए। 
ध्यान देने योग्य - नाग पंचमी के शुभ अवसर घर में या फिर मंदिर में रुद्राभिषेक करना बेहद शुभ माना जाता है।
नाग पंचमी के दिन भगवान शिव को नाग-नागिन का जोड़ा चढ़ाने से भी शुभ फल प्राप्त होते हैं।
लेखक परिचय - Pandit Anjani kumar Dadhich
पंडित अंजनी कुमार दाधीच 
Nakastra jyotish sansthan 
नक्षत्र ज्योतिष संस्थान नागौर 
सम्पर्क मेल - panditanjanikumardadhich@gmail.com 
सम्पर्क सूत्र - 6377054504

Wednesday, 23 July 2025

ज्योतिष और इसके भेद

ज्योतिष और ज्योतिष के भेद 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार "ज्योतिषां सूर्यादिग्रहाणां बोधकं शास्त्रम् " अर्थात सूर्यादि ग्रह और काल का बोध कराने वाले शास्त्र को ज्योतिष शास्त्र कहा जाता है। इसमें मुख्य रूप से ग्रह, नक्षत्र आदि के स्वरूप, संचार, परिभ्रमण काल, ग्रहण और स्थिति संबधित घटनाओं का निरूपण एवं शुभाशुभ फलों का कथन किया जाता है। नभमंडल में स्थित ग्रह नक्षत्रों की गणना एवं निरूपण मनुष्य जीवन के लिए महत्वपूर्ण होते हैं और यह व्यक्तित्व की परीक्षा की भी एक कारगर तकनीक है और इसके द्वारा किसी व्यक्ति के भविष्य में घटने वाली घटनाओं का पता किया जा सकता है साथ ही यह भी मालूम हो जाता है कि व्यक्ति के जीवन में कौन-कौन से घातक अवरोध उसकी राह रोकने वाले हैं अथवा प्रारब्ध के किस दुर्योग को उसे किस समय सहने के लिए विवश होना पड़ेगा और ऐसे समय में ज्योतिष शास्त्र ही एकमात्र ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा जातक को सही दिशा प्राप्त होती है। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार ज्योतिष एक प्राचीन विज्ञान है जो समय, ग्रहों, और नक्षत्रों के संबंधों को अध्ययन करता है और माना जाता है कि इनके बीच के संबंधों का मानव जीवन पर प्रभाव होता है। यह एक पूर्वाग्रही विज्ञान है जिसमें विभिन्न ग्रहों, राशियों, और नक्षत्रों के स्थिति और गतिविधियों का अध्ययन किया जाता है ताकि भविष्य में किसी व्यक्ति के जीवन में घटित होने वाली घटनाओं की पूर्वानुमान किया जा सके।
 पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार भारतीय ज्योतिष शास्त्र में अलग-अलग तरीके से भाग्य या भविष्य बताया जाता है। माना जाता है कि भारत में लगभग 150 से ज्यादा ज्योतिष विद्या प्रचलित हैं। प्रत्येक विद्या आपके भविष्य को बताने का दावा करती है। माना यह ‍भी जाता है कि प्रत्येक विद्या भविष्य बताने में सक्षम है, लेकिन उक्त विद्या के जानकार कम ही मिलते हैं, जबकि भटकाने वाले ज्यादा। मन में सवाल यह उठता है कि आखिर किस विद्या से जानें हम अपना भविष्य।  पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार ज्योतिष के विभिन्न प्रकार होते हैं, जिनमें समान्तर ज्योतिष, नाड़ी ज्योतिष, पाराशरी ज्योतिष, होरा ज्योतिष, वस्तु ज्योतिष, नक्षत्र ज्योतिष, और विवाह ज्योतिष शामिल हैं। इन प्रकारों के अनुसार, ज्योतिष का अध्ययन और प्रयोग भिन्न-भिन्न तरीकों में किया जाता है। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार समान्तर ज्योतिष में ग्रहों के अध्ययन पर जोर दिया जाता है, जबकि होरा ज्योतिष में कुंडली का अध्ययन किया जाता है। वस्तु ज्योतिष में भविष्य की पूर्वानुमान के लिए वस्तुओं का अध्ययन किया जाता है। नाड़ी ज्योतिष में व्यक्ति की कुंडली के माध्यम से भविष्य की पूर्वानुमान किया जाता है। मैं पंडित अंजनी कुमार दाधीच आज कुछ प्रचलित ज्योतिष विद्याओं की जानकारी दे रहा हूँ जो निम्नलिखित है-
1. कुंडली ज्योतिष :- यह कुंडली पर आधारित विद्या है। इसके तीन भाग है- सिद्धांत ज्योतिष, संहिता ज्योतिष और होरा शास्त्र। इस विद्या के अनुसार व्यक्ति के जन्म के समय में आकाश में जो ग्रह, तारा या नक्षत्र जहाँ था उस पर आधारित कुंडली बनाई जाती है। बारह राशियों पर आधारित नौ ग्रह और 27 नक्षत्रों का अध्ययन कर जातक का भविष्य बताया जाता है। उक्त विद्या को बहुत से भागों में विभक्त किया गया है, लेकिन आधुनिक दौर में मुख्यत: चार माने जाते हैं। ये चार निम्न हैं- नवजात ज्योतिष, कतार्चिक ज्योतिष, प्रतिघंटा या प्रश्न कुंडली और विश्व ज्योतिष विद्या।
2. लाल किताब की विद्या :- यह मूलत: उत्तरांचल, हिमाचल और कश्मीर क्षेत्र की विद्या है। इसे ज्योतिष के परंपरागत सिद्धांत से हटकर 'व्यावहारिक ज्ञान' माना जाता है। इसे बहुत ही कठिन विद्या माना जाता है। इसके अच्‍छे जानकार बगैर कुंडली को देखे उपाय बताकर समस्या का समाधान कर सकते हैं। उक्त विद्या के सिद्धांत को एकत्र कर सर्वप्रथम इस पर एक ‍पुस्तक प्रकाशित की थी जिसका नाम था 'लाल किताब के फरमान'। मान्यता अनुसार उक्त किताब को उर्दू में लिखा गया था इसलिए इसके बारे में भ्रम उत्पन्न हो गया।
3 अंक ज्योतिष :- इस भारतीय विद्या को अंक विद्या भी कहते हैं। इसके अंतर्गत प्रत्येक ग्रह, नक्षत्र, राशि आदि के अंक निर्धारित हैं। फिर जन्म तारीख, वर्ष आदि के जोड़ अनुसार भाग्यशाली अंक और भाग्य निकाला जाता है।
4 नंदी नाड़ी ज्योतिष :- यह मूल रूप से दक्षिण भारत में प्रचलित विद्या है जिसमें ताड़पत्र के द्वारा भविष्य जाना जाता है। इस विद्या के जन्मदाता भगवान शंकर के गण नंदी हैं इसी कारण इसे नंदी नाड़ी ज्योतिष विद्या कहा जाता है।
5 पंच पक्षी सिद्धान्त :- यह भी दक्षिण भारत में प्रचलित है। इस ज्योतिष सिद्धान्त के अंतर्गत समय को पाँच भागों में बाँटकर प्रत्येक भाग का नाम एक विशेष पक्षी पर रखा गया है। इस सिद्धांत के अनुसार जब कोई कार्य किया जाता है उस समय जिस पक्षी की स्थिति होती है उसी के अनुरूप उसका फल मिलता है। पंच पक्षी सिद्धान्त के अंतर्गत आने वाले पाँच पंक्षी के नाम हैं गिद्ध, उल्लू, कौआ, मुर्गा और मोर। आपके लग्न, नक्षत्र, जन्म स्थान के आधार पर आपका पक्षी ज्ञात कर आपका भविष्य बताया जाता है।
ज्योतिष और इसके भेद
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार “ज्योतिषां सूर्यादिग्रहाणां बोधकं शास्त्रम् ” अर्थात सूर्यादि ग्रह और काल का बोध कराने वाले शास्त्र को ज्योतिष शास्त्र कहा जाता है। इसमें मुख्य रूप से ग्रह, नक्षत्र आदि के स्वरूप, संचार, परिभ्रमण काल, ग्रहण और स्थिति संबधित घटनाओं का निरूपण एवं शुभाशुभ फलों का कथन किया जाता है। नभमंडल में स्थित ग्रह नक्षत्रों की गणना एवं निरूपण मनुष्य जीवन के लिए महत्वपूर्ण होते हैं और यह व्यक्तित्व की परीक्षा की भी एक कारगर तकनीक है और इसके द्वारा किसी व्यक्ति के भविष्य में घटने वाली घटनाओं का पता किया जा सकता है साथ ही यह भी मालूम हो जाता है कि व्यक्ति के जीवन में कौन-कौन से घातक अवरोध उसकी राह रोकने वाले हैं अथवा प्रारब्ध के किस दुर्योग को उसे किस समय सहने के लिए विवश होना पड़ेगा और ऐसे समय में ज्योतिष शास्त्र ही एकमात्र ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा जातक को सही दिशा प्राप्त होती है। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार ज्योतिष एक प्राचीन विज्ञान है जो समय, ग्रहों, और नक्षत्रों के संबंधों को अध्ययन करता है और माना जाता है कि इनके बीच के संबंधों का मानव जीवन पर प्रभाव होता है। यह एक पूर्वाग्रही विज्ञान है जिसमें विभिन्न ग्रहों, राशियों, और नक्षत्रों के स्थिति और गतिविधियों का अध्ययन किया जाता है ताकि भविष्य में किसी व्यक्ति के जीवन में घटित होने वाली घटनाओं की पूर्वानुमान किया जा सके।
ज्योतिष के विभिन्न प्रकार
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार भारतीय ज्योतिष शास्त्र में अलग-अलग तरीके से भाग्य या भविष्य बताया जाता है। माना जाता है कि भारत में लगभग 150 से ज्यादा ज्योतिष विद्या प्रचलित हैं। प्रत्येक विद्या आपके भविष्य को बताने का दावा करती है। माना यह ‍भी जाता है कि प्रत्येक विद्या भविष्य बताने में सक्षम है, लेकिन उक्त विद्या के जानकार कम ही मिलते हैं, जबकि भटकाने वाले ज्यादा। मन में सवाल यह उठता है कि आखिर किस विद्या से जानें हम अपना भविष्य।  पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार ज्योतिष के विभिन्न प्रकार होते हैं, जिनमें समान्तर ज्योतिष, नाड़ी ज्योतिष, पाराशरी ज्योतिष, होरा ज्योतिष, वस्तु ज्योतिष, नक्षत्र ज्योतिष, और विवाह ज्योतिष शामिल हैं। इन प्रकारों के अनुसार, ज्योतिष का अध्ययन और प्रयोग भिन्न-भिन्न तरीकों में किया जाता है। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार समान्तर ज्योतिष में ग्रहों के अध्ययन पर जोर दिया जाता है, जबकि होरा ज्योतिष में कुंडली का अध्ययन किया जाता है। वस्तु ज्योतिष में भविष्य की पूर्वानुमान के लिए वस्तुओं का अध्ययन किया जाता है। नाड़ी ज्योतिष में व्यक्ति की कुंडली के माध्यम से भविष्य की पूर्वानुमान किया जाता है। मैं पंडित अंजनी कुमार दाधीच आज कुछ प्रचलित ज्योतिष विद्याओं की जानकारी दे रहा हूँ जो निम्नलिखित है- 1. कुंडली ज्योतिष :- यह कुंडली पर आधारित विद्या है। इसके तीन भाग है- सिद्धांत ज्योतिष, संहिता ज्योतिष और होरा शास्त्र। इस विद्या के अनुसार व्यक्ति के जन्म के समय में आकाश में जो ग्रह, तारा या नक्षत्र जहाँ था उस पर आधारित कुंडली बनाई जाती है। बारह राशियों पर आधारित नौ ग्रह और 27 नक्षत्रों का अध्ययन कर जातक का भविष्य बताया जाता है। उक्त विद्या को बहुत से भागों में विभक्त किया गया है, लेकिन आधुनिक दौर में मुख्यत: चार माने जाते हैं। ये चार निम्न हैं- नवजात ज्योतिष, कतार्चिक ज्योतिष, प्रतिघंटा या प्रश्न कुंडली और विश्व ज्योतिष विद्या।
2. लाल किताब की विद्या :- यह मूलत: उत्तरांचल, हिमाचल और कश्मीर क्षेत्र की विद्या है। इसे ज्योतिष के परंपरागत सिद्धांत से हटकर ‘व्यावहारिक ज्ञान’ माना जाता है। इसे बहुत ही कठिन विद्या माना जाता है। इसके अच्‍छे जानकार बगैर कुंडली को देखे उपाय बताकर समस्या का समाधान कर सकते हैं। उक्त विद्या के सिद्धांत को एकत्र कर सर्वप्रथम इस पर एक ‍पुस्तक प्रकाशित की थी जिसका नाम था ‘लाल किताब के फरमान’। मान्यता अनुसार उक्त किताब को उर्दू में लिखा गया था इसलिए इसके बारे में भ्रम उत्पन्न हो गया।

अंक ज्योतिष :- इस भारतीय विद्या को अंक विद्या भी कहते हैं। इसके अंतर्गत प्रत्येक ग्रह, नक्षत्र, राशि आदि के अंक निर्धारित हैं। फिर जन्म तारीख, वर्ष आदि के जोड़ अनुसार भाग्यशाली अंक और भाग्य निकाला जाता है।
नंदी नाड़ी ज्योतिष :- यह मूल रूप से दक्षिण भारत में प्रचलित विद्या है जिसमें ताड़पत्र के द्वारा भविष्य जाना जाता है। इस विद्या के जन्मदाता भगवान शंकर के गण नंदी हैं इसी कारण इसे नंदी नाड़ी ज्योतिष विद्या कहा जाता है।
पंच पक्षी सिद्धान्त :- यह भी दक्षिण भारत में प्रचलित है। इस ज्योतिष सिद्धान्त के अंतर्गत समय को पाँच भागों में बाँटकर प्रत्येक भाग का नाम एक विशेष पक्षी पर रखा गया है। इस सिद्धांत के अनुसार जब कोई कार्य किया जाता है उस समय जिस पक्षी की स्थिति होती है उसी के अनुरूप उसका फल मिलता है। पंच पक्षी सिद्धान्त के अंतर्गत आने वाले पाँच पंक्षी के नाम हैं गिद्ध, उल्लू, कौआ, मुर्गा और मोर। आपके लग्न, नक्षत्र, जन्म स्थान के आधार पर आपका पक्षी ज्ञात कर आपका भविष्य बताया जाता है।
हस्तरेखा ज्योतिष :- हाथों की आड़ी-तिरछी और सीधी रेखाओं के अलावा, हाथों के चक्र, द्वीप, क्रास आदि का अध्ययन कर व्यक्ति का भूत और भविष्य बताया जाता है। यह बहुत ही प्राचीन विद्या है और भारत के सभी राज्यों में प्रचलित है।
नक्षत्र ज्योतिष :- वैदिक काल में नक्षत्रों पर आधारित ज्योतिष विज्ञान ज्यादा प्रचलित था। जो व्यक्ति जिस नक्षत्र में जन्म लेता था उसके उस नक्षत्र अनुसार उसका भविष्य बताया जाता था। नक्षत्र 27 होते हैं।
अँगूठा शास्त्र :- यह विद्या भी दक्षिण भारत में प्रचलित है। इसके अनुसार अँगूठे की छाप लेकर उस पर उभरी रेखाओं का अध्ययन कर बताया जाता है कि जातक का भविष्य कैसा होगा।
सामुद्रिक विद्या:- यह विद्या भी भारत की सबसे प्राचीन विद्या है। इसके अंतर्गत व्यक्ति के चेहरे, नाक-नक्श और माथे की रेखा सहित संपूर्ण शरीर की बनावट का अध्ययन कर व्यक्ति के चरित्र और भविष्य को बताया जाता है।
चीनी ज्योतिष :- चीनी ज्योतिष में बारह वर्ष को पशुओं के नाम पर नामांकित किया गया है। इसे ‘पशु-नामांकित राशि-चक्र’ कहते हैं। यही उनकी बारह राशियाँ हैं, जिन्हें ‘वर्ष’ या ‘सम्बन्धित पशु-वर्ष’ के नाम से जानते हैं। यह वर्ष निम्न हैं- चूहा, बैल, चीता, बिल्ली, ड्रैगन, सर्प, अश्व, बकरी, वानर, मुर्ग, कुत्ता और सुअर। जो व्यक्ति जिस वर्ष में जन्मा उसकी राशि उसी वर्ष अनुसार होती है और उसके चरित्र, गुण और भाग्य का निर्णय भी उसी वर्ष की गणना अनुसार माना जाता है।
वैदिक ज्योतिष :- वैदिक ज्योतिष अनुसार राशि चक्र, नवग्रह, जन्म राशि के आधा‍र पर गणना की जाती है। मूलत: नक्षत्रों की गणना और गति को आधार बनाया जाता है। मान्यता अनुसार वेदों का ज्योतिष किसी व्यक्ति के भविष्य कथक के लिए नहीं, खगोलीय गणना तथा काल को विभक्त करने के लिए था।
टैरो कार्ड :- टैरो कार्ड में ताश की तरह पत्ते होते हैं। जब भी कोई व्यक्ति अपना भविष्य या भाग्य जानने के लिए टैरो कार्ड के जानकार के पास जाता है तो वह जानकार एक कार्ड निकालकर उसमें लिखा उसका भविष्य बताता है। यह उसी तरह हो सकता है जैसा की पिंजरे के तोते से कार्ड निकलवाकर भविष्य जाना जाता है। यह उस तरह भी है जैसे कि बस स्टॉप या रेलवे स्टेशन पर एक मशीन लगी होती है जिसमें एक रुपए का सिक्का डालो और जान लो भविष्य। किसी मेले या जत्रा में एक कम्प्यूटर होता है जो आपका भविष्य बताता है। उपरोक्त विद्या जुए-सट्टे जैसी है यदि अच्छा कार्ड लग गया तो अच्छी भविष्यवाणी, बुरा लगा तो बुरी और सामान्य लगा तो सामान्य। हालाँकि टैरो एक्सपर्ट मनोविज्ञान को आधार बनाकर व्यक्ति का चरित्र और भविष्य बताते हैं। अब इसमें कितनी सच्चाई होती है यह कहना मुश्किल है। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार इसके अलावा माया, हेलेनिस्टिक, सेल्टिक, पर्शियन या इस्लामिक, बेबिलोनी आदि अनेक ज्योतिष धारणाएँ हैं। हर देश की अपनी अलग ज्योतिष धारणाएँ हैं और अलग-अलग भविष्यवाणियाँ। ज्योतिष विविधता का प्रदर्शन करता है और विश्वव्यापी है, हालांकि यह एक वैज्ञानिक विधि के रूप में स्वीकार नहीं किया गया है। इसे आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विवादास्पद माना जाता है, लेकिन यह अनेक लोगों के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
लेखक परिचय - Pandit Anjani Kumar Dadhich 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच 
Nakastra Jyotish Sansthan 
नक्षत्र ज्योतिष संस्थान नागौर 
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