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Wednesday, 31 December 2025

विश्व और आने वाला साल 2026

विश्व और आने वाला साल 2026
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार वर्ष 2026 विश्व स्तर पर बड़े बदलावों, राजनीतिक उथल-पुथल और Ai का बड़ी तीव्रता से प्रचार प्रसार, आध्यात्मिक प्रगति का वर्ष रहने वाला है। 
वर्ष 2026 के लिए मुख्य ज्योतिषीय भविष्यवाणियां निम्नलिखित हैं-
ग्रहों का मंत्रिमंडल- वर्ष 2026 में बृहस्पति (गुरु) 'राजा' होंगे और मंगल 'मंत्री' की भूमिका निभाएंगे। यह परिवर्तन शिक्षा और अध्यात्म में उन्नति लाएगा लेकिन मंगल के प्रभाव से राजनीतिक तनाव भी बढ़ सकता है। जो प्रारंभिक वर्ष में नेतृत्व परिवर्तन, जल-संबंधी प्लावन, सैलाब, अग्निकांड, भावनात्मक अस्थिरता व जनता में असंतोष के योग रच रहे हैं। वर्ष के आरंभिक समय में उथल-पुथल, जल और अग्नि से हानि की आशंका बलवती हो रही है। तत्पश्चात 19 मार्च 2026 से संवत 2083 (रौद्र संवत्सर) का प्रारंभ होगा जहां बृहस्पति राजा और मंगल मंत्री अनूठे वैश्विक चित्र रचेंगे। शनि वर्ष पर्यन्त मीन में नए चित्र गढ़ेंगे, राहु कुंभ में, केतु सिंह में संचार करेंगे। जून तक शनि-राहु-केतु योग प्रलयकारी प्रभाव डालेगा। बृहस्पति 2 जून तक मिथुन, फिर कर्क में अक्टूबर अंत तक, तत्पश्चात सिंह में विचित्र गति से रक्षा सुरक्षा को प्रभावित करेगा। ज्योतिष की दृष्टि से देखें तो इस वर्ष का आकाश असामान्य है। गुरु अतिचारी हैं, और जब ज्ञान और विस्तार का ग्रह असहज गति में हो, तो अवसर भ्रम बन जाते हैं और निर्णय दुविधा। यह वह समय है जब धन रहेगा, पर स्थिर नहीं। साधन होंगे, पर संतोष नहीं। निवेश में उतावलापन, योजनाओं में असंतुलन और भविष्य को लेकर एक अदृश्य बेचैनी समाज में व्याप्त होने की संभावना है। इसी कालखंड में शनि अपना न्यायासन संभाले हुए हैं। शनि न क्रूर हैं, न दयालु वे केवल निष्पक्ष हैं। जिन व्यवस्थाओं ने वर्षों तक सतही वृद्धि, उधार की समृद्धि और दिखावटी स्थिरता पर भरोसा किया, शनि अब उनसे हिसाब लेगा। बैंकिंग, कॉर्पोरेट और शासन, ये सारे सेक्टर दबाव महसूस करेंगे। टालमटोल की आदतें, लापरवाह नीतियां और नैतिक शिथिलता सामने आ सकती हैं। आकाश मण्डल में राहु शतभिषा नक्षत्र में प्रवेश कर रहे हैं। यह स्थिति अचानक बदलाव, तकनीकी उथल-पुथल और अप्रत्याशित घटनाओं की सूचक मानी जाती है। 
वैश्विक राजनीति और युद्ध - अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव और युद्ध जैसी स्थितियां बन सकती हैं। पुरानी शक्तियों के पतन और नई शक्तियों (विशेषकर एशिया की ओर सत्ता का केंद्र खिसकने) के संकेत हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों में खटास और टकराव की संभावना भी जताई गई है। बुध वक्री फरवरी, जून-जुलाई, अक्टूबर में संचार-व्यापार को डगमगाएगा। शुक्र अक्टूबर तुला वक्री रिश्तों में दरार डालेगा। भारत की विदेश नीति अपना दशक पुरानी चोला बदलेगी। इस्लामिक देशों में नया ध्रुवीकरण नज़र आयेगा। उत्तर बंगाल के चुनावी परिणाम सत्ताधारीयों को चौंका सकते हैं। विश्व में एक बड़ा देश किसी दूसरे बड़े देश की स्थिर सत्ता को अस्थिर करने का प्रयास करेगा। विश्व में राजनीतिक उथल-पुथल रहेगी। कई पड़ोसी देशों से तनाव मिलेगा। एक बड़ा विश्व नेता कई बड़े बदलाव कर सकता है। एशिया में शक्ति संतुलन के दरमियान संघर्ष परिलक्षित होने की संभावना है। सीमा विवाद, वैश्विक सत्ता पुनर्संरचना दृष्टिगोचर होगी। शनि-राहु-केतु से विश्व, राष्ट्र और प्रांतों, निकायों में नेतृत्व परिवर्तन होगा। पंजाब-कश्मीर-ओडिशा में कुछ समय के लिए अशांति की आशंका है।
आर्थिक स्थिति - यह वर्ष वित्तीय मोर्चे पर चुनौतीपूर्ण रह सकता है। कुछ क्षेत्रों में मंदी (रिसेशन) और कर्मचारियों की छंटनी की आशंका है, हालांकि साल के मध्य में स्थिरता आने के संकेत हैं। भारत के लिए घरेलू मांग के कारण आर्थिक विकास मजबूत बना रह सकता है।
प्राकृतिक आपदाएं और जलवायु- अत्यधिक गर्मी, सूखे और जल स्तर की कमी की संभावनाएं प्रबल हैं। इसके साथ ही भूकंप, सुनामी, चक्रवाती तुफान, ज्वालामुखी फटने और भूस्खलन,कई क्षेत्रों में बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं के प्रति भी सावधान रहने की सलाह दी जाती है।
धातुएं, जिन्स और शेयर मार्केट - वर्षारंभ में दुग्ध संकट, सरसों-जौ-चना-गन्ना अधिक, कीटों से फसल हानि होने की आशंका। पूर्वार्ध में अन्न-फल में कमी, उत्तरार्ध में फलोत्पत्ति उत्तम रहेगी। शेयर बाजार में नया उछाल दरअसल भविष्य में बड़ी गिरावट की पटकथा लिख सकता है, मई-जुलाई में ट्रेडर्स को हानि का सामना करना पड़ सकता है, अक्टूबर के बाद शेयर बाजार की स्थिति विचित्र नज़र आएगी। तकनीक क्षेत्र उन्नति करेगा। धातुओं में उछाल आएगा। सोना-चांदी में प्रारंभिक गिरावट के पश्चात महातेजी दृष्टिगोचर होगी, तब आज की कीमतें सस्ती लगेंगी। मानसून के बाद धातुओं के भाव में उछाल आएगा, अकस्मात किसी खबर से बाजार सहसा स्तब्ध रह सकता है। आने वाले बरसों में तांबा उत्कर्ष की नई कहानी लिखेगा। पांच बरसों में तांबा बड़ी उछाल मार सकता है। बड़े नोटों की कमी होगी।
मनोरंजन और खेल - इस साल में डिजिटल कंटेंट्स का बूम देखने को मिलेगा। नए इन्फ्लुएंसर्स चमकेंगे। उनका क्रेज बढ़ेगा। बॉलीवुड के सब्जेक्ट और आईडिया में बदलाव दिखेगा। खेल क्षेत्र में भारत उन्नति करेगा। अगले ओलंपिक के परफॉरमेंस में कुछ सुधार आएगा, क्रिकेट-एथलेटिक्स में नए सितारे उभरेंगे। मंगल खेल में साहस का सबब बनेगा। कई खिलाड़ी चोटिल होने की आशंका है। आने वाले साल और सालों में कई काबिल खिलाड़ियों के करियर में बदलाव आ सकता है।
तकनीक और नवाचार- वर्ष 2026 में प्रौद्योगिकी (Technology), विशेषकर AI और नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) के क्षेत्र में भारत और दुनिया भर में बड़े अनुसंधान और प्रगति होगी। ज्योतिष और विज्ञान के क्षेत्र में नवीन प्रगति देखने को मिलेगी। 
प्रमुख खगोलीय घटनाएं - 2026 में कुल चार ग्रहण होंगे जो निम्नलिखित है-
17 फरवरी: कुंभ राशि में कुंडलाकार सूर्य ग्रहण।
3 मार्च: कन्या राशि में पूर्ण चंद्र ग्रहण।
12 अगस्त: सिंह राशि में पूर्ण सूर्य ग्रहण।
28 अगस्त: मीन राशि में आंशिक चंद्र ग्रहण।
अन्य भविष्यवाणियां- बाबा वेंगा जैसी भविष्यवाणियों के अनुसार, 2026 में अंतरिक्ष अनुसंधान में बड़ी प्रगति या एलियंस से जुड़े किसी बड़े खुलासे की संभावना जताई गई है। 
निष्कर्ष - कुल मिलाकर, 2026 एक परिवर्तनकारी वर्ष होगा जहाँ मानवता को धैर्य,आध्यात्मिक संरेखण और पुरानी आदतों को छोड़कर आगे बढ़ने की आवश्यकता होगी। आने वाले साल 2026 को डिजास्टर का वर्ष कहा जा सकता है। लेकिन प्राकृतिक कम, आर्थिक और संरचनात्मक अधिक। ढेरों नौकरियां जाएंगी, विशेषकर आईटी और उससे जुड़े क्षेत्रों में। जहां मशीनें मनुष्य की जगह लेने को तैयार हैं। यातायात को लेकर कोहराम मचेगा। हवाई , रेल और सड़क यात्रा पर नकारात्मक असर होगा। पशुओं को किसी बीमारी या महामारी से कष्ट होने की आशंका है। 
लेखक - Pandit Anjani Kumar Dadhich 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच
Nakshatra Jyotish Sansthan 
नक्षत्र ज्योतिष संस्थान 
E - Mail - panditanjanikumardadhich@gmail.com
सम्पर्क सूत्र - 6377054504

Sunday, 21 September 2025

नवरात्रि पर्व

शारदीय नवरात्र 
पंडित अंजनी कुमार के अनुसार भारतीय हिन्दू पंचांग के मुताबिक हर वर्ष आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शारदीय नवरात्रि महोत्सव मनाया जाता है। इस साल शारदीय नवरात्र महोत्सव 22 सितंबर 2025 सोमवार के दिन है इस दिन नवरात्रि का पहला दिन है। 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार शारदीय नवरात्र आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से प्रारंभ होकर नवमी तिथि में संपन्न हो जाता है। किन्तु इस साल शारदीय नवरात्र पूरे दस दिनों का होगा।
नवरात्रि के दिन शुभ/अशुभ योग 
नवरात्रि पर इस बार बुधादित्य राजयोग, भद्र राजयोग, धन योग (चंद्र मंगल युति तुला राशि में), त्रिग्रह योग (चंद्रमा बुध और सूर्य की युति कन्या राशि में), और गजेसरी राजयोग का शुभ संयोग रहने वाला है। नवरात्रि का आरंभ गजकेसरी राजयोग से हो रहा है क्योंकि, गुरु और चंद्रमा एक दूसरे से केंद्र भाव में होंगे। गुरु मिथुन राशि में और चंद्रमा कन्या राशि में गोचर करेंगे जिससे गजकेसरी राजयोग का निर्माण होगा।
मां का आगमन और उसका प्रभाव -
हर साल मां दुर्गा का आगमन अलग-अलग सवारी पर होता है और उसका विशेष महत्व माना जाता है। इस साल मां दुर्गा हाथी पर सवार होकर आएंगी। हाथी को बहुत शुभ माना जाता है, जो समृद्धि, प्रगति और खुशहाली का प्रतीक है। भक्तों का विश्वास है कि इस वर्ष मां की कृपा से घर-परिवार और समाज में शांति और बरकत बढ़ेगी।
कलश स्थापना का महत्व -
वैदिक ग्रंथों एवं पुराणों में बताया गया है कि किसी भी पुजा में कलश स्थापना का अपना विशेष महत्व होता है। कलश में ब्रह्मा, विष्णु, रूद्र, नवग्रह समेत चौसठ योगिनियों सहित सभी देवी-देवताओं का वास होता है और धर्मशास्त्रों के अनुसार नवरात्र में कलश की पूजा करने से सुख- समृद्धि, धन, वैभव, ऐश्वर्य, शांति, पारिवारिक उन्नति तथा रोग-शोक का नाश होता है।
शारदीय नवरात्रि में घटस्थापना का शुभ मुहूर्त निम्नलिखित हैं -
1) सुबह 6:09 मिनट से आरंभ हो रहा है जो 8:06 मिनट तक।
2) सुबह 09:11 मिनट से सुबह 10:43 मिनट तक।
3) दोपहर 11:49 मिनट से 12:38 मिनट तक (अभिजीत मुहूर्त)।
दिनांक  तिथि  व माँ का स्वरूप
22 सितंबर 2025 प्रथमा माँ शैलपुत्री की पूजा
23 सितंबर 2025 द्वितीया माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा
24 सितंबर 2025 तृतीया माँ चंद्रघंटा की पूजा
25 सितंबर 2025 तृतीया माँ चंद्रघंटा की पूजा
26 सितंबर 2025 चतुर्थी माँ कूष्मांडा की पूजा
27 सितंबर 2025 पंचमी माँ स्कंदमाता की पूजा
28 सितंबर 2025 षष्ठी मां कात्यायनी की पूजा
29 सितंबर 2025 सप्तमी माँ कालरात्रि की पूजा
30 सितंबर 2025 अष्टमी माँ सिद्धिदात्री की पूजा
01 अक्टूबर 2025 नवमी माँ महागौरी की पूजा
02 अक्टूबर 2025 विजयादशमी (दशहरा)
नवरात्रि में मां की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु दुर्गा सप्तशती,सिद्ध कुंजिका स्तोत्र दुर्गा चालीसा, देवी कवच, अर्गलास्तोत्र, दुर्गा चालीसा आदि का पाठ करें या 
"ओम् ऐं ह्लीं क्लीं चामुण्डायै विच्यै" माला का जाप करें।

लेखक परिचय - Pandit Anjani Kumar Dadhich
पंडित अंजनी कुमार दाधीच
Nakshatra jyotish Hub
नक्षत्र ज्योतिष हब
📧panditanjanikumardadhich@gmail.com
फोन नंबर - 9414863294, 637705450

Saturday, 6 September 2025

चन्द्र ग्रहण

चंद्र ग्रहण 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार भारतीय पंचांग की काल गणना के आधार पर कल 7 सितंबर 2025 रविवार के दिन साल का दूसरा चंद्र ग्रहण लग रहा है। चंद्रमा के ग्रहण का समय रात्रि 9:58 मिनट से शुरू होगा और ग्रहण का समापन रात्रि 1:26 मिनट पर होगा। खगोल वैज्ञानिकों के मुताबिक यह ग्रहण पूर्ण चंद्र ग्रहण होगा। ग्रहण काल से 9 घंटे पहले ही ग्रहण का सूतक काल शुरु हो जाता है। दोपहर 12: 59 मिनट से सूतक काल शुरू होगा। यह चंद्र ग्रहण भारत के अलावा ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, अफ्रीका, एशिया, यूरोप, पश्चिमी और उत्तरी अमेरिका तथा दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों में भी नजर आएगा। 
यह चंद्र ग्रहण न्याय के कारक शनि की राशि कुंभ और गुरु के नक्षत्र पूर्वाभाद्रपद में लगने वाला है। ऐसे में जिन भी जातकों का जन्म इस नक्षत्र में हुआ है उनपर विशेष कृपा बनी रहेगी। करियर-कारोबार में मनचाहा लाभ मिलने की संभावना है। नई नौकरी की प्राप्ति होगी, जिससे भौतिक सुख में वृद्धि होना संभव है। स्वास्थ्य समस्याएं दूर होंगी और रिश्तों में प्रेम-विश्वास का संचार होने के योग है।
यह चंद्र ग्रहण मेष, वृषभ, कन्या और धनु राशि वालों के लिए शुभ रहने वाला है। इन राशियों वालों को धन लाभ, करियर-कारोबार में सफलता, वैवाहिक सुख और निवेश में मनचाहा लाभ संभव है। इसके अलावा अटके काम पूरे और भाग्योदय के भी योग बन रहे हैं। 
यह चंद्र ग्रहण मिथुन, कर्क, सिंह, तुला, वृश्चिक, मकर, कुंभ और मीन राशि वालों के लिए कष्टकारी या पीड़ादायक हो सकता है। सभी क्षेत्रों में कार्य बाधा, यात्राओं में दुर्घटना कारक या कष्टकारी होगा। किसी नए कार्य को शुरू करने का अगर विचार बना रहे हैं तो अभी ठहराव बेहतर रहेगा। व्यापार में चुनौतियां आ सकती हैं। काम को पूरा करने में दिक्कतें आएंगी। किसी से भी कोई जानकारी साझा न करें। 
⁠ ग्रहण में क्या नहीं करना चाहिए - 
✷ग्रहण की अवधि में सोना नहीं चाहिए।
✷बाल या नाखून भी नहीं काटना चाहिए।
✷ग्रहण में रसोई का कोई काम नहीं करना चाहिए।
✷भोजन ग्रहण भी नहीं करना चाहिए।
✷पूजा-पाठ और भगवान की मूर्तियों को नहीं छूना चाहिए।
✷कोई भी खरीदारी ग्रहण में न करें।
✷शरीर पर तेल नहीं लगाना चाहिए।
✷गर्भवती महिलाएं बाहर जाने की भूल न करें।
✷आसमान को नहीं देखना चाहिए।
✷ सुई से जुड़ा कोई भी काम न करें।
✿ ग्रहण में क्या करना चाहिए -
✷ ग्रहण काल में नाम जप, मंत्र जप, और भगवान भजन कीर्तन करना चाहिए।
✷ कपड़े, अनाज, अन्न - धन आदि का दान करना चाहिए।
लेखक परिचय - Pandit Anjani Kumar Dadhich 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच
Nakastra Jyotish Sansthan 
नक्षत्र ज्योतिष संस्थान 
E-mail anjanikumardadhich@gmail.com 
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Wednesday, 6 August 2025

बुध प्रदोष व्रत

बुध प्रदोष व्रत के बारे में

प्रिय पाठकों, 
6 अगस्त 2025, बुधवार 
मैं पंडित अंजनी कुमार दाधीच आज बुध प्रदोष व्रत के बारे में यहाँ जानकारी दे रहा हूँ।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार प्रदोष व्रत भगवान शिव के लिए किया जाने वाला व्रत है। भगवान शिव को समर्पित प्रदोष का यह व्रत हर माह के कृष्ण व शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को रखा जाता है। मान्यता है कि इस व्रत को रखने से भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त होता है और परिवार में सुख, शांति और खुशहाली हमेशा बनी रहती हैं।  इस बार प्रदोष के व्रत तारीख 6 अगस्त बुधवार को रखा जाएगा। माना जाता है कि बुधवार के दिन पड़ने वाला प्रदोष व्रत व्यक्ति को बुध ग्रह की शुभता प्रदान करता है।
किसी भी बुधवार के दिन पड़ने वाले प्रदोष को बुध प्रदोष कहते हैं। वैसे प्रदोष व्रत के दिन भगवान शिव की पूजा का विधान है। पर यह दोष व्रत बुधवार के दिन आए तो बुध-प्रदोष का शुभ संयोग बन जाता है।
बुध प्रदोष व्रत विशेषकर अपनी संतानों की खुशहाली, सर्वत्र रक्षा और उनकी बौद्धिक क्षमता बढ़ाने के लिए किया जाता है।  बुधवार भगवान श्रीगणेशजी का भी दिन है। इसलिए इस दिन जो व्यक्ति व्रत रखकर शिव-गणेश की पूजा करता है। उसकी संतानें हमेशा खुशहाल रहती हैं। भगवान शिव उनकी रक्षा करते हैं और श्रीगणेश उन्हें अच्छी बुद्धि प्रदान करते हैं। जिन लोगों की संतानें गलत रास्ते पर चल पड़ी हैं या जिनकी संतानों को कोई गंभीर रोग है तो उन्हें बुध प्रदोष व्रत करके शिव-गणेश की पूजा अवश्य करना चाहिए।बुध प्रदोष का व्रत करके जीवन में धन की वृद्धि की जा सकती है और सभी रोग, शोक, कलह, क्लेश हमेशा के लिए खत्म हो जाते हैं। बुध प्रदोष व्रत करके भगवान गणेश की विशेष कृपा से हर कार्य का विघ्न भी दूर होता है। 
किसी भी प्रदोष व्रत में भगवान शिव की पूजा सूर्यास्त से 45 मिनट पूर्व शुरू होकर सूर्यास्त के 45 मिनट बाद तक की जाती है।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार बुध प्रदोष व्रत के लाभ निम्नलिखित हैं-
❁बुध प्रदोष व्रत खासतौर पर संतान की कुशाग्र बुद्धि और उनकी रक्षा के लिए किया जाता है।
❁जो बच्चे मंदबुद्धि हैं या जिनका मन पढ़ाई में नहीं लगताहै या जो बच्चे अच्छे अंक नहीं ला पाते है तो उनके माता-पिता दोनों को यह व्रत करना चाहिए।
❁जिन दंपती के बच्चे गलत संगत में पड़ गए हैं और उनका कहना नहीं मानते हैं। नशे के आदी हो गए हैं तो उन्हें भी बुध-प्रदोष व्रत करना चाहिए।
❁जिन दंपती के बच्चों को कोई गंभीर रोग है या बार-बार बीमार पड़ते हैं उन्हें बुध प्रदोष जरूर करना चाहिए।
❁बच्चों की जन्मकुंडली के लग्न स्थान में यदि पापी ग्रह बैठे हों तो वे अक्सर बीमार रहते हैं तो ऐसे बच्चों के माता-पिता को यह व्रत करना चाहिए।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार बुध प्रदोष के दिन घर के कष्टों को दूर करने का निम्नलिखित उपाय करे-
शाम के समय प्रदोष काल में शिवलिंग पर जल में कच्चा दूध मिलाकर अभिषेक करें और तिल के तेल का चौमुखा दीपक जलाएं और ओम् नमः शिवाय मंत्र का जाप करें। इसके अलावा बुध प्रदोष के दिन ही घर में लाल रंग के भगवान गणेश की पूर्व दिशा में स्थापना कर बुध प्रदोष के दिन से लेकर लगातार 27 दिनों तक उन्हें रोजाना लाल गुड़हल के 11 फूल और हरी दूर्वा की पत्तियां अर्पित कर "ओम् वकतुण्डाय हुम्" मंत्र की एक माला का जाप लाल चंदन की माला से करें और इस दौरान रोज प्रभु से घर के संकट दूर करने के लिए प्रार्थना करें। जाप पूर्ण होने के बाद जरूरतमंद लोगों को खाना खिलाएं। 
लेखक - Pandit Anjani Kumar Dadhich
पंडित अंजनी कुमार दाधीच
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Tuesday, 29 July 2025

नागपंचमी

नाग पंचमी 
प्रिय पाठकों 
मैं पंडित अंजनी कुमार दाधीच इस लेख में श्रावण मास में मनाई जाने वाली नाग पंचमी के बारे में जानकारी दें रहा हूं कृपया इस‌ लेख को जरूर पढ़ें।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार हर वर्ष श्रावण 
मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी के दिन नागपंचमी का त्योहार मनाया जाता है। इस बार भारतीय पंचांग के अनुसार सावन मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि का आरंभ 28 जुलाई को रात में 11 बजकर 25 मिनट पर होगा और 29 जुलाई मंगलवार को पंचमी तिथि रात में 12 बजकर 47 मिनट तक  रहेगी। उदया तिथि का अनुसार नाग पंचमी तिथि 29 जुलाई मंगलवार को ही मनाई जाएगी। इस बार नाग पंचमी तिथि पर शिव योग, रवि योग का बेहद शुभ संयोग बन रहा है। साथ ही इस दिन सावन का मंगलवार होने के कारण इस बार नाग पंचमी पर मंगला गौरी व्रत का संयोग भी है। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार नाग पंचमी के दिन भगवान शिव शंकर और उनके गले में आभूषण की तरह विराजमान नाग देवता के स्वरूपों की पूजा की जाती है। ऐसी मान्यता है कि नाग देवता की पूजा करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और मनचाहा वरदान देते हैं। इसके अलावा जिन जातकों पर काल सर्प दोष है उनके लिए भी यह दिन बहुत अहम माना गया है। 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार इस दिन नागदेव की पूजा करने से कुंडली में राहु और केतु से संबंधित दोष दूर होते हैं। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार हिन्दू धर्म में मान्यता है कि सर्प ही धन की रक्षा करते हैं। इसलिए धन-संपदा व समृद्धि की प्राप्ति के लिए नाग पंचमी के दिन नाग देवता की पुजा करते है। इस दिन श्रीया, नाग और ब्रह्म अर्थात शिवलिंग स्वरुप की आराधना से मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है और साधक को धनलक्ष्मी का आशिर्वाद मिलता है।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार मान्यता है कि इस दिन सर्पों की पूजा करने से नाग देवता और महादेव प्रसन्न होते हैं और काल सर्प दोष से ग्रसित जातकों को इस दोष से मुक्ति से मिलती है। जिन जातकों की कुंडली में कालसर्प दोष है तो उन्हें विशेष तौर पर नागपंचमी को विशेष पूजा-अर्चना करनी चाहिए। कालसर्प दोष कुंडली में तब आता है जब सारे ग्रह राहु और केतु के मध्य आ जाते हैं। इसके अतिरिक्त राहु-केतु की दशा,अन्तर्दशा या गोचरीय प्रभाव के कारण यदि जीवन में कोई समस्या या बाधा आ रही है तो नाग पंचमी के दिन नागों की पूजा करने पर राहु-केतु के दोष का प्रभाव कम हो जाता है। 
नाग पंचमी मनाने का कारण-
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार नागपंचमी मनाने के पीछे मान्यता है कि समुद्र मंथन के बाद जो विष निकला उसे पीने को कोई तैयार नहीं था। अंतत: भगवान शिव ने उसे पी लिया। भगवान शिव जब विष पी रहे थे, तभी उनके मुख से विष की कुछ बूंदें नीचे गिरीं और सर्प के मुख में समा गई। इसके बाद ही सर्प जाति विषैली हो गई। सर्पदंश से बचाने के लिए ही इस दिन नाग देवता की पूजा की जाती है।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने कालिया नाग पर विजय के उपलक्ष में भी नाग पंचमी पर्व मनाया जाता है। 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार नागपंचमी पूजा के दिन अनन्त, वासुकि, पद्म, महापद्म, तक्षक, कुलीर, कर्कट और शंख आदि अष्टनागों की पूजा की जाती है। नागपंचमी पर वासुकि नाग, तक्षक नाग और शेषनाग की पूजा का विधान है।
भविष्य पुराण में आस्तिक मुनि द्वारा यज्ञ से नागों को बचाने की कथा है पुराण के अनुसार आस्तिक मुनि ने यज्ञ की आग में जलते हुए नागों पर दूध से अभिषेक किया था। इससे उन्हें शीतलता मिली और नागों ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि जो भी मनुष्य नाग पंचमी के दिन उनकी पूजा करेगा उसे सर्प दंश का भय नहीं रहेगा। इसीलिए नाग पंचमी के दिन कई लोग आस्तिक ऋषि की भी पुजा करते हैं ।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार नाग पंचमी के दिन सर्वप्रथम भगवान महादेव और पार्वती की विधि-विधान से पूजन कर महादेव का रुद्राभिषेक करें। इसके बाद नाग-नागिन की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर दूध, अक्षत, फूल, चंदन और मीठा अर्पित करें।पूजन साम्रगी अर्पित करने के बाद महादेव और नाग देवता से अपनी बाधाओं को दूर करने की कामना करते हुए निम्नलिखित मंत्र का जाप करे।
सर्वे नागा: प्रीयन्तां मे ये केचित् पृथिवीतले।
ये च हेलिमरीचिस्था येन्तरे दिवि संस्थिता।।
ये नदीषु महानागा ये सरस्वतिगामिन:।
ये च वापीतडागेषु तेषु सर्वेषु वै नम:।।
इसके बाद सर्प देव की आरती करें। कालसर्प शांति की प्रार्थना करें।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार नागपंचमी पर कालसर्प दोष की शांति के अन्य उपाय जो कालसर्प दोष से मुक्ति दिलाते है वो निम्नलिखित हैं-
∆ सर्पों(नागो) का पूजन कर राहु केतु का जप स्वयं करें या किसी ब्राह्मण से करवाए।
∆ किसी सपेरे से सर्पों का जोड़ा ले पूजा कर जंगल में छोड़ें। परन्तु यह उपाय जोखिम भरा है।अतः मैं इसका पक्षधर कदापि नहीं हुं
∆ भगवान शिव को तांबे या चांदी की धातु से बना सर्प अर्पित करें और कालसर्प शांति की प्रार्थना करें।
∆  नागपंचमी को दूध, जल, शहीद, फलों का रस, चंदन, इत्र से रुद्राभिषेक करें।
∆  कालसर्प दोष शान्ति की पुजा करवाना चाहिए। 
ध्यान देने योग्य - नाग पंचमी के शुभ अवसर घर में या फिर मंदिर में रुद्राभिषेक करना बेहद शुभ माना जाता है।
नाग पंचमी के दिन भगवान शिव को नाग-नागिन का जोड़ा चढ़ाने से भी शुभ फल प्राप्त होते हैं।
लेखक परिचय - Pandit Anjani kumar Dadhich
पंडित अंजनी कुमार दाधीच 
Nakastra jyotish sansthan 
नक्षत्र ज्योतिष संस्थान नागौर 
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सम्पर्क सूत्र - 6377054504

Wednesday, 23 July 2025

ज्योतिष और इसके भेद

ज्योतिष और ज्योतिष के भेद 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार "ज्योतिषां सूर्यादिग्रहाणां बोधकं शास्त्रम् " अर्थात सूर्यादि ग्रह और काल का बोध कराने वाले शास्त्र को ज्योतिष शास्त्र कहा जाता है। इसमें मुख्य रूप से ग्रह, नक्षत्र आदि के स्वरूप, संचार, परिभ्रमण काल, ग्रहण और स्थिति संबधित घटनाओं का निरूपण एवं शुभाशुभ फलों का कथन किया जाता है। नभमंडल में स्थित ग्रह नक्षत्रों की गणना एवं निरूपण मनुष्य जीवन के लिए महत्वपूर्ण होते हैं और यह व्यक्तित्व की परीक्षा की भी एक कारगर तकनीक है और इसके द्वारा किसी व्यक्ति के भविष्य में घटने वाली घटनाओं का पता किया जा सकता है साथ ही यह भी मालूम हो जाता है कि व्यक्ति के जीवन में कौन-कौन से घातक अवरोध उसकी राह रोकने वाले हैं अथवा प्रारब्ध के किस दुर्योग को उसे किस समय सहने के लिए विवश होना पड़ेगा और ऐसे समय में ज्योतिष शास्त्र ही एकमात्र ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा जातक को सही दिशा प्राप्त होती है। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार ज्योतिष एक प्राचीन विज्ञान है जो समय, ग्रहों, और नक्षत्रों के संबंधों को अध्ययन करता है और माना जाता है कि इनके बीच के संबंधों का मानव जीवन पर प्रभाव होता है। यह एक पूर्वाग्रही विज्ञान है जिसमें विभिन्न ग्रहों, राशियों, और नक्षत्रों के स्थिति और गतिविधियों का अध्ययन किया जाता है ताकि भविष्य में किसी व्यक्ति के जीवन में घटित होने वाली घटनाओं की पूर्वानुमान किया जा सके।
 पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार भारतीय ज्योतिष शास्त्र में अलग-अलग तरीके से भाग्य या भविष्य बताया जाता है। माना जाता है कि भारत में लगभग 150 से ज्यादा ज्योतिष विद्या प्रचलित हैं। प्रत्येक विद्या आपके भविष्य को बताने का दावा करती है। माना यह ‍भी जाता है कि प्रत्येक विद्या भविष्य बताने में सक्षम है, लेकिन उक्त विद्या के जानकार कम ही मिलते हैं, जबकि भटकाने वाले ज्यादा। मन में सवाल यह उठता है कि आखिर किस विद्या से जानें हम अपना भविष्य।  पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार ज्योतिष के विभिन्न प्रकार होते हैं, जिनमें समान्तर ज्योतिष, नाड़ी ज्योतिष, पाराशरी ज्योतिष, होरा ज्योतिष, वस्तु ज्योतिष, नक्षत्र ज्योतिष, और विवाह ज्योतिष शामिल हैं। इन प्रकारों के अनुसार, ज्योतिष का अध्ययन और प्रयोग भिन्न-भिन्न तरीकों में किया जाता है। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार समान्तर ज्योतिष में ग्रहों के अध्ययन पर जोर दिया जाता है, जबकि होरा ज्योतिष में कुंडली का अध्ययन किया जाता है। वस्तु ज्योतिष में भविष्य की पूर्वानुमान के लिए वस्तुओं का अध्ययन किया जाता है। नाड़ी ज्योतिष में व्यक्ति की कुंडली के माध्यम से भविष्य की पूर्वानुमान किया जाता है। मैं पंडित अंजनी कुमार दाधीच आज कुछ प्रचलित ज्योतिष विद्याओं की जानकारी दे रहा हूँ जो निम्नलिखित है-
1. कुंडली ज्योतिष :- यह कुंडली पर आधारित विद्या है। इसके तीन भाग है- सिद्धांत ज्योतिष, संहिता ज्योतिष और होरा शास्त्र। इस विद्या के अनुसार व्यक्ति के जन्म के समय में आकाश में जो ग्रह, तारा या नक्षत्र जहाँ था उस पर आधारित कुंडली बनाई जाती है। बारह राशियों पर आधारित नौ ग्रह और 27 नक्षत्रों का अध्ययन कर जातक का भविष्य बताया जाता है। उक्त विद्या को बहुत से भागों में विभक्त किया गया है, लेकिन आधुनिक दौर में मुख्यत: चार माने जाते हैं। ये चार निम्न हैं- नवजात ज्योतिष, कतार्चिक ज्योतिष, प्रतिघंटा या प्रश्न कुंडली और विश्व ज्योतिष विद्या।
2. लाल किताब की विद्या :- यह मूलत: उत्तरांचल, हिमाचल और कश्मीर क्षेत्र की विद्या है। इसे ज्योतिष के परंपरागत सिद्धांत से हटकर 'व्यावहारिक ज्ञान' माना जाता है। इसे बहुत ही कठिन विद्या माना जाता है। इसके अच्‍छे जानकार बगैर कुंडली को देखे उपाय बताकर समस्या का समाधान कर सकते हैं। उक्त विद्या के सिद्धांत को एकत्र कर सर्वप्रथम इस पर एक ‍पुस्तक प्रकाशित की थी जिसका नाम था 'लाल किताब के फरमान'। मान्यता अनुसार उक्त किताब को उर्दू में लिखा गया था इसलिए इसके बारे में भ्रम उत्पन्न हो गया।
3 अंक ज्योतिष :- इस भारतीय विद्या को अंक विद्या भी कहते हैं। इसके अंतर्गत प्रत्येक ग्रह, नक्षत्र, राशि आदि के अंक निर्धारित हैं। फिर जन्म तारीख, वर्ष आदि के जोड़ अनुसार भाग्यशाली अंक और भाग्य निकाला जाता है।
4 नंदी नाड़ी ज्योतिष :- यह मूल रूप से दक्षिण भारत में प्रचलित विद्या है जिसमें ताड़पत्र के द्वारा भविष्य जाना जाता है। इस विद्या के जन्मदाता भगवान शंकर के गण नंदी हैं इसी कारण इसे नंदी नाड़ी ज्योतिष विद्या कहा जाता है।
5 पंच पक्षी सिद्धान्त :- यह भी दक्षिण भारत में प्रचलित है। इस ज्योतिष सिद्धान्त के अंतर्गत समय को पाँच भागों में बाँटकर प्रत्येक भाग का नाम एक विशेष पक्षी पर रखा गया है। इस सिद्धांत के अनुसार जब कोई कार्य किया जाता है उस समय जिस पक्षी की स्थिति होती है उसी के अनुरूप उसका फल मिलता है। पंच पक्षी सिद्धान्त के अंतर्गत आने वाले पाँच पंक्षी के नाम हैं गिद्ध, उल्लू, कौआ, मुर्गा और मोर। आपके लग्न, नक्षत्र, जन्म स्थान के आधार पर आपका पक्षी ज्ञात कर आपका भविष्य बताया जाता है।
ज्योतिष और इसके भेद
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार “ज्योतिषां सूर्यादिग्रहाणां बोधकं शास्त्रम् ” अर्थात सूर्यादि ग्रह और काल का बोध कराने वाले शास्त्र को ज्योतिष शास्त्र कहा जाता है। इसमें मुख्य रूप से ग्रह, नक्षत्र आदि के स्वरूप, संचार, परिभ्रमण काल, ग्रहण और स्थिति संबधित घटनाओं का निरूपण एवं शुभाशुभ फलों का कथन किया जाता है। नभमंडल में स्थित ग्रह नक्षत्रों की गणना एवं निरूपण मनुष्य जीवन के लिए महत्वपूर्ण होते हैं और यह व्यक्तित्व की परीक्षा की भी एक कारगर तकनीक है और इसके द्वारा किसी व्यक्ति के भविष्य में घटने वाली घटनाओं का पता किया जा सकता है साथ ही यह भी मालूम हो जाता है कि व्यक्ति के जीवन में कौन-कौन से घातक अवरोध उसकी राह रोकने वाले हैं अथवा प्रारब्ध के किस दुर्योग को उसे किस समय सहने के लिए विवश होना पड़ेगा और ऐसे समय में ज्योतिष शास्त्र ही एकमात्र ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा जातक को सही दिशा प्राप्त होती है। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार ज्योतिष एक प्राचीन विज्ञान है जो समय, ग्रहों, और नक्षत्रों के संबंधों को अध्ययन करता है और माना जाता है कि इनके बीच के संबंधों का मानव जीवन पर प्रभाव होता है। यह एक पूर्वाग्रही विज्ञान है जिसमें विभिन्न ग्रहों, राशियों, और नक्षत्रों के स्थिति और गतिविधियों का अध्ययन किया जाता है ताकि भविष्य में किसी व्यक्ति के जीवन में घटित होने वाली घटनाओं की पूर्वानुमान किया जा सके।
ज्योतिष के विभिन्न प्रकार
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार भारतीय ज्योतिष शास्त्र में अलग-अलग तरीके से भाग्य या भविष्य बताया जाता है। माना जाता है कि भारत में लगभग 150 से ज्यादा ज्योतिष विद्या प्रचलित हैं। प्रत्येक विद्या आपके भविष्य को बताने का दावा करती है। माना यह ‍भी जाता है कि प्रत्येक विद्या भविष्य बताने में सक्षम है, लेकिन उक्त विद्या के जानकार कम ही मिलते हैं, जबकि भटकाने वाले ज्यादा। मन में सवाल यह उठता है कि आखिर किस विद्या से जानें हम अपना भविष्य।  पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार ज्योतिष के विभिन्न प्रकार होते हैं, जिनमें समान्तर ज्योतिष, नाड़ी ज्योतिष, पाराशरी ज्योतिष, होरा ज्योतिष, वस्तु ज्योतिष, नक्षत्र ज्योतिष, और विवाह ज्योतिष शामिल हैं। इन प्रकारों के अनुसार, ज्योतिष का अध्ययन और प्रयोग भिन्न-भिन्न तरीकों में किया जाता है। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार समान्तर ज्योतिष में ग्रहों के अध्ययन पर जोर दिया जाता है, जबकि होरा ज्योतिष में कुंडली का अध्ययन किया जाता है। वस्तु ज्योतिष में भविष्य की पूर्वानुमान के लिए वस्तुओं का अध्ययन किया जाता है। नाड़ी ज्योतिष में व्यक्ति की कुंडली के माध्यम से भविष्य की पूर्वानुमान किया जाता है। मैं पंडित अंजनी कुमार दाधीच आज कुछ प्रचलित ज्योतिष विद्याओं की जानकारी दे रहा हूँ जो निम्नलिखित है- 1. कुंडली ज्योतिष :- यह कुंडली पर आधारित विद्या है। इसके तीन भाग है- सिद्धांत ज्योतिष, संहिता ज्योतिष और होरा शास्त्र। इस विद्या के अनुसार व्यक्ति के जन्म के समय में आकाश में जो ग्रह, तारा या नक्षत्र जहाँ था उस पर आधारित कुंडली बनाई जाती है। बारह राशियों पर आधारित नौ ग्रह और 27 नक्षत्रों का अध्ययन कर जातक का भविष्य बताया जाता है। उक्त विद्या को बहुत से भागों में विभक्त किया गया है, लेकिन आधुनिक दौर में मुख्यत: चार माने जाते हैं। ये चार निम्न हैं- नवजात ज्योतिष, कतार्चिक ज्योतिष, प्रतिघंटा या प्रश्न कुंडली और विश्व ज्योतिष विद्या।
2. लाल किताब की विद्या :- यह मूलत: उत्तरांचल, हिमाचल और कश्मीर क्षेत्र की विद्या है। इसे ज्योतिष के परंपरागत सिद्धांत से हटकर ‘व्यावहारिक ज्ञान’ माना जाता है। इसे बहुत ही कठिन विद्या माना जाता है। इसके अच्‍छे जानकार बगैर कुंडली को देखे उपाय बताकर समस्या का समाधान कर सकते हैं। उक्त विद्या के सिद्धांत को एकत्र कर सर्वप्रथम इस पर एक ‍पुस्तक प्रकाशित की थी जिसका नाम था ‘लाल किताब के फरमान’। मान्यता अनुसार उक्त किताब को उर्दू में लिखा गया था इसलिए इसके बारे में भ्रम उत्पन्न हो गया।

अंक ज्योतिष :- इस भारतीय विद्या को अंक विद्या भी कहते हैं। इसके अंतर्गत प्रत्येक ग्रह, नक्षत्र, राशि आदि के अंक निर्धारित हैं। फिर जन्म तारीख, वर्ष आदि के जोड़ अनुसार भाग्यशाली अंक और भाग्य निकाला जाता है।
नंदी नाड़ी ज्योतिष :- यह मूल रूप से दक्षिण भारत में प्रचलित विद्या है जिसमें ताड़पत्र के द्वारा भविष्य जाना जाता है। इस विद्या के जन्मदाता भगवान शंकर के गण नंदी हैं इसी कारण इसे नंदी नाड़ी ज्योतिष विद्या कहा जाता है।
पंच पक्षी सिद्धान्त :- यह भी दक्षिण भारत में प्रचलित है। इस ज्योतिष सिद्धान्त के अंतर्गत समय को पाँच भागों में बाँटकर प्रत्येक भाग का नाम एक विशेष पक्षी पर रखा गया है। इस सिद्धांत के अनुसार जब कोई कार्य किया जाता है उस समय जिस पक्षी की स्थिति होती है उसी के अनुरूप उसका फल मिलता है। पंच पक्षी सिद्धान्त के अंतर्गत आने वाले पाँच पंक्षी के नाम हैं गिद्ध, उल्लू, कौआ, मुर्गा और मोर। आपके लग्न, नक्षत्र, जन्म स्थान के आधार पर आपका पक्षी ज्ञात कर आपका भविष्य बताया जाता है।
हस्तरेखा ज्योतिष :- हाथों की आड़ी-तिरछी और सीधी रेखाओं के अलावा, हाथों के चक्र, द्वीप, क्रास आदि का अध्ययन कर व्यक्ति का भूत और भविष्य बताया जाता है। यह बहुत ही प्राचीन विद्या है और भारत के सभी राज्यों में प्रचलित है।
नक्षत्र ज्योतिष :- वैदिक काल में नक्षत्रों पर आधारित ज्योतिष विज्ञान ज्यादा प्रचलित था। जो व्यक्ति जिस नक्षत्र में जन्म लेता था उसके उस नक्षत्र अनुसार उसका भविष्य बताया जाता था। नक्षत्र 27 होते हैं।
अँगूठा शास्त्र :- यह विद्या भी दक्षिण भारत में प्रचलित है। इसके अनुसार अँगूठे की छाप लेकर उस पर उभरी रेखाओं का अध्ययन कर बताया जाता है कि जातक का भविष्य कैसा होगा।
सामुद्रिक विद्या:- यह विद्या भी भारत की सबसे प्राचीन विद्या है। इसके अंतर्गत व्यक्ति के चेहरे, नाक-नक्श और माथे की रेखा सहित संपूर्ण शरीर की बनावट का अध्ययन कर व्यक्ति के चरित्र और भविष्य को बताया जाता है।
चीनी ज्योतिष :- चीनी ज्योतिष में बारह वर्ष को पशुओं के नाम पर नामांकित किया गया है। इसे ‘पशु-नामांकित राशि-चक्र’ कहते हैं। यही उनकी बारह राशियाँ हैं, जिन्हें ‘वर्ष’ या ‘सम्बन्धित पशु-वर्ष’ के नाम से जानते हैं। यह वर्ष निम्न हैं- चूहा, बैल, चीता, बिल्ली, ड्रैगन, सर्प, अश्व, बकरी, वानर, मुर्ग, कुत्ता और सुअर। जो व्यक्ति जिस वर्ष में जन्मा उसकी राशि उसी वर्ष अनुसार होती है और उसके चरित्र, गुण और भाग्य का निर्णय भी उसी वर्ष की गणना अनुसार माना जाता है।
वैदिक ज्योतिष :- वैदिक ज्योतिष अनुसार राशि चक्र, नवग्रह, जन्म राशि के आधा‍र पर गणना की जाती है। मूलत: नक्षत्रों की गणना और गति को आधार बनाया जाता है। मान्यता अनुसार वेदों का ज्योतिष किसी व्यक्ति के भविष्य कथक के लिए नहीं, खगोलीय गणना तथा काल को विभक्त करने के लिए था।
टैरो कार्ड :- टैरो कार्ड में ताश की तरह पत्ते होते हैं। जब भी कोई व्यक्ति अपना भविष्य या भाग्य जानने के लिए टैरो कार्ड के जानकार के पास जाता है तो वह जानकार एक कार्ड निकालकर उसमें लिखा उसका भविष्य बताता है। यह उसी तरह हो सकता है जैसा की पिंजरे के तोते से कार्ड निकलवाकर भविष्य जाना जाता है। यह उस तरह भी है जैसे कि बस स्टॉप या रेलवे स्टेशन पर एक मशीन लगी होती है जिसमें एक रुपए का सिक्का डालो और जान लो भविष्य। किसी मेले या जत्रा में एक कम्प्यूटर होता है जो आपका भविष्य बताता है। उपरोक्त विद्या जुए-सट्टे जैसी है यदि अच्छा कार्ड लग गया तो अच्छी भविष्यवाणी, बुरा लगा तो बुरी और सामान्य लगा तो सामान्य। हालाँकि टैरो एक्सपर्ट मनोविज्ञान को आधार बनाकर व्यक्ति का चरित्र और भविष्य बताते हैं। अब इसमें कितनी सच्चाई होती है यह कहना मुश्किल है। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार इसके अलावा माया, हेलेनिस्टिक, सेल्टिक, पर्शियन या इस्लामिक, बेबिलोनी आदि अनेक ज्योतिष धारणाएँ हैं। हर देश की अपनी अलग ज्योतिष धारणाएँ हैं और अलग-अलग भविष्यवाणियाँ। ज्योतिष विविधता का प्रदर्शन करता है और विश्वव्यापी है, हालांकि यह एक वैज्ञानिक विधि के रूप में स्वीकार नहीं किया गया है। इसे आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विवादास्पद माना जाता है, लेकिन यह अनेक लोगों के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
लेखक परिचय - Pandit Anjani Kumar Dadhich 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच 
Nakastra Jyotish Sansthan 
नक्षत्र ज्योतिष संस्थान नागौर 
panditanjanikumardadhich@gmail.com 
6377054504

Thursday, 26 June 2025

आषाढ़ गुप्त नवरात्रि

आषाढ़ गुप्त नवरात्रि के उपाय और मंत्र
मैं पंडित अंजनी कुमार दाधीच आज गुप्त नवरात्रि और चमत्कारी मंत्र जाप के बारे में यहाँ जानकारी दे रहा हूँ।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार नवरात्रि यानि नौ दिन मां दुर्गा की पूजा और अराधना के दिन होते हैं। नवरात्रि के दिन मां दुर्गा को समर्पित होते हैं। एक साल में चार बार नवरात्रि मनाए जाते हैं। दो बार गुप्त नवरात्रि और एक चैत्र एक शारदीय नवरात्रि। साल में दो बार आने वाले नवरात्रि में से एक आषाढ़ मास में दूसरे माघ मास में आने वाले गुप्त नवरात्रि हैं।
भारतीय वैदिक पंचांग के अनुसार आषाढ़ मास में मनाई जाने वाली गुप्त नवरात्रि 26 जून 2025 गुरुवार से शुरू हो रही है और इसका समापन 04 जुलाई 2025 शुक्रवार को होगा। इस बार गुप्त नवरात्रि पूरे नौ दिनों तक रहेगी। घट स्थापना का शुभ मुहूर्त-  सुबह 05:25 बजे से 06:58 बजे तक रहेगा।
दूसरा अभिजीत मुहूर्त में 11:56 बजे से 12:52 बजे तक रहेगा।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार हिंदीके व्याकरण साहित्य में गुप्त शब्द का अर्थ छिपा हुआ होता है। इस नवरात्रि में गुप्त विद्याओं की सिद्धि हेतु साधना की जाती है। गुप्त नवरात्रि में तंत्र एवं मंत्र साधनाओं का महत्व होता है और तंत्र और मंत्र साधना को गुप्त रूप से ही किया जाता है। इसीलिए इसे गुप्त नवरात्रि कहते हैं। इसमें विशेष कामनाओं की सिद्धि की जाती है। साधकों को इसका ज्ञान होने के कारण या इसके छिपे हुए होने के कारण इसको गुप्त नवरात्र कहते हैं। गुप्‍त नवरात्रि में विशेष पूजा से कई प्रकार के दुखों से मुक्‍ति पाई जा सकती है। गुप्त नवरात्रि में महाविद्याओं को सिद्ध करने के लिए उपासना करते हैं। यह नवरात्रि मोक्ष की कामने से भी की जाती है। इस दौरान 10 महाविद्याओं मां काली, तारा देवी, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, माता छिन्नमस्ता, त्रिपुर भैरवी, मां ध्रुमावती, मां बंगलामुखी, मातंगी और कमला देवी की पूजा-अर्चना की जाती है। 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार गुप्त नवरात्रि विशेषकर तांत्रिक क्रियाएं, शक्ति साधना, महाकाल आदि से जुड़े लोगों के लिए विशेष महत्त्व रखती है। इस दौरान देवी भगवती के साधक बेहद कड़े नियम के साथ व्रत और साधना करते हैं। इस दौरान लोग लंबी साधना कर दुर्लभ शक्तियों की प्राप्ति करने का प्रयास करते हैं।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार माघ नवरात्री उत्तरी भारत में अधिक प्रसिद्ध है।आषाढ़ नवरात्रि मुख्य रूप से दक्षिणी भारत में लोकप्रिय है।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार गुप्त नवरात्रि के दौरान निम्नलिखित महत्वपूर्ण उपाय करने चाहिए - 
❁संतान प्राप्ति के लिए- गुप्त नवरात्रि के दौरान संतान प्राप्ति के लिए 9 दिन मां दुर्गा को पान का पत्ता अर्पित करना चाहिए। पान का पत्ता कटा-फटा नहीं होना चाहिए। पूजा के दौरान नन्दगोपगृह जाता यशोदागर्भ सम्भवा ततस्तौ नाशयिष्यामि विन्ध्याचलनिवासिनी मंत्र का जाप करना चाहिए। कहते हैं कि ऐसा करने से मनोकामना पूरी होती है।
❁नौकरी की समस्या के लिए- नौकरी या जॉब में किसी तरह की समस्या आ रही है तो गुप्त नवरात्रि के दौरान 9 दिन तक मां दुर्गा को बताशे पर रखकर लौंग अर्पित करनी चाहिए। इस दौरान "सर्वबाधा विनिर्मुक्तो धन धान्य सुतान्वित: मनुष्यो मत्प्रसादेने भविष्यति ना संशय:।" मंत्र का जाप करना चाहिए। 
❁खराब सेहत के लिए- खराब सेहत से छुटकारा पाने के लिए 9 दिन तक देवी मां को लाल पुष्प अर्पित करना चाहिए। इस दौरान "ओम् क्रीं कालिकायै नम:" मंत्र का जाप करना चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से व्यक्ति स्वस्थ होता है।
❁कर्ज से मुक्ति पाने के लिए- कर्ज या किसी वाद-विवाद से मुक्ति पाना चाहते हैं तो इसके लिए 9 दिन तक देवी मां के सामने गुग्गल की सुगंध वाला धूप जलाएं। ऐसा करने से समस्याओं से मुक्ति मिलती है। इस दौरान "ओम् दुं दुर्गाय नम:" मंत्र का जाप करना चाहिए।
❁विवाह के लिए- अगर विवाह में कोई बाधा आ रही है तो पूरे 9 दिन पीले फूलों की माला अर्पित करनी चाहिए। 
दुर्गा सप्तशती,अर्गला स्त्रोत्र, कीलक स्त्रोत्र, देवी कवच, दुर्गा चालीसा के पाठ और "ओम् ऐम् ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै नम:" की माला का जाप करेंगे तो नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव कम होगा। 
इस गुप्त नवरात्रि में एक छोटा सा उपाय जरुर करे जिसके परिणामस्वरूप माता हमारे कष्ट जरूर हर लेगी। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार कोई भी पेड़ (वटवृक्ष, बिल्व वृक्ष,अशोका वृक्ष केले का वृक्ष या पिपल वृक्ष आदि) का एक पता लेकर उसे साफ पानी से धोकर अनार वृक्ष की कलम से केसर के द्वारा उस पते पर "ह्रीं " लिखे और माता जी के चरणों में रखकर "ओम् दुं दुर्गाय: नम:" की 5 या 11 माला का जाप नित्य करे और नवमी तिथि तक यह प्रक्रिया दोहराते रहे बाद में सभी पतों को इकट्ठा करके बहते हुए जल या कोई भी पवित्र वृक्ष की जड़ो में विसर्जित कर दे । इसका लाभ अवश्य मिलेगा। 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार माता दुर्गा की कृपा प्राप्ति का का सबसे सरल उपाय दुर्गा सप्तशती का पाठ है। नवरात्र में माँ के कलश स्थापना के साथ शतचंडी, नवचंडी, दुर्गा सप्तशती, देवी अथर्वशीर्ष आदि का पाठ किया जाता है। दुर्गा सप्तशती महर्षि वेदव्यास रचित मार्कण्डेय पुराण के सावर्णि मन्वतर के देवी महात्म्य के सात सौ श्लोक का एक भाग है। 
दुर्गा सप्तशती में कुछ ऐसे परम शक्तिशाली और दुर्लभ स्तोत्र एवं मंत्र हैं, जिनके विधिवत पारायण से मनुष्य की समस्त इच्छित मनोकामना की अवश्य ही पूर्ति होती है। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार साधक को अपनी आवश्यकता के अनुसार माँ के दिव्य मन्त्र का चयन करके नित्य उसकी 5 माला या कम से कम एक माला का जाप तो अवश्य करना ही चाहिए ।
जीवन में सर्वकल्याण एवं शुभ फलो की प्राप्ति के लिए अत्यंत प्रभावशाली मन्त्र:-
सर्व मंगलं मांगल्ये शिवे सर्वाथ साधिके।
शरण्येत्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुऽते॥  
जीवन में किसी भी तरह की बाधा से मुक्ति एवं सुख समृद्धि एवं योग्य संतान की प्राप्ति के लिए :-
सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो धन धान्य सुतान्वितः।
मनुष्यों मत्प्रसादेन भवष्यति न संशय॥
जीवन में सर्वबाधा की शांति के लिए :-
सर्वाबाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्दैरिविनाशनम्।। 
आरोग्य एवं सौभाग्य प्राप्ति के लिए चमत्कारिक मन्त्र इस दिव्य मंत्र को देवी दुर्गा ने स्वयं देवताओं को दिया है:-
देहि सौभाग्यं आरोग्यं देहि में परमं सुखम्‌। 
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषोजहि॥ 
माँ के चरणो में स्थान पाने के लिए मोक्ष प्राप्ति के लिए:-
त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या।
विश्वस्य बीजं परमासि माया।।
सम्मोहितं देवि समस्तमेतत्।
त्वं वैप्रसन्ना भुवि मुक्त हेतु:।। 
जीवन में शक्ति एवं सम्पन्नता प्राप्ति के लिए :-सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि।
गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोह्यस्तु ते।। 
सभी प्रकार के संकटो से रक्षा का मंत्र:-
शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके।
घण्टास्वनेन न: पाहि चापज्यानि: स्वनेन च।। 
समस्त रोगो के नाश के लिए चमत्कारी मंत्र:- 
रोगान शेषान पहंसि तुष्टा रूष्टा तु कामान सकलानभीष्टान्।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता हाश्रयतां प्रयान्ति।। 
समस्त दु:ख और दरिद्रता के नाश के लिए:-
दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तो:।
स्वस्थै स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।।
द्रारिद्र दु:ख भयहारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकारकारणाय सदाह्यह्यद्र्रचिता।। 
जीवन में सभी तरह के सुख सौभाग्य, ऐश्वर्य, आरोग्य, धन संपदा एवं शत्रु भय मुक्ति-मोक्ष के लिए - 
ऐश्वर्य यत्प्रसादेन सौभाग्य-आरोग्य सम्पदः।
शत्रु हानि परो मोक्षः स्तुयते सान किं जनै॥ 
किसी भी तरह के भय के नाश के लिए दुर्गा मंत्र :- 
सर्व स्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्ति समन्विते।
भयेभ्यास्त्रहिनो देवी दुर्गे देवी नमोस्तुते।। 
स्वप्न में अपने कार्यों के फलो को जानने के लिए मन्त्र :-
दुर्गे देवि नमस्तुभ्यं सर्वकामार्थ साधिके।
मम सिद्घिमसिद्घिं वा स्वप्ने सर्व प्रदर्शय।। 
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पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार अगर नवरात्रि के दौरान माता दुर्गा की आराधना करना चाहते हैं और कोई भी मंत्र नहीं आता हो तो दुर्गा सप्तशती में दिए गए नवार्ण मंत्र "ओम् ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे" मंत्र की माला का जाप करना चाहिए। 
लेखक - Pandit Anjani Kumar Dadhich
पंडित अंजनी कुमार दाधीच
Nakshatra jyotish sansthan 
नक्षत्र ज्योतिष संस्थान 
Panditanjanikumardadhich@gmail.com
 Contact - 6377054504

 

Friday, 13 June 2025

तुलसी

 तुलसी का महत्व
हिन्दु धर्म में तुलसी का बहुत ही प्रमुख स्थान है।शास्त्रों के अनुसार तुलसी को बहुत ही पूजनीय और पवित्र माना गया है। तुलसी भगवान विष्णु को विशेष प्रिय है इसलिए जिस घर में तुलसी को स्थापित करके उसकी सेवा, पूजा अर्चना की जा ती है उस घर में माँ लक्ष्मी की सदैव कृपा बनी रहती है।
आमतौर पर तुलसी का पौधा सभी हिंदू परिवारों के घरों में अवश्य ही होती है। मान्यताओं के अनुसार तुलसी या वृंदा के रूप में माँ लक्ष्मी का अवतरण पृथ्वी पर हुआ। तुलसी या वृन्दा 
इसीलिए भगवान शालिग्राम-तुलसी विवाह की पूजा असीम सुख-समृद्ध प्रदान करने वाली कही गई है। तुलसी घर में होने से उस घर में दैवीय कृपा के साथ साथ घर के सदस्यों को अनेकों चिकित्सकीय लाभ भी प्राप्त होते हैं। म तुलसी के बारे में कुछ आसान सी बातों को ध्यान में रखे तो हमें निश्चित ही माँ लक्ष्मी की कृपा के साथ साथ मनवाँछित फलों की प्राप्ति होती है।यहां हम आपको कुछ ऐसी ही उपायों के बारे में बता रहे है जो आप को निरोगी रखने के साथ साथ मालामाल भी बना सकते है जो आप को निरोगी रखने के साथ साथ मालामाल भी बना सकते है।
हिन्दू शास्त्रों के अनुसार वैसे तो तुलसी पौधा लगाने के लिए आषाढ़ व ज्येष्ठ माह का विशेष महत्व है, किंतु यह किसी भी पवित्र तिथि, शुक्ल पक्ष, एवं पूर्णिमा व एकादशी तिथि आदि को भी लगाया जा सकता है । इसको लगाने के लिए सुबह के समय किसी भी देव मंदिर या जिस घर मे नित्य तुलसी की पूजा होती हो, वहीँ से तुलसी का छोटा-सा पौधा लाना उचित रहता है। इसे बाजार से भी खरीद कर लगाया जा सकता है। 
पवित्र तुलसी की स्थापना ठीक उसी तरह से करनी चाहिए जैसे हम किसी देवी देवता की मूर्ति की स्थापना करते है । तुलसी के पौधे को घर में जिस जगह लगाना हो उस जगह को पहले गंगाजल से पवित्र करें फिर साफ मिट्टी से भरे गमले में रोपें । लगाने के बाद तुलसी के पौधे को जल, इत्र, फूल, फल, दूर्वा अर्पित करते हुए वस्त्र, चुनरी वा पीला कलावा अर्पित करें एवं मिठाई से भोग लगाएं। उसके पश्चात किसी सुहागिन स्त्री से ही तुलसी के चारों ओर दूध व जल की धारा अर्पित करके उन्हें प्रणाम करें। इस विधि से स्थापना करने से उस घर में माँ तुलसी की असीम कृपा प्राप्त होती है । 
तुलसी को घर के मुख्य दवार के दोनों ओर ऊँचाई पर लगाना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि तुलसी के पौधे को इस स्थान में लगाने से घर वालों को बुरी नजर नहीं लगती है और अन्य किसी भी तरह की बुराइयां भी घर से कोसो दूर रहती है, तुलसी को घर के आँगन में भी लगाया जा सकता है । यह ध्यान रहे की तुलसी का पौधा अथवा गमला नीचे ना हो उसके लिए पर्याप्त ऊँचाई वाला स्थान ही उचित है । 
तुलसी के पौधे के आस पास कुछ भी गन्दगी नहीं रहनी चाहिए, इसके चारो ओर रोज़ उसी तरह से सफाई कराएं जिस तरह आप अपने घर की करते है ।  
रविवार को छोड़कर नित्य सुबह तुलसी में जल चढ़ाना चाहिए । इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा रहती है एवं घर के सदस्यों में प्रेम बना रहता है । 
तुलसी के पत्ते बिना उपयोग कभी भी नहीं तोडने चाहिए। ऐसा करने पर व्यक्ति पाप भागी होता है । 
तुलसी को बिना नहाये, संध्या के समय और रविवार, एकादशी, सूर्य एवं चन्द्र ग्रहण , अमावस्या , संक्रांति और रात्रि के समय बिलकुल भी नहीं तोडना चाहिए। रजस्वला स्त्री को भी तुलसी को छूना नहीं चाहिए ।   
जिस घर में प्रत्येक गुरुवार को सुबह तुलसी को दूध से सींचा जाता है उस घर से माता लक्ष्मी कभी भी नहीं जाती है ।जिस घर में संध्या के समय तुलसी पर दीपक जलाया जाता है उस घर में कभी भी कोई भी संकट, किसी भी चीज़ का आभाव नहीं रहता है। जिस घर में प्रभु विष्णु को नित्य तुलसी चढ़ाई जाती है प्रत्येक एकादशी और गुरुवार को उनकी तुलसी दल से विशेष पूजा की जाती है उस घर में कभी भी धन धान्य की कमी नहीं रहती है। 
तुलसी के अचूक उपाय -
एक गमले में एक पौधा तुलसी का तथा एक पौधा काले धतूरे का लगायें। इन दोनों पौधों पर प्रतिदिन स्नान आदि से निवृत होकर शुद्ध जल में थोड़ा सा कच्चा दूध मिलाकर अर्पित करें। ऐसा करने से व्यक्ति को ब्रहमा, विष्णु, महेश, इन तीनों की संयुक्त पूजा फल मिलता है। क्योंकि तुलसी विष्णु प्रिया है, काला धतूरा शिव रूप है एंव तुलसी की जड़ो में भगवान ब्रहमा का निवास स्थान माना गया है।
जो जातक रविवार, संक्रांति, ग्रहण को छोड़कर नित्य "ॐ तुलस्यै नमः॥" मन्त्र का जाप करते हुए सुबह तुलसी पर जल चढ़ाता है, एवं सांय को दीपक जलाता है उसे जीवन के सभी सुखो की प्राप्ति होती है, उसके पाप नष्ट होते है, पुरखो को स्वर्ग में स्थान मिलता है, सन्तान संस्कारी, आज्ञाकारी होती है, उसके घर से सभी संकट कोसो दूर रहते है । तुलसी के पत्ते बहुत ही पवित्र माने जाते है । यह हमारे जल एवं भोजन को शुद्ध और पवित्र करते हैं। इसीलिए किसी भी सूर्य या चंद्र ग्रहण के समयजल एवं भोजन में तुलसी के पत्ते डालें जाते हैं।
हमारे धर्म शास्त्रों के अनुसार इंसान की मृत्यु के बाद उस शव के मुख में तुलसी के पत्ते डाले जाते हैं। मान्यता है कि इससे मृतक को मोक्ष की प्राप्ति होती है।अगर आपको लगता है कि लाख प्रयास के बाद भी आपका व्यापार उन्नति नहीं कर पा रहा है तो आप किसी भी गुरुवार को श्यामा तुलसी के चारो ओर उग आई खर पतवार को किसी पीले वस्त्र में बांधकर अपने व्यापार स्थल में किसी साफ जगह रख दें, व्यापार में गति आ जाएगी । 
किसी भी शुभ मुहूर्त में तुलसी की जड़ लाएं । रविवार या गुरुवार को जब पुष्य नक्षत्र हो तो उस दिन उस जड़ को गंगा जल से धोकर, धूप दीप दिखाकर, तिलक लगाकर पूजा करके पीले कपड़े में लपेटकर अपने दाहिने हाथ में बांध लें इस आसान उपाय से व्यक्ति का तेज बढ़ता है, कार्यों में सफलता की सम्भावना बढ़ जाती है, अधिकारी वर्ग प्रसन्न रहता है। अगर किसी व्यक्ति की संतान बहुत ज्यादा जिद्दी हो, बड़ो का कहना ना मानती हो तो उसे घर के पूर्व दिशा में रखे तुलसी के पौधे के तीन पत्ते रविवार को छोड़कर प्रतिदिन किसी भी तरह अवश्य ही खिलाएं, सन्तान का व्यवहार सुधरने लगेगा । 
ऐसी भी मान्यता है कि यदि पूर्व दिशा में खिड़की के पास तुलसी का पौधा रखा जाए तो भी संतान आज्ञाकारी होती है।यह भी माना जाता है कि यदि आपकी कन्या का विवाह नहीं हो रहा हो तो कन्या तुलसी के पौधे को घर के दक्षिण-पूर्व में रखकर उसे नियमित रूप से जल अर्पण करें। इससे भी शीघ्र ही योग्य वर की प्राप्ति होती है ।
तुलसी का पौधा किचन के पास रखने से घर के सदस्यों में आपसी प्रेम, सामंजस्य बना रहता है। नवीन गृह में तुलसी का पौधा, देवता का चित्र, गौमूत्र, गंगाजल, और पानी का कलश लेकर घर के अंदर प्रवेश करना चाहिए । इससे घर में सदैव सुख शांति, प्रसन्नता का वातावरण बना रहता है, घर में धन की कभी भी कमी नहीं रहती है। 
घर से निकलने से पूर्व तुलसी के दर्शन करना बहुत ही शुभ एवं सफलता की निशानी माना जाता है। 
प्रतिदिन दही के साथ चीनी और तुलसी के पत्तों का सेवन करना बहुत ही शुभ माना गया है। तुलसी के पत्तों का घर से निकलते समय सेवन करने से कार्यों में कोई भी संकट नहीं आते है । हिन्दु धर्मशास्त्रों में तुलसी के आठ नाम बताए गए हैं- वृंदा, वृंदावनि, विश्व पूजिता, विश्व पावनी, पुष्पसारा, नन्दिनी, तुलसी और कृष्ण जीवनी। सुबह तुलसी में जल चढ़ाते समय इनका नित्य नाम लेने जातक को जीवन में कोई भी संकट कोई आभाव नहीं रहता है । उसे सभी तरह के भौतिक सुख सुविधाओं की प्राप्ति होती है । तुलसी का पत्तों के नित्य सेवन करना बहुत ही पुण्यदायक लाभदायक माना जाता है। लेकिन ध्यान रहे कि उसे दाँतों के बीच चबाना नहीं चाहिए।

कुण्डली में नवम् भाव में मंगल हो तो जातक क्रोधी स्वभाव का होता है और विद्या (पढ़ाई) अधूरी रहती है।
कुण्डली में नवम् भाव में मंगल हो तो जातक झूठा होता है या
 जातक ईमानदार हो फिर भी बदनामी मिलती है। जातक जीवन के क्षेत्र में सफलता कम मिलती है साथ ही जातक स्त्री की कमाई पर जीवन-यापन करता है।
नौवें भाव में चंद्रमा और मंगल के परिणामस्वरूप जातक उच्च ज्ञान प्राप्त करते हैं और बेहद प्रतिभाशाली और बुद्धिमान होते हैं। ऐसे जातक नाम और प्रसिद्धि प्राप्त करते हैं। वे वास्तव में अपनी पढ़ाई में अच्छे होंगे और इस तरह बहुत सारी छात्रवृत्ति जीतेंगे। उच्च स्तर तक पहुँचने में उन्हें सरकार का सहयोग मिलेगा। यह युति उन्हें ऊर्जावान और चिड़चिड़ा बना देगी लेकिन साथ ही किस्मत को भी चमकाएगी। ये लोग सभी प्रकार के धन, संपत्ति और सुख प्राप्त करेंगे। वे अपने भाग्य के निर्माता बनेंगे। जातक अपने पिता के साथ बहुत प्रेमपूर्ण रिश्ता साझा करेंगे। वे जीवन के हर कदम पर जातक का समर्थन करेंगे। जातक को पैतृक संपत्ति का लाभ भी मिलेगा। जातक अपने परिवार के साथ भावनात्मक रूप से जुड़े होंगे। समय-समय पर, वे अपने परिवार के सदस्यों की मदद करेंगे और अपने परिवार के सदस्यों की मदद लेंगे।
जब सूर्य मंगल और बुध ग्रह का संयोजन या युति होती है तो जातक शारीरिक रूप से मजबूत, अपने लोगों के बीच लोकप्रिय, कठोर, स्पष्टवादी और विद्वान होता है। निडरता और आत्म-सम्मान वे प्रमुख विशेषताएं हैं जो कुंडली में सूर्य, मंगल और बुध के एक भाव में युति वाले जातकों के व्यक्तित्व को परिभाषित करती हैं। हालांकि, उनके आत्म-मूल्य और अहंकार के बीच की रेखा अक्सर धुंधली हो जाती है।ऐसे लोग व्यावहारिक होते हैं और जीवन की वास्तविकताओं का अनुभव जीवन में बहुत पहले ही कर लेते हैं। हालाँकि, वे अधीर और बातूनी होते हैं। उनके स्वभाव में एक अलगपन होता है। इसके अलावा, वे बहुत कमाते हैं लेकिन जीवन में मिलने वाली विलासिता और धन का आनंद लेने के लिए संघर्ष करते हैं। वे संतान का आनंद तो लेते हैं लेकिन वैवाहिक जीवन में संघर्ष का सामना करते हैं। ऐसे लोग अक्सर विदेश यात्रा पर जाते हैं।
 

मंगल ग्रह

मंगल ग्रह

पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार वैदिक ज्योतिष शास्त्र में मंगल ग्रह को क्रूर ग्रह माना गया है। जातकों की कुंडली में मंगल ग्रह का विशेष प्रभाव पड़ता है। कुंडली में मंगल दोष होने पर तमाम तरह की परेशानियां आने लगती है, जिसमें प्रमुख रूप से विवाह में देरी का होना माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र में मंगल ग्रह को ऊर्जा, भूमि और साहस का कारक ग्रह माना गया है। मेष और वृश्चिक राशि के स्वामी मंगल ग्रह होते हैं। मंगल मकर राशि में उच्च के जबकि कर्क राशि में नीच के माने गए हैं। जिन लोगों की कुंडली में मंगल शुभ भाव में होते हैं वह व्यक्ति काफी निडर और साहसी स्वभाव होता है। ऐसा व्यक्ति किसी भी प्रकार की चुनौती से जल्दी घबराता नहीं है। वहीं जिन जातकों की कुंडली में मंगल अशुभ भाव में विराजमान होते हैं उन्हें कई तरह की परेशानियां झेलनी पड़ती है। पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार ज्योतिष में मंगल ग्रह ऊर्जा, भाई, भूमि, शक्ति, साहस, पराक्रम, शौर्य का कारक होता है। मंगल ग्रह को मेष और वृश्चिक राशि का स्वामित्व प्राप्त है। यह मकर राशि में उच्च होता है, जबकि कर्क इसकी नीच राशि है। वहीं नक्षत्रों में यह मृगशिरा, चित्रा और धनिष्ठा नक्षत्र का स्वामी होता है। गरुण पुराण के अनुसार मनुष्य के शरीर में नेत्र मंगल ग्रह का स्थान है। यदि किसी जातक का मंगल अच्छा हो तो वह स्वभाव से निडर और साहसी होगा तथा युद्ध में वह विजय प्राप्त करेगा। लेकिन यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में मंगल अशुभ स्थिति में बैठा हो तो जातक को विविध क्षेत्रों में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। मंगल ग्रह लाल रंग का प्रतिनिधित्व करता है।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार  मांगलिक दोष मनुष्य जीवन के दांपत्य जीवन को प्रभावित करता है। मंगल दोष व्यक्ति के विवाह में देरी अथवा अन्य प्रकार की रुकावटों का कारण होता है।ज्योतिष के अनुसार जब किसी जातक की कुंडली में मंगल लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम और द्वादश भाव में से किसी भी एक भाव में होता है तब मांगलिक दोष की स्थिति बनती है। जिसकी कुंडली में मंगल दोष होता है यानि कुंडली मांगलिक होती है उसके वैवाहिक जीवन पर विपरीत प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है। इसलिए मांगलिक कुंडली के जातक का विवाह किसी मांगलिक दोष वाले के साथ ही करवाया जाता है।इसके प्रभावों को कम करने के लिए जातक को मंगल दोष के उपाय करने चाहिए।
मनुष्य जीवन पर मंगल का प्रभाव
शारीरिक बनावट एवं स्वभाव - जन्म कुंडली में लग्न भाव में मंगल ग्रह व्यक्ति के चेहरे में सुंदरता एवं तेज़ लाता है। व्यक्ति उम्र के हिसाब से युवा दिखाई देता है। यह जातक को पराक्रमी, साहसी और निडर बनाता है। लग्न में मंगल के प्रभाव से व्यक्ति अभिमान भी होता है। वह किसी प्रकार के दबाव में रहकर कार्य नहीं करता है। शारीरिक रूप से व्यक्ति बलवान होता है। व्यक्ति का स्वभाव क्रोधी होता है। ऐसे जातकों की सेना, पुलिस, इंजीनियरिंग क्षेत्र में रुचि होती है। मंगल का लग्न भाव होना मंगल दोष भी बनाता है।
बली मंगल के प्रभाव - मंगल की प्रबलता से व्यक्ति निडरता से अपने निर्णय लेता है। वह ऊर्जावान रहता है। इससे जातक उत्पादक क्षमता में वृद्धि होती है। विपरीत परिस्थितियों में भी जातक चुनौतियों को सहर्ष स्वीकार करता है और उन्हें मात भी देता है। बली मंगल का प्रभाव केवल व्यक्ति के ही ऊपर नहीं पड़ता है, बल्कि इसका प्रभाव व्यक्ति के पारिवारिक जीवन पर पड़ता दिखाई देता है। बली मंगल के कारण व्यक्ति के भाई-बहन अपने कार्यक्षेत्र में उन्नति करते हैं।
पीड़ित मंगल के प्रभाव - यदि मंगल ग्रह कुंडली में कमज़ोर अथवा पीड़ित हो तो यह जातक के लिए समस्या पैदा करता है। इसके प्रभाव से व्यक्ति को किसी दुर्घटना का सामना करना पड़ता है। पीड़ित मंगल के कारण जातक के पारिवारिक जीवन में भी समस्याएं आती हैं। जातक को शत्रुओं से पराजय, ज़मीन संबंधी विवाद, क़र्ज़ आदि समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
रोग - कुंडली में मंगल पीड़ित हो तो व्यक्ति को विषजनित, रक्त संबंधी रोग, कुष्ठ, ख़ुजली, रक्तचाप, अल्सर, ट्यूमर, कैंसर, फोड़े-फुंसी, ज्वार आदि रोक होने की संभावना रहती है।
कार्यक्षेत्र - सेना, पुलिस, प्रॉपर्टी डीलिंग, इलेक्ट्रॉनिक संबंधी, इलेक्ट्रिक इंजीनियरिंग, स्पोर्ट्स आदि।
उत्पाद - मसूर दाल, रेल वस्त्र, ज़मीन, अचल संपत्ती, विद्युत उत्पाद, तांबें की वस्तुएँ आदि।
स्थान - आर्मी कैंप, पुलिस स्टेशन, फायर बिग्रेड स्टेशन, युद्ध क्षेत्र आदि।
पशु व पक्षी - मेमना, बंदर, भेड़, शेर, भेड़िया, सूअर, कुत्ता, चमगादड़ एवं सभी लाल पक्षी आदि।
जड़ - अनंत मूल।
रत्न - मूंगा।
रुद्राक्ष - तीन मुखी रुद्राक्ष।
यंत्र - मंगल यंत्र।
रंग - लाल।
मंगल ग्रह की शांति के लिए मंगलवार का व्रत धारण करें और हनुमान चालीसा का पाठ करें। इसके अलावा मंगल से संबंधित इन मंत्रों का जाप करें-
मंगल का वैदिक मंत्र -
ॐ अग्निमूर्धा दिव: ककुत्पति: पृथिव्या अयम्।
अपां रेतां सि जिन्वति।।
मंगल का तांत्रिक मंत्र -
ॐ अं अंङ्गारकाय नम:
लेखक - Pandit Anjani Kumar Dadhich
पंडित अंजनी कुमार दाधीच
Nakshatra jyotish Hub
नक्षत्र ज्योतिष हब
📧panditanjanikumardadhich@gmail.com
फोन नंबर - 9414863294

ध्वजा

हिंदू धर्म में ध्वज का विशेष महत्व बताया गया है। प्रत्येक मंदिर के शिखर पर ध्वज लगाने की परंपरा सदियों पुरानी है। आज के समय में लोग अपने घरों की छत पर धार्मिक रूप से ध्वजा लगाते हैं। हिंदू धर्म में मुख्य रूप से केसरिया या पीले रंग का ध्वज लगाया जाता है। ज्योतिष शास्त्र में भी ध्वज से जुड़े कई उपाय बताए गए हैं। इन उपायों को करने से कई परेशानियां दूर हो सकती हैं। ध्वजा लगाते समय कई बातों का ध्यान रखा जाता है।
घर के ऊपर ध्वज लगाने से होने वाले लाभ निम्नलिखित है-
आर्थिक समस्याओं से मुक्ति मिलती है
जिस घर के ऊपर भी ध्वज लगाया जाता है़ उस भवन पर दैवीय कृपा हो जाती है़। साथ ही ध्वज के प्रभाव से घर के समस्त वास्तु दोषों का अंत हो जाता है़। जिसके फलस्वरूप आर्थिक समृद्धि के रास्ते खुलने लगते हैं और घर में माँ लक्ष्मी की कृपा दिखाई देने लगती है़।
इसके लिए हमें इस बात को ध्यान अवश्य रखना होगा कि आपके द्वारा छत पर लगाये जाने वाला ध्वज त्रिकोणीय हो और उस पर स्वस्तिक का चिन्ह अवश्य अंकित हो।
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2. सकारात्मक ऊर्जा का विकास होता है़............
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घर के ऊपर ध्वज लगाये जाने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि छत के ऊपर फहरते हुये ध्वज को जब हम और हमारे परिवार के बच्चे देखते हैं तो हमारे अंदर प्रसन्नता का संचार होता है।
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यह प्रसन्नता का संचार ही हमारे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा भर देता है। जिससे की ध्वज वाले घर में रहने वाला हर सदस्य प्रगति की ओर बढ़ता है।
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3. रोग और शोक का नाश होता है़.............
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जब हम अपने घर की छत पर ध्वज को उत्तर-पश्चिम दिशा में लगाते हैं तो हमारे घर की सारी नकारात्मक ऊर्जा नष्ट हो जाती है। हमारे आवास की निगेटिव एनर्जी के समाप्त होते ही घर के सारे रोगों ओर शोकों का नाश हो जाता है और दुर्घटनाओं से बच जाते हैं।
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4. बुरी नजर से बचाता है.............
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घर में लगा ध्वज हमारी और हमारे घर की बुरी नजर से रक्षा करता है। किसी भी व्यक्ति द्वारा हमारे आवास पर बुरी नजर डालने पर उसका कोई दुष्प्रभाव हम पर नहीं पड़ पाता है, क्योंकि किसी व्यक्ति के द्वारा दी जाने निगेटिव एनर्जी फहरते हुये ध्वज के माध्यम से दूर कहीं छिटक जाती है़। जिससे की हम उसकी नकारात्मक दृष्टि से बच जाते हैं।
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5. घर पर लगा ध्वज मंगल का प्रतीक है़............
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हम सभी जानते हैं कि किसी भी देव स्थान या मंदिर के ऊपर एक या अनेक ध्वज अवश्य लगाये जाते हैं। लेकिन जब हम अपने घर के ऊपर ध्वज लगा देते हैं तो हमारा घर भी एक मंदिर के समान बन जाता है, जिसके कारण प्रभु की कृपा हमारे घर-आँगन में बरसने लगती है।
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6. पुरूषार्थ को बढ़ाता है़............
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घर के ऊपर ध्वज लगाने से हमारा जीवन पहले से अधिक उत्साही हो जाता है। हम कोई भी बड़ा से बड़ा काम करने से पीछे नहीं हटते बल्कि ऐसी स्थिति में हमें असंभव कार्य को संभव बनाने की प्रेरणा मिलती है। क्योंकि हमारे पुरुषार्थ को बढ़ावा मिलता है।
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ध्वज किस रंग का लगाया जाना चाहिए.............
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बाजार में धार्मिक वस्तुओं की दुकानों पर तरह-तरह के ध्वज बिकते रहते हैं, लेकिन आपको उस रंग और आकार वाला ध्वज खरीदना चाहिए जो आपके लिये सर्वोत्तम हो। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार त्रिकोणीय आकार का केसरिया या पीले रंग का ध्वज आपको अपनी छत पर लगाना चाहिए। आपके ध्वज पर मंगलकारी ॐ या स्वस्तिक का चिन्ह अवश्य बना होना चाहिए।
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ध्वज लगाये जाने में सावधानियाँ-
घर की छत पर ध्वज लगाते समय वास्तु के नियमों का पालन अवश्य करना चाहिए। इसके लिए घर की छत पर ध्वज लगाते समय भी कुछ विशेष सावधानियाँ बरतनी चाहिए। नहीं तो लाभ के स्थान पर हानि हो सकती है़। वास्तुशास्त्र के अनुसार घर की छत पर कभी भी कटा-फटा अथवा मैला ध्वज नहीं लगाना चाहिए।
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यदि आप अपनी छत पर ध्वज लगा रहें हैं तो वह साफ-सुथरा अवश्य होना चाहिए। साथ ही वह ध्वज उसी समय तक लगाये रखना चाहिए जब तक की उसका वास्तविक रंग बना रहे।
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जब उसका रंग बारिश में धुल -धुलकर फीका हो जाये या ग्रीष्मकाल की तेज धूप में ध्वज का रंग बदरंग हो जाये तो ऐसी दशा में उसे उतार कर नया ध्वज लगा देना चाहिए, क्योंकि फीके रंग का ध्वज आपके जीवन में निराशा लाता है। साथ ही वह घर में नकारात्मक ऊर्जा भी उत्पन्न करता है।

नारायण कवच

पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार किसी भी शुक्ल पक्ष के गुरुवार (बृहस्पतिवार) के दिन भगवान विष्णु की पंचोपचार विधि से पुजा करने के बाद नारायण कवच का पाठ करना चाहिए। नारायण कवच का पाठ नित्य प्रतिदिन करना चाहिए। नारायण कवच भगवान नारायण (विष्णु) को समर्पित एक प्रार्थना है जिसमें भगवान विष्णु से नकारात्मक शक्तियों से रक्षा, हर प्रकार के भय को दूर करने की प्रार्थना की गई है। नारायण कवच के पाठ का न्यास सहित वर्णन श्रीमद्भागवत महापुराण के आठवे अध्याय में उल्लेखित किया गया है। नारायण कवच का पाठ अत्यंत प्रभावशाली तथा समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण कर सुख, सौभाग्य, स्वास्थ्य और समृद्धि प्रदान करने वाला भी है।
नारायण कवच का पाठ करने से मिलने वाले अन्य लाभ निम्नलिखित है -
नारायण कवच का पाठ करने से शत्रुओं से और हर एक प्रकार की आपत्तियो से छुटकारा मिलता है।
कोई भी मनुष्य नारायण कवच का पाठ करता है उस मनुष्य को कभी भी प्रेत, पिशाच, राजा आदि से किसी भी प्रकार का भय नहीं रहता है।
नारायण कवच का पाठ पूरी निष्ठा के साथ करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होगी और नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति व सुरक्षा मिलती है।

Friday, 18 April 2025

यदि सप्तम भाव का स्वामी छ्ठे भाव में स्थित हो

यदि सप्तम भाव का स्वामी छ्ठे भाव में स्थित हो 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार वैदिक ज्योतिष में सातवें भाव के स्वामी (सातवें भाव के शासक) का छ्ठे भाव में स्थित होना कई तरह के प्रभाव डाल सकता है खास तौर पर रिश्तों, साझेदारी और स्वास्थ्य के संबंध में। यहाँ कुछ मुख्य प्रभाव दिए गए हैं जिन पर विचार किया जाना चाहिए-
1. रिश्तों में चुनौतियाँ- छठा भाव संघर्ष, कर्ज और शत्रुओं से जुड़ा हुआ है। जब सप्तम भाव का स्वामी यहां स्थित होता है, तो यह रिश्तों और साझेदारी में चुनौतियों या संघर्षों का संकेत दे सकता है। जीवनसाथी या व्यावसायिक साझेदारों के साथ गलतफहमी या विवाद हो सकता है।
2. स्वास्थ्य संबंधी मुद्दे- छठा भाव स्वास्थ्य और सेवा से भी जुड़ा हुआ है। यह स्थिति यह संकेत दे सकती है कि व्यक्ति के रिश्ते स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से प्रभावित हो सकते हैं, चाहे वह स्वयं के हों या उसके साथी के। यह रिश्तों में दूसरों की सेवा करने की आवश्यकता को भी इंगित कर सकता है, संभवतः व्यक्तिगत जरूरतों की कीमत पर।
3. कार्यस्थल संबंध- छठा भाव काम, कर्मचारियों और दैनिक दिनचर्या से संबंधित है। यह स्थिति संकेत दे सकती है कि कार्यस्थल पर विवाह सहित महत्वपूर्ण संबंध विकसित हो सकते हैं या भागीदारों का कोई सेवा-उन्मुख या स्वास्थ्य-संबंधी पेशा हो सकता है।
4. कानूनी मामले- छठा भाव मुकदमेबाजी और विवादों से जुड़ा हुआ है। यह साझेदारी या विवाह से संबंधित संभावित कानूनी मुद्दों का संकेत दे सकता है, या व्यक्ति को अपने रिश्तों से संबंधित कानूनी मामलों से निपटना पड़ सकता है।
5. सेवा और त्याग- रिश्तों में त्याग की भावना हो सकती है, जहां एक साथी को अधिक सेवा-उन्मुख भूमिका निभाने की आवश्यकता हो सकती है। इससे एक ऐसी गतिशीलता पैदा हो सकती है जहां एक साथी को अत्यधिक बोझ या कम सराहना महसूस हो।
6. चुनौतियों के माध्यम से विकास- अधिक सकारात्मक रूप से, यह स्थिति यह भी सुझाव दे सकती है कि रिश्तों में चुनौतियों से विकास और गहरी समझ पैदा हो सकती है। यह व्यक्ति को कठिनाइयों से निपटने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है, जिससे समय के साथ रिश्ते मजबूत होते हैं।
7. संतुलन की आवश्यकता- इस स्थिति वाले व्यक्तियों को अपनी व्यक्तिगत ज़रूरतों को अपने साथी की ज़रूरतों के साथ संतुलित करना सीखना पड़ सकता है, खास तौर पर स्वास्थ्य और सेवा के मामले में। ज़िम्मेदारियों से अभिभूत होने से बचने के लिए एक स्वस्थ गतिशीलता खोजना महत्वपूर्ण है।
इसके अलावा इस स्थिति में निम्नलिखित प्रभाव भी पड़ते हैं 
सातवें भाव का स्वामी छठे भाव में होने से जीवनसाथी को तर्क-वितर्क करने की क्षमता प्राप्त हो सकती है।
जीवनसाथी किसी प्रकार के स्वास्थ्य संबंधी या चिकित्सा संबंधी अध्ययन या कार्य से जुड़ा हो सकता है।
यदि ग्रह की स्थिति मजबूत और छठे भाव में असंबद्ध हो तो जीवनसाथी बहुत धनवान और स्वस्थ हो सकता है।
यदि ग्रह की स्थिति मजबूत हो तो जीवनसाथी बहुत भौतिकवादी हो सकता है।
यदि सप्तम भाव का स्वामी छठे भाव में कमजोर हो या पीड़ित हो या पाप ग्रहों के साथ युति में हो या सूर्य द्वारा अस्त हो तो जीवनसाथी जातक के लिए अदालती मामले या परेशानियां ला सकता है।
निष्कर्ष - कुल मिलाकर, सातवें भाव के स्वामी का छठवें भाव में स्थित होना रिश्तों, स्वास्थ्य और सेवा के जटिल अंतर्संबंध का संकेत देता है। हालांकि, इसमें चुनौतियां हो सकती हैं, लेकिन इन अनुभवों के माध्यम से विकास और गहरी समझ की संभावना भी है। हमेशा की तरह, पूरा प्रभाव विशिष्ट चार्ट और अन्य ग्रहों की स्थिति पर निर्भर करेगा।

लेखक परिचय- Pandit Anjani Kumar Dadhich
पंडित अंजनी कुमार दाधीच [पुरोहित कर्म (यज्ञ-हवन - पुजा-अनुष्ठान) विशेषज्ञ, वैदिक ज्योतिषी, अंक ज्योतिषी एवं वास्तुविद ]
Nakshatra Jyotish Sansthaan
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Saturday, 12 April 2025

हनुमान जन्मोत्सव

हनुमान जन्मोत्सव
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार श्री हनुमान जी को संकटमोचन कहा जाता है और श्री हनुमान जी की पूजा करने से हर प्रकार के संकट भय, पीड़ा और बाधाओं से मुक्त हो जाते हैं। हनुमान जी के जन्मोत्सव पर हनुमान जी की पूजा करने का अपना विशेष महत्व है क्योंकि इस दिन हनुमान जी का जन्म हुआ था। हिंदू पंचांग और धर्म शास्त्रों के मुताबिक अंजनी पुत्र हनुमान का जन्म चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को हुआ था। इस साल 12 अप्रैल 2025 शनिवार के दिन है। 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार हनुमान जन्मोत्सव के दिन हनुमान जी की पूजा करना चाहिए। सर्व प्रथम उत्तर-पूर्व दिशा में चौकी पर एक लाल कपड़ा बिछाएं और उस पर हनुमान के साथ भगवान राम की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित कर हनुमान जी को लाल और भगवान राम जी को पीले पुष्प और पुष्प माला अर्पित करते हुए उनकी पंचोपचार विधि से पूजन करना चाहिए। इसके बाद बूंदी, हलवा, लड्डू, और पान के बीडे़ जैसी मीठी चीजों का भोग लगाएं और तुलसी दल भी अर्पित करते हुए हनुमान चालीसा, सुंदरकांड, बंजरग बाण, हनुमान बाहुक, ऋण मोचक मंगल स्तोत्र, एवं हनुमान अष्टक आदि में से कोई एक का पाठ करें।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार हनुमान जी को प्रसन्न करने के लिए निम्नलिखित उपाय भी कर सकते हैं - 
✿ हनुमान जी सिंदूर और चमेली तेल मिश्रित चोला चढ़ाएं और लाल पुष्प की माला अर्पित करें।
✿ हनुमान जी के मंदिर में लाल ध्वजा अर्पित करें।
✿ हनुमान जी के मंदिर में चमेली के तेल का दीपक करे।
✿ हनुमान जी के भक्तों को इस दिन व्रत करने के अलावा बूंदी, हलवा, लड्डू, और पान जैसी मीठी चीजों का भोग लगाने से हनुमान की कृपा हमेशा अपने भक्तों पर बनी रहती है।
✿ हनुमान जन्मोत्सव के दिन घी का दीपक जलाकर उसमे दो लौंग डाल दे उसके बाद हनुमान जी का पूजन करे हनुमान चालीसा का पाठ करे कर्ज खत्म होगा।
✿ मंदार के 108 पते पर जय श्री राम लिखकर उन सभी पते को माला बनाकर हनुमान जी को चढ़ाए हनुमान जी प्रसन्न होंगे और सभी समस्या दूर होगी।
लेखक परिचय- Pandit Anjani Kumar Dadhich 
 पंडित अंजनी कुमार दाधीच
Nakshatra jyotish Sansthan 
नक्षत्र ज्योतिष संस्थान
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Sunday, 30 March 2025

हिन्दू नववर्ष 2082, राजा मंत्री कौन और उनका देश दुनिया पर प्रभाव

हिन्दू नववर्ष 2082, राजा मंत्री कौन और उनका देश दुनिया पर प्रभाव 

प्रिय पाठकों 
मैं पंडित अंजनी कुमार दाधीच आज इस लेख में हिन्दू नववर्ष पर जानकारी दे रहा हूं।

पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार प्रत्येक हिन्दू नववर्ष की शुरुआत चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से होती है। हिन्दू नववर्ष को विक्रम संवत के नाम से जाना जाता है। ब्रह्मपुराण के अनुसार ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मा जी ने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही सृष्टि का निर्माण किया था। अथर्ववेद में भी इस बात का संकेत मिलता है। एक हिन्दू नववर्ष या एक विक्रम संवत में 12 महीने होते हैं जिसका आरंभ चैत्र माह से होता है और वहीं फाल्गुन महीना हिंदू कैलेंडर का आखिरी माह होता है। इस बार 30 मार्च 2025 रविवार को चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन विक्रम संवत 2082 शुरू हो जाएगा और इस नव संवत्सर को ''कालयुक्त" नाम से जाना जाएगा। जो ज्योतिषीय दृष्टि से काफी उग्र और प्रभावशाली माना जा रहा है।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार हिंदू नव वर्ष के दिन सिंधि समाज के लोग चेटीचंड का पर्व, महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा, कर्नाटक में युगादि और आंध्र प्रदेश, तेलंगाना में उगादी, गोवा और केरल में कोंकणी समुदाय के लोग संवत्सर पड़वो कश्मीर में नवरेह, मणिपुर में सजिबु नोंगमा पानबा का पर्व आदि मनाते हैं।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार प्रत्येक वर्ष का एक राजा और एक मंत्री होता है जिनकी स्थिति आपसी सामंजस्य देश दुनिया पर अपना प्रभाव डालती है। अतः इस साल का राजा और मंत्री ज्ञात करे -

इस वर्ष का राजा कौन ?

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को जो वार होता है वही वारेश वर्ष का राजा नियुक्त होता है। इस वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की शुरुआत 30 मार्च 2025 रविवार को होगी अतः इस वर्ष का वारेश या राजा सूर्य ही होगा 

इस वर्ष का मंत्री कौन ?

सूर्य के मेष राशि में प्रवेश के अनुसार वर्ष का मंत्री नियुक्त होता है। इसके अनुसार इस वर्ष का मंत्री भी सूर्य ही होगा। 

ग्रहों की स्थिति और विशेषताएं

सूर्य और चंद्रमा की स्थिति नए साल के दिन सूर्य सहित शुक्र, बुध, शनि और राहु मीन राशि में रहेगा जो पंचग्रही योग बना रहे है। सूर्य का मीन राशि में होना आध्यात्मिकता, अंतर्ज्ञान और मानसिक शांति को बढ़ावा देगा। चंद्रमा मेष राशि में रहेगा जो आत्मविश्वास और उत्साह बढ़ाएगा।शनि और बृहस्पति का प्रभाव शनि मकर राशि में रहेगा, जो कर्म प्रधानता और अनुशासन बढ़ाएगा। बृहस्पति (बृहस्पति) वृषभ राशि में स्थित होगा जो आर्थिक मामलों में स्थिरता और व्यावसायिक प्रगति का संकेत देता है। मंगल और राहु-केतु की भूमिका मंगल मिथुन राशि में रहेगा जो संचार और प्रौद्योगिकी से जुड़े क्षेत्रों में तेजी लाएगा। राहु मीन राशि में और केतु कन्या राशि में रहेंगे जिससे आध्यात्मिकता में वृद्धि होगी और राजनीतिक क्षेत्र में कुछ उथल-पुथल होगी।
-हिंदू नववर्ष में बन रहा खप्पर योग-
 वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जिस संवत का राजा और मंत्री दोनों सूर्य होते हैं तो उस साल खप्पर योग बनता है। ये योग काफी अशुभ माना जाता है। ज्योतिष के अनुसार, जिस साल यह योग बनता है उस साल सरकार और जनता में टकराव बढ़ता है जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग गैर जिम्मेदाराना काम करते हैं। इसके अलावा महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों पर संकट आता है और बहुत लोगों की मृत्यु या हत्या भी होती है। महंगाई तेजी से बढ़ती है और आर्थिक संकट बढ़ जाता है। कई तरह की प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ता है। इसके साथ ही बहुत ही ज्यादा गर्मी बढ़ेगी। लेकिन इसके अलावा कुछ अच्छी चीजें भी हो सकती है।
मंत्री और राजा सूर्य का विश्व पटल पर प्रकाश 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार सूर्य का प्रभाव हमेशा राजसत्ता, प्रशासन, शक्ति और उग्रता से जुड़ा होता है। ऐसे में इस वर्ष राजनीतिक अस्थिरता, प्रशासन में कठोर फैसले और उग्र आंदोलनों का प्रभाव दिख सकता है। सूर्य के प्रभाव से शासक वर्ग मजबूत रहेगा और नए सुधारों की संभावनाएं बनेंगी। यह वर्ष काफी कुछ उथल-पुथल वाला हो सकता है। अग्निकांड, प्राकृतिक आपदा आदि से धन जन की हानि के आसार हैं। इस वर्ष वृक्षों पर अपेक्षाकृत फल कम आने की संभावना है। चैत्र व वैशाख मास कष्टकारी व आषाढ़ मास में हवा की गति में तेजी आएगी। सावन मास में अनाजों में तेजी, आश्विन मास में समानता व कार्तिक में मंदी का दौर रहेगा। अगहण, पौष, माघ व फाल्गुन में अशांति, शासकीय विरोध झेलने पड़ेंगे।
बुध के प्रभाव से वर्षा की स्थिति संतोष जनक रहेगी। चौमासी फसलों का स्वामी बुध के होने से गेंहू, धान, गन्ना आदि की उपज में बढ़ोतरी होगी। शीतकालीन फसलों का स्वामी चंद्रमा होने से मूंग, बाजरा, सरसों की उपज अच्छी होगी। नए संवत्सर का निवास वैश्य के घर होने से व्यापार में प्रगति होगी। अन्न, भूमि, भवन, शिक्षा, सोना, वाहन, तकीनक के क्षेत्रों में तेजी रहेगी। 
भारतीय राजनीति पर पड़ेगा असर
इस वर्ष त्वचा व संक्रमण की बीमारियों का प्रकोप के आसार हैं।
सूर्य के विशेष प्रभाव होने के कारण भारतीय राजनीति पर असर पड़ेगा।
विदेशी कूटनीति से लाभ मिलेगा।
देश के कई राज्यों में सत्ता परिवर्तन की संभावना बनेगी।
कई स्थानीय राजनीतिक पार्टियों का विलय होगा।
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ध्यान रखने योग्य - पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार नव वर्ष राजा के निर्धारण के विषय पर चर्चा करनी इसलिए आवश्यक है क्योंकि प्रायः इसकी वजह से वर्षेश भिन्न हो जाता है। सही में कुछ और होता है और गणनात्मक त्रुटि की वजह से कुछ और हो जाता है। इसको बहुत स्पष्टता से समझने की जरूरत है। इस घालमेल की वजह से गलत वर्षेश का निर्धारण हो जाता है। गलत तथ्य के प्रकाशन के साथ साथ भ्रम की स्थिति बन जाती है।

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लेखक परिचय - Pandit Anjani Kumar Dadhich
पंडित अंजनी कुमार दाधीच
Nakshatra jyotish Hub
नक्षत्र ज्योतिष हब
📧panditanjanikumardadhich@gmail.com
फोन नंबर - 9414863294, 6377054504

Saturday, 29 March 2025

नवरात्रि पर्व विशेष

नवरात्रि पर्व विशेष
मैं पंडित अंजनी कुमार दाधीच आज इस लेख में चैत्र नवरात्रि के बारे में जानकारी दे रहा हूं।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार हिंदू धर्म में नवरात्रि के इस त्योहार का बेहद ही खास महत्व होता है। वर्ष में कुल चार नवरात्रि पड़ती हैं जिसमें से दो गुप्त नवरात्रि होती है और शारदीय और चैत्र नवरात्रि होती है। गुप्त नवरात्रि को तंत्र साधना के लिए शुभ माना जाता है। वहीं चैत्र और शारदीय नवरात्रि गृहस्थ लोग रखते हैं। चैत्र नवरात्रि का पर्व चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से नवमी तिथि (नौ दिन) तक मनाया जाता है। नवरात्रि के इन नौ दिनों में माँ दुर्गा के नौ रूपों शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। 
घट स्थापना मुहुर्त
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा 30 मार्च 2025 रविवार के दिन नवरात्रि है। नवरात्रि में घट स्थापना या कलश स्थापना का अपना अलग ही महत्व है।
घट स्थापना मुहुर्त निम्नलिखित हैं 
6:00 बजे से 6:48 तक ( महेंद्र योग मुहुर्त )
6:48 बजे से 9:52 तक (अमृत योग मुहुर्त)
8:07 बजे से 9:39 तक (चंचल मुहुर्त)
9:39 बजे से 12 :43 तक (लाभ-अमृत योग मुहुर्त) 
12:18 बजे से 1:07 तक (अभिजीत मुहूर्त)
अभिजीत मुहूर्त में कलश स्थापना या घट स्थापना करना शुभ माना गया है। 
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार घटस्थापना में निम्नलिखित बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए -
⁠✿ कलश स्थापना या घटस्थापना में हमेशा सोने, चांदी, तांबे या फिर मिट्टी से बने कलश का ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
✿ पूजा के लिए लोहे के कलश या स्टील से बने कलश का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
⁠✿ कलश की स्थापना के दौरान दिशा का भी विशेष ख्याल रखें। कलश की स्थापना या तो उत्तर दिशा में या फिर पूर्व दिशा में ही करनी चाहिए।
⁠✿ कलश स्थापना करने से पहले उस स्थान को अच्छे से साफ सफाई कर लें और वहां पर गंगाजल का छिड़काव करने के बाद ही कलश की स्थापना करें।
⁠✿ कलश स्थापना के लिए चिकनी मिट्टी और रेतीली मिट्टी को फैला लें और अष्टदल बनाएं।
⁠✿ कलश में सप्त मृत्तिका, सुपारी, सिक्का, सुगंध, सर्व औषधी, कौड़ी, शहद, गंगाजल, पंच पल्लव, पीपल, आम बरगद, गूलर और पाखर के पल्लव यदि उपलब्ध न हो तो आम के पल्लव डाल लें।
⁠✿ लाल रंग के कपड़े में नारियल लपेटकर कलश के ऊपर रख दें।
⁠✿ सिंदूर से कलश में स्वास्तिक लगाएं। कलश के ऊपर मिट्टी के बर्तन में धान या चावल डालकर उसके ऊपर ही नारियल स्थापित करें।
✿ पूजा के बाद वेदी के ऊपर एक मिट्टी का कुंडा लेकर उसमें जौं को बो देना चाहिए।
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पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार अगर नवरात्रि के दौरान माता दुर्गा की आराधना करना चाहते हैं और कोई भी मंत्र नहीं आता हो तो दुर्गा सप्तशती में दिए गए नवार्ण मंत्र "ओम् ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे" मंत्र की माला का जाप करना चाहिए। 
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Wednesday, 5 February 2025

रामचरितमानस की चौपाई का जाप तो बनेंगे बिगड़े काम

रामचरितमानस की चौपाई का जाप तो बनेंगे बिगड़े काम
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस महाकाव्य की हर एक चौपाई अपने आप में एक सिद्ध मंत्र है अतः हमे भी इनका जाप कर अपने कार्यो को सिद्ध करना चाहिए।
कई बार लोग किसी काम को पूरी मेहनत और लगन से करते हैं लेकिन वो काम बनते-बनते बिगड़़ जाता है अगर आपके साथ भी ऐसा ही होता है तो सिर्फ एक चौपाई के जाप से आपका काम बन सकते हैं। यह चौपाई सुंदर काण्ड में दी गई है। 
चौपाई
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥ 
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई॥
भावार्थ - किसी भी काम की करने से पहले प्रभु श्रीराम का स्मरण करने से सफलता मिलेगी। जो भी ऐसा करता है उसके लिए विष भी अमृत हो जाता है, शत्रु मित्र बन जाता है, समुद्र गाय के खुर के बराबर हो जाता है, अग्नि में शीतलता आ जाती है।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच के अनुसार ऐसा माना जाता है कि रामचरितमानस की इस चौपाई का पाठ करने से कई फ़ायदे होते हैं जो कि निम्नलिखित है 
इस चौपाई का जाप करने से व्यक्ति का कठिन से कठिन काम में सफलता मिलती है और साथ ही यात्रा प्रवास भी सुरक्षित होता है।
इस चौपाई का जाप करने से श्रीराम और हनुमान जी का आशीर्वाद मिलता है और समस्याओं का भी निदान हो जाता है।
इस चौपाई के बारे में कुछ जानकारी है जो निम्नलिखित है -
इस चौपाई का पाठ करने के लिए मंगलवार या शनिवार का दिन सबसे अच्छा होता है।
सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करने के बाद, अपने इष्ट का ध्यान करके चौपाई का पाठ 108 बार करना चाहिए।
जिस स्थान की यात्रा करनी हो, वहां पहुंचते ही उक्त चौपाई को सात बार बोलें।
कहा जाता है कि रामचरितमानस की चौपाइयां इतनी प्रभावशाली हैं कि इसके पाठ मात्र से धन की कामना रखने वाले को धन की प्राप्ति होती है।
मान्यता के अनुसार जब लंका में सीता माता का पता लगाने के लिए हनुमान जी गए थे तब उनके मन में संदेह था कि वो अपने काम में सफल होंगे या नहीं। तब उन्होंने प्रभु श्री राम का ध्यान किया और लंका में प्रवेश किया साथ ही अपने कार्य में सफल भी हुए इसलिए माना जाता है कि अगर आपको भी मन में किसी काम को लेकर अनजाना डर समाए तो इस चौपाई का पाठ करने और श्रीराम के स्मरण मात्र से काम सफल होते हैं।
अतः अगर आप भी किसी भी काम को करने से पहले या इंटरव्यू आदि से पहले भगवान श्रीराम और हनुमान जी को याद कर इस चौपाई को बोलने हर काम बन जाएगा।
रामचरितमानस की रचना तुलसीदास ने महार्षि वाल्मिकी की रामायण को आधार बनाकर की है। सुंदरकांड रामचरितमानस का ही पंचम सोपान है। इसमें हनुमान जी के गुणों और यश के बारे में बताया गया है।
पंडित अंजनी कुमार दाधीच 
Pandit Anjani Kumar Dadhich 
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